Routes - 9 in Hindi Moral Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 9

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राहें - 9

होली

                                                           रंगों का त्योहार होली प्रकृति की अनुपम सौगात लेकर आता है सारी प्रकृति सारा आसमान वन ,बाग, बगीचे, नदियाँ ,मौसम तथा पवन स्वच्छ सुगंधित होकर लगता है किसी दैवीय आराधना में प्रस्तुत होने जा रहे है । सर्दी के ठिठुरन से निकल कर प्रकृति नये परिधान व कलेवर से सजी बड़ी मोहक लगती है । पीली सरसों , पलास व गेंदे के पुष्प अपनी सौंदर्य व सुगंध से पूरे वातावरण को सुवासित करते हैं। आम की भीनी गन्ध वन ,उपवन सभी को आकृर्षित करती है ,ऐसे में आता है होली का त्यौहार , बालक से लेकर वृद्ध तक सभी को प्रभावित करता है । कुछ लोग पावनता से परमात्मा को धन्यवाद करते है, और कुछ उन्मत्त लोग अपने को सुरा सुंदरी के नशे में डुबो लेते हैं । यद्यपि भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में हर त्यौहार का आध्यात्मिक मूल्य है और उसी से प्रकृति को जोड़कर हम भारतीय अपने त्यौहार मनाते आये है परंतु कुछ लोग हर त्यौहार को नशे के विभिन्न प्रयोगों का अवसर समझ कर चलते है और हर त्यौहार में मदमस्त हो जाने में ही अपनी शान समझते है ।
                      सुनील और उसके साथियों को आज का दिन वरदान लगता था ,मौज मस्ती की खुली छूट का दिन।कई दिन पहले से ही तैयारी चल रही थी ,कैसे मौज मस्ती की जायगी, सबने वन विभाग के विश्राम गृह में बैठने और पार्टी करने की योजना बना ली । एक दिन पहले से ही विस्की व शैम्पेन,नमकीन, ड्राई फूड ,सोडा ,बर्फ सब समान मंगाकर तैयारी पूरी कर ली गई, रात काटना मुश्किल हो रहा था। इंतजार था कब सब इक्कठे हो और महफ़िल सज जाय । 10 बजते-बजते सुनील की मित्र मंडली जमने लगी । धीरे - धीरे कई लोग इक्कठे हो गये, सबने छक कर पी और दूसरों को पिलाई , पीने के बाद हास परिहास व हंसी मजाक चलता रहा । प्रशांत ने छत्तीसगढ़ी ददरिया गाना शुरू किया तो फिर तो एक के बाद एक साथी गाने लग गये, जिनको बोलते नहीं बनता था, वे भी गायक बन गये । कई फिल्मी गीत गाये गये , कब दोपहर बीती कब शाम ढल आई पियक्कड़ो को पता ही नहीं चला।
                     शाम ढली तो अपने घर वापस आने की याद आई । रंग गुलाल से सभी के चेहरे पुते हुये थे, अपनी जेब में गुलाल रखे हुये सुनील रेस्ट हाउस से बाहर निकला -और प्रशांत से बोला - पास पड़ोस में भी जाना है आज त्यौहार का दिन है मिलकर आना चहिये।
प्रशांत बोला — ऐसी हालत में कहां जायेंगे?
सुनील बोला — दो चार जगह जाकर मैं होली की भेंट मुलाकात कर के आता हूं । कहकर सुनील एक दो जगह गया और गुलाल लगाकर और मिलकर आ गया । वह अभी भी नशे में मस्त था ,सोचा पड़ोस में सुनीता का घर है बचपन से साथ में पढ़ी है , आज होली का अवसर है उससे भी मिलकर आता हूं ।आज उस पर मस्ती छाई थी वह सुनीता से मिलने के लिए आकुल हो उठा और सुनीता के घर जा पहुंचा । 
                सुनीता के घर में पहुंचते ही उसके भाई रमेश ने - उसे गुलाल लगा कर ,मुंह मीठा करने के लिये मिठाई खिलाई ।
                  परन्तु सुनील की लंपटता को रमेश समझता था । सुनील अपनी धुन में मस्त रमेश से बार - बात सुनीता को बुलाने के लिये कह रहा था ।
सुनील - सुनीता कहां है ?
रमेश - घर का काम कर रही है ।
सुनील - आज होली का दिन है उससे मिलना है ।
रमेश - वह काम कर रही है कहा न ,आप बैठो ।
