Incomplete Love: Two Worlds - Part 17 in Hindi Love Stories by sukhvinder Singh Rai books and stories PDF | अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 17

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अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 17

**भाग सत्रह: जंगल की वो खामोश गवाही**सिटी ऑडिटोरियम की उस चकाचौंध और हज़ारों की भीड़ से भागकर कबीर अपनी बुलेट पर सवार हुआ। पल्लवी के उन अजनबी लफ़्ज़ों ने उसके सीने में एक ऐसा नासूर पैदा कर दिया था जो अब बर्दाश्त से बाहर था। वह बाइक को पागलों की तरह दौड़ाते हुए शहर के सबसे आखिरी छोर पर उस वीरान जंगल में ले आया, जहाँ पुरानी यादों का साया भी डरता था।बरगद के उस विशाल पेड़ के नीचे बैठकर कबीर का वह सख्त मुखौटा चकनाचूर हो चुका था। वह अपनी गलती के बोझ तले दबकर दहाड़ें मार-मार कर रो रहा था, लेकिन अचानक जंगल की उस खामोशी में टायरों के रगड़ने की आवाज़ आई। पल्लवी वहाँ पहुँच चुकी थी।गाड़ी छोड़कर वह झाड़ियों को चीरती हुई, हाँफते हुए और लंगड़ाते हुए उस बरगद के पास पहुँची। जब कबीर ने उसे देखा, तो उसका कलेजा मुंह को आ गया। वह पल्लवी नहीं थी, वह उसकी अपनी रूह थी जो उसे ढूँढते हुए आ गई थी। बिना एक शब्द कहे, पल्लवी कबीर के सीने से जाकर टकराई। वह मिलन नहीं था, वह दो टूटते हुए अस्तित्वों का एक-दूसरे में खो जाना था।कबीर ने उसे अपनी बाहों में समेटा, लेकिन इस बार उसकी आँखों में पछतावा नहीं, एक अजीब सी बेबसी थी। उसने पल्लवी के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसकी उन सूनी आँखों में झाँका। "पल्लवी, तुम यहाँ क्यों आई? मैं तो तुम्हें उस आग से दूर ले जाना चाहता था जो मेरी ज़िन्दगी में जल रही है। क्या तुम्हें अंदाज़ा भी है कि तुमने किस खतरे की तरफ कदम बढ़ाया है?"पल्लवी ने कबीर की कमीज़ को अपनी मुट्ठियों में जकड़ लिया और उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, "मुझे कोई खतरा नहीं दिखता कबीर। अगर तुम्हारी दुनिया में अंधेरा है, तो मैं उसी अंधेरे में तुम्हारी परछाई बनकर रहूँगी। मुझे उस अजनबीपन की सजा मत दो, जो मैंने ऑडिटोरियम में तुम्हें दी थी। मैंने वो नाटक सिर्फ़ इसलिए किया था ताकि मैं देख सकूँ कि क्या मेरे बिना भी तुम्हारे दिल में वो तड़प बाकी है? और आज..." उसने कबीर का हाथ अपने दिल पर रखा, "आज तुम्हारी इन आँखों के आंसुओं ने मुझे जवाब दे दिया है।"जंगल के उन पुराने पेड़ों के नीचे, जहाँ सन्नाटा भी एक राज़ की तरह दबा हुआ था, कबीर ने अपना मस्तक पल्लवी के मस्तक से टिका दिया। वह जानता था कि अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं है। आज पल्लवी ने उसके उन सभी तर्कों को कुचल दिया था जो उसे अमीरी-गरीबी की बेड़ियों में बाँधे हुए थे।कबीर ने उसे अपनी बाहों में और कस लिया। उसने महसूस किया कि पल्लवी के शरीर की गर्माहट उसके रोंगटे खड़े कर रही थी। उस वीरान जंगल में, जहाँ मौत जैसा सन्नाटा था, पहली बार कबीर को 'ज़िंदगी' का अहसास हुआ। उसने धीरे से उसके कानों में फुसफुसाया, "अब अगर तुम मेरी दुनिया में कदम रख रही हो पल्लवी, तो याद रखना... यहाँ सिर्फ दर्द और संघर्ष है। और मैं... मैं मरते दम तक तुम्हें उस संघर्ष का हिस्सा नहीं बनने दूँगा। हम एक ऐसी जंग लड़ने जा रहे हैं जिसके अंत का हमें भी नहीं पता।"पल्लवी ने मुस्कराते हुए अपने आंसू पोंछे और कहा, "अंजाम जो भी हो, बस आज के बाद मुझे छोड़कर मत भागना।"उस रात, उस जंगल के सन्नाटे ने दो दिलों के मिलन की गवाही दी, जो न सिर्फ एक-दूसरे के हुए, बल्कि एक ऐसे तूफान की ओर बढ़ गए जिसका साया शायद राजेश की उस आलीशान हवेली को भी नहीं पता था। कबीर और पल्लवी अब सिर्फ प्रेमी नहीं थे, वे एक ऐसी दास्तान का हिस्सा बन चुके थे जिसमें प्यार से ज़्यादा 'हकीकत' की लड़ाई थी।