समय-चक्र
नितिन चिल्लाते हुये पत्नी से बोला - आज भाभी के मायके
वाले बिना खाना खाये चले गये, तुम खाना नहीं खिला सकती थी
क्या?
शशि बोली - खाना तो बन गया था ,उनकी ट्रेन का टाइम
होने के कारण बिना खाये वे लोग चले गये।
नितिन - माँ तो बोल रही थी कि तुमने खाना बनाया ही नहीं
था तो वे कैसे खाते?
शशि - मॉ कभी रसोई में आकर झॉकती भी है, जो उनको पता
हो खाना बना है या नहीं? उसने गुस्सा से कहा।
नितिन - सब तुम्हारी लापरवाही है, जो मेहमान बिना खाना
खाये चले गये। तुमसे कभी भी टाइम पर खाना बनता ही नही, पता
नही दिनभर क्या करती रहती हो ? एक खाना बनाने का काम है
तुम्हारा, वो भी नहीं बनता तुमसे। किसी काम की जिम्मेदारी नही
समझती, सब जगह बेइज्जती कराती हो अब वे लोग जगह जगह
कहते रहेंगें कि इनके घर खाना भी नहीं मिलता, कैसे रिश्तेदार हैसमय-चक्र
नितिन चिल्लाते हुये पत्नी से बोला - आज भाभी के मायके
वाले बिना खाना खाये चले गये, तुम खाना नहीं खिला सकती थी
क्या?
शशि बोली - खाना तो बन गया था उनकी ट्रेन का टाइम
होने के कारण बिना खाये वे लोग चले गये।
नितिन - माँ तो बोल रही थी कि तुमने खाना बनाया ही नहीं
था तो वे कैसे खाते?
शशि - मॉ कभी रसोई में आकर झॉकती भी है, जो उनको पता
हो खाना बना है या नहीं? उसने गुस्सा से कहा।
नितिन - सब तुम्हारी लापरवाही है, जो मेहमान बिना खाना
खाये चले गये। तुमसे कभी भी टाइम पर खाना बनता ही नही, पता
नही दिनभर क्या करती रहती हो ? एक खाना बनाने का काम है
तुम्हारा, वो भी नहीं बनता तुमसे। किसी काम की जिम्मेदारी नही
समझती, सब जगह बेइज्जती कराती हो अब वे लोग जगह जगह
कहते रहेंगें कि इनके घर खाना भी नहीं मिलता, कैसे रिश्तेदार है?
शशि - जो कहना है - कहते रहो, मुझसे जितना बनता है,
उतना करती हूँ। भाभी का बच्चा छोटा है, उनको पानी में हाथ नहीं
देना है, इसलिये उन्हें कोई काम नही करना, अम्मा को नाती को
खिलाने से फुर्सत नही। बच्चे पढ़ने वाले है - एक मैं ही बचती हूँ,
दिन भर पिसने के लिये। सबने नौकरानी समझ रखा है। नौकरानी
को भी छुट्टी मिल जाती है, शाम को घर चली जाती है। मुझे तो
दिन रात काम करना है। रात के 10 बजे भी कोई आया है तो खाना
बनाकर खिलाया है। यहाँ मेहमानों के आने जाने का कोई टाइम
नही, दिन भर सबकी सेवा करों, फिर भी बुरा भला सुनों - गुस्से से
बड़बड़ाती शशि बोली- घर में ही काम कम है क्या ? 15 लोगों का अकेले खाना बनाना
पड़ता है, सबका ख्याल रखो, मैने खाया है या नहीं, कोई पूछने वाला
नहीं - हर समय मुझे ही डॉटते रहते हो।
नितिन भी गुस्से में भरकर बोला - दिन भर बकबक करती
रहती है, खाना बनाने के अलावा और काम क्या करती है ? जरा बता
मुझे। तू नही करेगी तो कौन करेगा ? खाना तक बना नहीं सकती
निकम्मी है तू निकम्मी, दिन भर कुछ नही करती।
पति के बार बार निकम्मी, कहने पर आज शशि को उस पर गुस्सा आ गया वो भी गुस्से
से बोली - मैने सबका ठेका नहीं ले रखा है, जिनके मेहमान हैं, वह
भी कुछ करें , दिनभर वे दोनों ( जेठानी एवं सासू माँ) आराम करती
रहती हैं - बड़ी भाभी -कभी पेट से तो कभी गोद से - काम नहीं करती।
सास को दिन भर नातियों से फुर्सत नही है। अब बहुत हो गया
मैं इस घर में नही रह सकती। इस घर के अन्याय झेलते झेलते वर्षों
हो गये। तुमसे भी कितनी बार कह चुकी हूँ - अलग काम करलो
परन्तु मेरी सुनते नहीं हो और मुझे ही हर समय डॉटते रहते हो।
आठ आठ बच्चों का काम कम होता है क्या ?
