Kalu ki Pahadi in Hindi Spiritual Stories by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | कालू की पहाड़ी - 13

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कालू की पहाड़ी - 13

बुजुर्ग की आंखों से बहते आंसू अब उनकी सफेद दाढ़ी को भिगो रहे थे।


उन्होंने एक लंबी सांस ली और उस रात का वह खौफनाक मंजर बयान करना शुरू किया, जिसने एक देवता जैसे इंसान को शैतान बना दिया। 



यह कहानी केवल एक हत्या की नहीं, बल्कि उस विश्वासघात की है जिसने इस पूरी पहाड़ी को अभिशप्त कर दिया।



उम्मीदों का फूलों वाला रास्ता


अमावस्या की वह रात थी, लेकिन कल्याण सिंह (कालू) के दिल में पूर्णिमा जैसा उजाला था। वह अपनी धुन में मगन था। 


उसने पूरे दिन की मेहनत के बाद पहाड़ियों से सबसे सुंदर और सुगंधित जंगली फूल जमा किए थे। उसने महादेव के छोटे से मंदिर से लेकर पगडंडी तक फूलों की एक घनी चादर बिछा दी थी।



वह चाहता था कि जब मीना उसकी दुल्हन बनकर आए, तो उसके पैर मिट्टी को न छुएं।


कालू अपनी बांसुरी निकालता है और एक ऐसी धुन बजाता है जिसमें मिलन की आस थी। वह बार-बार मंदिर की ओर देखता और फिर रास्ते की ओर। 



उसने मन ही मन सोच रखा था कि आज वह मीना के साथ सात फेरे लेगा और उसे अपनी उस झोपड़ी में ले जाएगा।


जहाँ उसकी बूढ़ी माँ नई बहू के स्वागत के लिए पलकें बिछाए बैठी होगी। वह बहुत खुश था, उसे लग रहा था कि आज उसकी गरीबी और एकाकीपन का अंत होने वाला है।



छलावे का प्रवेश और जागीरदार का आगमन


जैसे ही मीना ने उस फूलों वाले रास्ते पर अपना पहला कदम रखा, कालू की आँखों में चमक आ गई। वह अपनी बांसुरी बजाते हुए उसकी ओर बढ़ा। 


"मीना! देखो, मैंने तुम्हारे लिए पूरा रास्ता सजाया है। आज महादेव हमें एक कर देंगे।"


लेकिन मीना के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। उसके कदम थिरक नहीं रहे थे, बल्कि वे सधे हुए थे, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार की ओर बढ़ता है। 



मीना आगे बढ़ रही थी तभी अचानक, पास की झाड़ियों में एक सरसराहट हुई। कालू ठिठक गया। "इतनी रात को यहाँ कौन है?" उसने सोचा।



तभी अंधेरे को चीरता हुआ एक ऊँची काठी वाला, रेशमी लिबास पहने शख्स बाहर निकला। वह सेठ प्रेमचंद था—पास के गाँव के जागीरदार का इकलौता बेटा।


उसके हाथ में चांदी की मूंठ वाली एक चमचमाती कुल्हाड़ी थी। कालू उसे देखकर दंग रह गया। "जागीरदार साहब? आप यहाँ इतनी रात को? आपको किसने रास्ता दिखाया?"


कालू को लगा कि शायद सेठ रास्ता भटक गए हैं, लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसने कालू के होश उड़ा दिए।



मीना ने बिना डरे, बिना झिझके, प्रेमचंद की ओर हाथ बढ़ाया और प्रेमचंद ने बड़ी बेशर्मी से मीना का हाथ थाम लिया।



विश्वासघात का कड़वा सच


जब कालू ने यह सब देख तो कालू का गला सूख गया। वह हकबकाकर बोला, "मीना... यह क्या है? तुमने जागीरदार साहब का हाथ क्यों पकड़ा है? हटाओ अपना हाथ!"



तभी प्रेमचंद के चेहरे पर एक शैतानी और रईसी मुस्कान उभरी। उसने मीना को अपनी ओर खींचा और कालू की ओर देखकर ठहाका लगाया। 



"कालू! तू सचमुच कितना बड़ा मूर्ख है। तुझे क्या लगा, यह अप्सरा जैसी लड़की तेरे जैसे मामूली चरवाहे, लकड़हारे के साथ अपनी ज़िंदगी गुज़ारेगी? तेरी उस बदबूदार झोपड़ी में रहेगी?"



जागीरदार की यह बात सुनकर कालू अभी भी सदमे में था। उसने कांपते स्वर में कहा, "साहब, आप क्या कह रहे हैं? 



मीना मुझसे प्यार करती है। आपको कोई गलतफहमी हुई है। मीना, बताओ इन्हें कि हम शादी करने वाले हैं।"



तब मीना ने अपना असली चेहरा दिखाया। उसने कालू की आँखों में आँखें डालकर कहा, "कैसी शादी कल्याण सिंह? तुझे क्या लगा, मैंने तुझसे जो दो मीठी बातें कीं, वह प्यार था?