सुनील - मैं अंदर जाकर उससे मिल लेता हूं कहकर - सुनील अंदर घर की ओर जाने लगा । उसी समय उसका हाव भाव देखकर रमेश बोला चल मिलवाता हूं - कहकर वो और उसका दोस्त करन उसके पीछे - पीछे चल दिये , दोनों ने सुनील के चेहरे पर घर में रखा काला पेंट पोत दिया और अच्छी तरह सुनील की पिटाई कर दी और कहने लगा - बहुत होली मनाने का शौक है तो हम तेरा शौक पूरा कर देते है ।
सुनील बोला - मैं तो ऐसे ही होली पर मिलने आया था ।
रमेश बोला — हमे सब मालूम है तुम कैसे आदमी हो , पहले हमसे होली खेलो , सब तुम्हारी होली निकालते है , बहुत नशा चढ़ा है , पहले अपनी हालत तो देखो , नशे के कारण तुमसे चला भी नहीं जा रहा है ,बोल भी नहीं पा रहे हो और किसी लड़की से मिलने आये हो , चलो तुमको मिलवाता हूं कहकर उसने सुनील की पीठ में चार छः मुक्के जमा दिये।
सुनील बोला - नहीं भाई , मुझे माफ कर दे । मैं त्यौहार मनाने आया था ।
रमेश - तुम क्यों आये हो हमको सब मालूम है, तुम यहां गंदगी फैलाने आये हो ।
तुमको अभी ठिकाने लगाता हूँ कहकर - रमेश ने सुनील को बाथरूम में धकेल दिया और बाहर से बाथरूम का दरवाजा बंद कर दिया , सुनील अंदर से चिल्लाता रहा - भाई मुझे बाहर निकालो ---- मैं क्या गलती किया हूं ? 
रमेश बोला - अब बाथरूम में होली मना, मैं तेरी नियत पहचानता हूं । जब देखो तब मेरे घर आ बैठता है।अब अंदर बैठा रह |
       सुनील के चिल्लाने का रमेश पर कोई असर नहीं हुआ तो सुनील जोर-जोर से दरवाजा पीटने व चिल्लाने लगा - यह आवाजें पड़ोस में गई तो पड़ोसी भी आ गये।
       तभी रमेश की मां ने धीरे से रमेश से कहा - इसे छोड़ दे , क्यों बदनामी कराता है , हमारी भी बदनामी होगी ।
रमेश नहीं माना ,उसने थाने में फोन लगाकर थानेदार को कहा कि - साहब शराब पीकर कुछ असमाजिक तत्व मेरे घर में हुल्लड़ बाजी कर रहे थे, मैने उन्हें बाथरूम में बंद कर दिया है, आप इन्हें ले जाओं यह लोग नगर में अशांति फैला रहे है ।
             फौरन ही दो पुलिस वाले पुलिस की गाड़ी लेकर उसके घर आ गये और सुनील को थाने लेकर चले गये।
              नगर में यह बात हवा की तरह फैल गई , पुलिस - गाड़ी में बैठा - बैठा सुनील बहुत घबरा रहा था, शर्म से मरा भी जा रहा था ,किसी को क्या मुंह दिखाऊंगा मुंह भी कालिक से काला हो गया और पुलिस में केस भी बन गया , सब लोग क्या कहेंगे ? किस - किस को क्या मुंह दिखाऊंगा? सब गुरुजी कहकर मेरा सम्मान करते है ---- और अब स्कूल के स्टाफ व बच्चों के सामने मेरी क्या इज्जत रहेगी ? उसका नशा उतर चुका था , सुनील चुपचाप गाड़ी में बैठा मन ही मन पछताता जा रहा था । तरह - तरह के विचार उसके मन में आ रहे थे , अपनी जमानत लेने के लिये किसको कहे वह समझ नहीं पा रहा था, मन शर्म और ग्लानि से भर गया था ,वो सोचने लगा ----- मैं भी सुनीता से दोस्ती करने चला था ---- अब सुनीता के सामने मेरी क्या इज्जत रही ---- जब रमेश मुझे काला पेंट पोत रहा था , तब सुनीता मुझे देखकर हँस रही थी ---- मैं भी कितनी बड़ी गलती कर बैठा ---- वह मन ही मन प्रतिज्ञा कर रहा था - अब कभी शराब को हाथ नहीं लगायेगा - पियक्कड़ो के साथ नहीं बैठेगा --- वह भगवान से अपने बचाव के लिये प्रार्थना कर रहा था, कभी ---- गणेश जी को मनाता कभी हनुमान जी से कहता इस बंधन से निकलो तुम तो महाबली बजरंग हो ---- न भगवान ने सुनी ना देवी मैया ने , दुर्दैव कोई सहायक नहीं हुआ ,जो भाग्य में बदा था वो होकर रहा । --- थोड़ी से शराब के कारण आदमी वनमानुष बन जाता है , आज मैं स्वयं चक्कर में फंस गया --- मैं स्कूल में क्या मुंह दिखाऊंगा --- ? यह पेंट चेहरे से कैसे निकलेगा ---- वो तो आज होली का दिन है --- मैं अपना ---- मुंह कहां धोऊंगा ? --- यह कालिमा कैसे निकलेगा ? ---- यहां थाने से भी कैसे छूट पाऊंगा ---- मुझे कौन छुड़वायेगा ? यही सोचता रहा ---- इतने में थाना आ गया ।