नितिन - ज्यादा बकबक मत कर, बहुत देर से सुन रहा हूँ,
कहकर नितिन उठा और दो थप्पड़ पत्नी को जड़ दिये।
अब तो शशि का पारा सातवें आसमान में चढ़ गया, वह भी कहाँ
चुप रहने वाली थी दोनो गुत्थमगुत्था हो गये। शशि गुस्से मैं बोली
मैं दिन भर काम करू और सबकी बातें भी सुनूँ और तुम भी मारो। मैं अब
यहाँ नहीं रहने वाली। मैं अब मायके चली जाऊंगी कहकर शशि
जोर जोर से रोने लगी।
शशि और नितिन के बीच आये दिन झगड़े होते रहते थे। सासू
मॉ को हर काम कायदे से व सफाई से होना चाहिये - उनको खुद
कुछ करना नहीं था। बड़ी बहू सरोज आठ बच्चो की माँ है, वह
लाडली बहू है। शशि की शादी हुये 7 वर्ष हो गये उसको कोई संतान
नहीं है। वह बॉझ होने के लॉछन ढोती और दिन भर घर का, मेहमानों
का, पति का, देवर का व जेठानी के बच्चों का खाना बनाती व अन्य
काम करती। फिर भी सासू माँ अपने बेटे नितिन को भड़का देती ।
सीधा साधा नितिन मॉँ की बातों में आकर पत्नी से झगड़ा करने
लगता था।
रोज रोज के कलह - क्लेश से शशि तंग आ चूकी थी। उसकी
समझ में आ गया था, इस घर उसका कोई भविष्य नहीं - कोई
अपनी खुशी नही। दिन भर काम करना है। पति सीधे साधे है, मॉँ
के कहने में आकर हर काम करते हैं, स्वयं की निर्णय शक्ति नहीं हैं।
अपना भविष्य अन्घकारमय देखकर शशि ने अपने भाई को बुलाया
और भाई के साथ अपने सब जेवर व सामान लेकर मायके आ गई।
उसकी इच्छा अब वहां लौटकर जाने की नहीं थी। रास्ते भर वह
अपनी भविष्य की चिंताओं में डूबी रही। अनिशचित भविष्य के कई
चित्र उसके मन में बनते बिगड़ते रहे। तरह तरह के ख्यालों में डूबी
रही। मायके आकर पिता को ससूराल की सब बातें बतायी और कह
दिया - मैं अब ससूराल नहीं जाऊंगी आप मुझ पर दबाव मत
बनाना।
पिता ने समझाने की बहुत कोशिश की - लड़की का असली
घर ससुराल ही है वहाँ ही रहना चाहिये। समाज व दुनियाँ वाले तरह
तरह की बातें करेंगें - परन्तु शशि नहीं मानी।
ससुराल वालों ने शशि को बुलाने के लिये बहुत बार कहा -
परन्तु शशि फिर भी ससुराल नहीं गई। पिता से कहकर उसने
ट्यूशन के लिये टीचर को घर में बुला लिया और अपनी पढाई फिर
शुरू कर दी। शशि दसवी पास थी प्रायवेट 12वीं एव बी.ए की
परीक्षाये दे कर पास होती रही और एम.ए. भी कर लिया। पढाई पूरी
होते ही समाज कल्याण विभाग मे उसकी नौकरी लग गई। उसकी
नियुक्ति जिला अधिकारी के पद पर हो गई, समाज कल्याण के
कार्यक्रमों के सम्बन्ध में वह गॉव गॉव जाती थी। शशि समाज सेवा
से जुड गई। शासकीय सामाजिक कार्यक्रमों मे वह आस पास के
गांव मे जाती थी। अपने विभागीय कार्यों से भी वह कई कार्यक्रम
आयोजित करती थी।
शशि का अपनी ससुराल के शहर भी जाना होता था। परन्तु
अपने ससुराल के घर कभी भी नही गई।
पति नितिन के विषय मे उसे जानकारी थी कि वे कहीं चले
गये है। उनके भतीजो ने उन्हे अपने साथ नही रखा। कोई भी
भतीजा बूढे नितिन को अपने साथ रखना नहीं चाहता था। पत्नी के
जाने के बाद घर में उनका महत्व नहीं रह गया था । शशि दिन भर
घर का काम करती थी उसके पति होने के नाते उनको घर वाले
पूछते थे। सीधे साधे नितिन को कोई क्यों पूछे? बिजनिस में भी वे
ज्यादा सहयोग नहीं दे पाते थे। एक नौकर की तरह जितना कोई
बताता उतना ही कर पाते थे, उनमें स्वयं की निर्णयशक्ति नहीं थी,
इसलिये कोई भतीजा उनको अपने पास रखना नहीं चाहता था
जल्दी ही घर में सीधे साधे नितिन की उपेक्षा होना शुरू हो गई कभी
कभी तो खाना भी नही मिलता था। भतीजों की शादी होने व मॉँ के
मरने के बाद नितिन निरन्तर उपेक्षित होते रहे और घोर निराशा मे
डूबते गये। इसलिये नितिन बिना बताये कहीं चले गये है। लोगो को
उनके विषय मे जानकारी नही थी।
सामाजिक कार्यो के सिलसिले मे शशि अनाथ आश्रम व
वृद्धाश्रम मे भी जाती रहती थी। एक दिन वृद्धाश्रम मे शशि की भेंट
बूढे, बीमार नितिन से हो गई। नितिन की जीर्ण शीर्ण अवस्था को देख
शशि रो पड़ी। और नितिन भी शशि को देख कर बहुत रोये। नितिन
बहुत कमजोर व बूढे हो गये थे। शशि वुद्धाश्रम की औपचारिकता पूरी
कर नितिन को अपने साथ अपने घर ले आई- नितिन को शशि के
साथ आने मे संकोच हो रहा था, परन्तु शशि के आग्रह को वे टाल
नही पाये और शशि के साथ उसके घर आ गये।
शशि ने उनकी दवाई व देख भाल अच्छे से की, उनके लिये नये
कपडे बनवाये । शशि का प्रेम और देखभाल से महीने भर मे ही नितिन
का कायाकल्प हो गया। गोरे चिट्टे लम्बे पूरे तो नितिन शुरू से ही
थे, भतीजों की उपेक्षा से वे समय से पहले ही बूढ़े हो गये थे, निराशा
घर कर गई थी। शशि ने एक बच्चे की तरह नितिन की देख भाल
की, मानो आपने बॉझ होने का लॉछन धो रही हो। संवेदनाये कभी
मरती नही - जिन्दगी के तार कहीं ना कहीं जुडे रहते हैं, शेष जीवन
दोनो ने साथ बिताया।
*****
छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा रहो, मुझसे जितना बनता है,
उतना करती हूँ। भाभी का बच्चा छोटा है, उनको पानी में हाथ नहीं
देना है, इसलिये उन्हें कोई काम नही करना, अम्मा को नाती को
खिलाने से फुर्सत नही। बच्चे पढ़ने वाले है - एक मैं ही बचती हूँ,
दिन भर पिसने के लिये। सबने नौकरानी समझ रखा है। नौकरानी
को भी छुट्टी मिल जाती है, शाम को घर चली जाती है। मुझे तो
दिन रात काम करना है। रात के 10 बजे भी कोई आया है तो खाना
बनाकर खिलाया है। यहाँ मेहमानों के आने जाने का कोई टाइम
नही, दिन भर सबकी सेवा करों, फिर भी बुरा भला सुनों - गुस्से से
बड़बड़ाती शशि बोली- घर में ही काम कम है क्या ? 15 लोगों का अकेले खाना बनाना
पड़ता है, सबका ख्याल रखो, मैने खाया है या नहीं, कोई पूछने वाला
नहीं - हर समय मुझे ही डॉटते रहते हो।
नितिन भी गुस्से में भरकर बोला - दिन भर बकबक करती