कांस्टेबिल जोर से बोला - उतर बे शराबी , उसका ध्यान टूटा और वो गाड़ी से उतर कर सिपाही के पीछे - पीछे चलता गया , वह थानेदार के सामने पहुंचा । 
थानेदार कड़क कर बोला - रमेश के घर क्या करने गया था ? 
सुनील बोला — कुछ नहीं साहब होली में मिलने गया था । 
थानेदार बोला - होली मिलने तो सभी जाते है , तू बाथरूम में कैसे घुस गया रे ---- होली मिलन बाथरूम में होली है क्या ?
सुनील - नहीं साहब वो लोग मेरे को बाथरूम में बंद कर दिये ।
थानेदार - वही तो पूछ रहा हूं तेरे को बाथरूम में क्यों बंद किये, कुछ तो बात होगी ? साले --- बदनियती से किसी के घर घुसेगा और उसके घर की बहन बेटी को बुलायेगा तो कोई छोड़ेगा ? 
सुनील घबरा गया ---- कुछ नहीं बोल पाया -- नहीं साहब कोई बदनियती नहीं थी , सिर्फ होली मिलन के लिए गया ---- कहते - कहते उसका चेहरा लाल हो गया पर कालिख के कारण काला ही दिखा ,चेहरा पूरा काला था सिर्फ आंखे चमक रही थी ।
     थानेदार साहब चमकाने लगे --- सालों मार खाने का काम करते हो । इसी समय सुनील का दोस्त रहीम अपने साथ पत्रकार श्री निवास शर्मा को लेकर थाने पहुंच गये। उन्होंने थानेदार साहब से निवेदन किया - कि साहब अब छोड़ दीजिए बेचारा गुरुजी पियक्कड़ लोगो की संगत में फंस गया है उसकी नौकरी का सवाल है ,कोई केस मत बनाओ - वैसे भी बेचारे की बहुत फजियत व बदनामी हो चुकी है ।
          थानेदार साहब ---- हम भी क्या करे नियमों से बंधे है, इसको भी टीचर होकर किसी की बहन बेटी पर नजर नहीं रखना चाहिये ।
  श्री निवास शर्मा बोले - साहब आपकी बात ठीक है परंतु अब माफी दीजिये इसकी नौकरी और भविष्य का सवाल है ।
             थानेदार साहब भले आदमी थे रहीम व श्री निवास के समझाने पर मान गये, उन्होंने सुनील को छोड़ दिया । वे दोनों सुनील को लेकर आ गये ,अब सवाल यह था मुंह पर लगी कालिमा कैसे निकाली जाय ? कहां जायं तो बात न फैले । वे तीनों फिर रैस्ट हाउस पहुंचे वहां पर चौकीदार नहीं था, रैस्ट हाउस बंद था । फिर वे तीनों तालाब पहुंचे । बाजार से पेंट रिमूवल लाकर चेहरे का पेंट धोया गया । बहुत मेहनत कर के चेहरा साफ किया । ज्यादा रगड़ने से चेहरे की खाल भी छिल गई , चेहरा दर्द करने लगा फिर भी सुनील चेहरा साफ करने में लगा था ।
              खबर फैलने लगी , फिर भी सुनील बेशरमी से उस कालिख को होली का रंग कहकर हंस देता था । अपनी तरफ से नमक मिर्च और लगा देता था ,पर दिल पर जो गुजरी वो वही जनता था ।
             चेहरे की कालिमा तो छूट गई पर दिल पर लगा दाग नहीं मिटता । फिर उसने कभी शराब का नाम नहीं लिया कोई युक्ति, कोई उपदेश , कोई तर्क , उस पर शायद इतना प्रभाव नहीं डालता ,जितना इस घटना ने डाला । शायद यह कोई ईश्वरीय विधान था जो सुनील को शराब छुड़ाने का कारण बना।उसने यह बात अपने घरवालों को कभी नहीं बताई ।पर शराब न पीने का प्रचार - प्रसार वह जरूर करता रहता था। यह घटना जब भी उसे याद आती तो वो बेचैन हो जाता था, उसके रोंगटे खड़े हो जाते , वो सिहर जाता ।उसके दिल पर उस समय जो गुजरी वह कभी किसी से कह नहीं पाया ।
फिर वह सुनीता से भी कभी नहीं मिला वह भी उसके दिल दिमाग से निकल गई ।

                                                                  छत्तीसगढ़ रत्न 

डॉ. शिरोमणि माथुर
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shiromanimathur@gmail.com