रहती है, खाना बनाने के अलावा और काम क्या करती है ? जरा बता
मुझे। तू नही करेगी तो कौन करेगा ? खाना तक बना नहीं सकती
निकम्मी है तू निकम्मी, दिन भर कुछ नही करती।
पति के बार बार निकम्मी, कहने पर आज शशि उस पर गुस्सा
से बोली - मैने सबका ठेका नहीं ले रखा है, जिनके मेहमान हैं, वह
भी कुछ करें , दिनभर वे दोनों ( जेठानी एवं सासू माँ) आराम करती
रहती हैं - बड़ी -कभी पेट से तो कभी गोद से - काम नहीं करती।
सास को दिन भर नातियों से फुर्सत नही है। अब बहुत हो गया
मैं इस घर में नही रह सकती। इस घर के अन्याय झेलते झेलते वर्षों
हो गये। तुमसे भी कितनी बार कह चुकी हूँ - अलग काम करलो
परन्तु मेरी सुनते नहीं हो और मुझे ही हर समय डॉटते रहते हो।
आठ आठ बच्चों का काम कम होता है क्या ?
नितिन - ज्यादा बकबक मत कर बहुत देर से सुन रहा हूँ,
कहकर नितिन उठा और दो थप्पड़ पत्नी को जड़ दिये।
अब तो शशि का पारा सातवें आसमान में चढ़ गया, वह भी कहाँ
चुप रहने वाली थी दोनो गुत्थमगुत्था हो गये। शशि गुस्से मैं बोली
मैं दिन भर काम करू और सबकी सनूँ और तुम भी मारो। में अब
यहाँ नहीं रहने वाली। मैं अब मायके चली जाऊंगी कहकर शशि
जोर जोर से रोने लगी।
शशि और नितिन के बीच आये दिन झगड़े होते रहते थे। सासू
मॉ को हर काम कायदे से व सफाई से होना चाहिये - उनको खुद
कुछ करना नहीं था। बड़ी बहू सरोज आठ बच्चो की माँ है, वह
लाडली बहु है। शशि की शादी हुये 7 वर्ष हो गये उसको कोई संतान
नहीं है। वह बॉझ होने के लॉछन ढोती और दिन भर घर का, मेहमानों
का, पति का, देवर का व जेठानी के बच्चों का खाना बनाती व अन्य
काम करती। फिर भी सासू माँ अपने बेटे नितिन को भड़का देती ।
सीधा साधा नितिन मॉँ की बातों में आकर पत्नी से झगड़ा करने
लगता था।
रोज रोज के कलह - क्लेश से शशि तंग आ चूकी थी। उसकी
समझ में आ गया था, इस घर उसका कोई भविष्य नहीं - कोई
अपनी खुशी नही। दिन भर काम करना है। पति सीधे साधे है, मॉँ
के कहने में आकर हर काम करते हैं, स्वयं की निर्णय शक्ति नहीं हैं।
अपना भविष्य अन्घकारमय देखकर शशि ने अपने भाई को बुलाया
और भाई के साथ अपने सब जेवर व सामान लेकर मायके आ गई।
उसकी इच्छा अब वहां लौटकर जाने की नहीं थी। रास्ते भर वह
अपनी भविष्य की चिंताओं में डूबी रही। अनिशचित भविष्य के कई
चित्र उसके मन में बनते बिगड़ते रहे। तरह तरह के ख्यालों में डूबी
रही। मायके आकर पिता को ससूराल की सब बातें बतायी और कह
दिया - मैं अब ससूराल नहीं जाऊंगी आप मुझ पर दबाव मत
बनाना।
पिता ने समझाने की बहुत कोशिश की - लड़की का असली
घर ससुराल ही है वहाँ ही रहना चाहिये। समाज व दुनियाँ वाले तरह
तरह की बातें करेंगें - परन्तु शशि नहीं मानी।
ससुराल वालों ने शशि को बुलाने के लिये बहुत बार कहा -
परन्तु शशि फिर भी ससुराल नहीं गई। पिता से कहकर उसने
ट्यूशन के लिये टीचर को घर में बुला लिया और अपनी पढाई फिर
शुरू कर दी। शशि दसवी पास थी प्रायवेट 12वीं एव बी.ए की
परीक्षाये दे कर पास होती रही और एम.ए. भी कर लिया। पढाई पूरी
होते ही समाज कल्याण विभाग मे उसकी नौकरी लग गई। उसकी
नियुक्ति जिला अधिकारी के पद पर हो गई, समाज कल्याण के
कार्यक्रमों के सम्बन्ध में वह गॉव गॉव जाती थी। शशि समाज सेवा
से जुड गई। शासकीय सामाजिक कार्यक्रमों मे वह आस पास के
गांव मे जाती थी। अपने विभागीय कार्यों से भी वह कई कार्यक्रम
आयोजित करती थी।
शशि का अपनी ससुराल के शहर भी जाना होता था। परन्तु
अपने ससुराल के घर कभी भी नही गई।
पति नितिन के विषय मे उसे जानकारी थी कि वे कहीं चले
गये है। उनके भतीजो ने उन्हे अपने साथ नही रखा। कोई भी
भतीजा बूढे नितिन को अपने साथ रखना नहीं चाहता था। पत्नी के
जाने के बाद घर में उनका महत्व नहीं रह गया था । शशि दिन भर
घर का काम करती थी उसके पति होने के नाते उनको घर वाले
पूछते थे। सीधे साधे नितिन को कोई क्यों पूछे? बिजनिस में भी वे
ज्यादा सहयोग नहीं दे पाते थे। एक नौकर की तरह जितना कोई
बताता उतना ही कर पाते थे, उनमें स्वयं की निर्णयशक्ति नहीं थी,
इसलिये कोई भतीजा उनको अपने पास रखना नहीं चाहता था
जल्दी ही घर में सीधे साधे नितिन की उपेक्षा होना शुरू हो गई कभी
कभी तो खाना भी नही मिलता था। भतीजों की शादी होने व मॉँ के
मरने के बाद नितिन निरन्तर उपेक्षित होते रहे और घोर निराशा मे
डूबते गये। इसलिये नितिन बिना बताये कहीं चले गये है। लोगो को
उनके विषय मे जानकारी नही थी।
सामाजिक कार्यो के सिलसिले मे शशि अनाथ आश्रम व
वृद्धाश्रम मे भी जाती रहती थी। एक दिन वृद्धाश्रम मे शशि की भेंट
बूढे, बीमार नितिन से हो गई। नितिन की जीर्ण शीर्ण अवस्था को देख
शशि रो पड़ी। और नितिन भी शशि को देख कर बहुत रोये। नितिन
बहुत कमजोर व बूढे हो गये थे। शशि वुद्धाश्रम की औपचारिकता पूरी
कर नितिन को अपने साथ अपने घर ले आई- नितिन को शशि के
साथ आने मे संकोच हो रहा था, परन्तु शशि के आग्रह को वे टाल
नही पाये और शशि के साथ उसके घर आ गये।
शशि ने उनकी दवाई व देख भाल अच्छे से की, उनके लिये नये
कपडे बनवाये । शशि का प्रेम और देखभाल से महीने भर मे ही नितिन
का कायाकल्प हो गया। गोरे चिट्टे लम्बे पूरे तो नितिन शुरू से ही
थे, भतीजों की उपेक्षा से वे समय से पहले ही बूढ़े हो गये थे, निराशा
घर कर गई थी। शशि ने एक बच्चे की तरह नितिन की देख भाल
की, मानो आपने बॉझ होने का लॉछन धो रही हो। संवेदनाये कभी
मरती नही - जिन्दगी के तार कहीं ना कहीं जुडे रहते हैं, शेष जीवन
दोनो ने साथ बिताया।
छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा Shiromanimathur@gmail.com
9893742299