वह तो सिर्फ  मेरा स्वभाव है मैं किसी से भी बात करती हूं ऐसे ही करती हूं। मुझे जागीरदार साहब की रानी बनना है, तेरी झोपड़ी की नौकरानी नहीं।


और मैं तुझसे प्यार करूंगी मैं तो तुझे अपना भाई मानती थी। तूने यह सोच भी कैसे लिया कि मैं तुझसे प्यार कर सकती हूँ? तू तो मेरे पैरों की धूल के बराबर भी नहीं है।"



वह खूनी प्रहार और महादेव की पुकार


मीना के ये शब्द कालू के सीने में किसी खंजर की तरह उतरे। उसका विश्वास, उसका संसार, उसका ईश्वर—सब एक पल में बिखर गया। 



वह टूटकर वहीं फूलों के रास्ते पर घुटनों के बल बैठ गया। उसकी आँखों से आंसू नहीं, बल्कि खून उतर आया था।



मीना ने निर्दयता से प्रेमचंद की ओर देखा और इशारा किया, "खत्म करो इसे प्रेमचंद! वरना यह हमारे पीछे लगा रहेगा।"



मीना का इशारा पा कर प्रेमचंद ने अपनी चांदी वाली कुल्हाड़ी हवा में लहराई। कालू अभी अपने गम में डूबा हुआ नीचे बैठा ही था कि प्रेमचंद ने पहला वार उसकी पीठ पर किया।



'खचाक!' कालू के मुँह से एक ऐसी चीख निकली जो पूरी पहाड़ियों में गूँज उठी। वह ज़मीन पर गिर पड़ा।



"महादेव!" उसने अपने आराध्य को पुकारा। लेकिन प्रेमचंद रुका नहीं। उसने दूसरा वार किया, फिर तीसरा। कालू का शरीर खून से लथपथ हो गया। 



मीना यह सब देखकर डरी नहीं, बल्कि उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी, जैसे कोई कांटा रास्ते से हट गया हो।



कालू अपनी आखिरी ताकत बटोरकर खड़ा हुआ। वह लड़खड़ाता हुआ, रेंगता हुआ उस महादेव के मंदिर की ओर बढ़ने लगा। 



वह लहूलुहान हालत में चिल्ला रहा था, "महादेव! मुझे बचाओ! इस धोखेबाज ने मेरे साथ बहुत बुरा किया है!" उसके खून की बूंदें उन फूलों पर गिर रही थीं जो उसने मीना के स्वागत के लिए बिछाए थे।



अंतिम धक्का और शाप का जन्म


कालू जैसे-तैसे उस चोटी के किनारे महादेव के छोटे से शिवलिंग के पास पहुँचा। उसे लगा कि शायद महादेव कोई चमत्कार करेंगे। 



लेकिन मौत उसके सिर पर खड़ी थी। प्रेमचंद और मीना हँसते हुए उसके पीछे-पीछे वहाँ तक पहुँच गए।



प्रेमचंद ने कुल्हाड़ी नीचे रखी और कालू के बालों को पकड़कर उसे खाई की ओर झुका दिया। मीना पास आई और उसने कालू के कान में कहा, "जा अपने महादेव के पास, शायद वहीं तुझे शांति मिले।"



और फिर, उन दोनों ने मिलकर कालू को हज़ारों फीट गहरी खाई में धक्का दे दिया। गिरते वक्त कालू की नज़रें उस मंदिर के कलश पर थीं।


मरते वक्त उसकी भक्ति नफरत में बदल गई। उसने कसम खाई कि जिस महादेव ने आज उसे नहीं बचाया, वह उसी महादेव की इस पहाड़ी को श्मशान बना देगा।



उसकी मौत सामान्य नहीं थी। उसकी रूह उस धोखे की आग में जलने लगी। उसी पल आसमान में बिजली कड़की और पहाड़ियों ने एक भयानक सन्नाटा ओढ़ लिया।



कल्याण सिंह मर चुका था और 'कालू' का जन्म हो चुका था।



बुजुर्ग ने कहानी खत्म की और कार्तिक को देखा। "बेटा, वह आज भी वहीं गिर रहा है। हर रात वह उसी मौत को दोबारा जीता है।


उसे मुक्ति तभी मिलेगी जब वह जान लेगा कि महादेव ने उसे नहीं छोड़ा था,


कार्तिक की आंखों में से आंसू टपक रहे थे, और उसने इस टपकते आंसू से पूछा।  बाबा उस धोखेबाज मीना और उस जमींदार का क्या हुआ।



बुजुर्ग ने बेटा कालू टो मर चुका था, उसके मरने के चार दिन बाद उन दोनों शादी की बहुत धूम धाम से पर रात को कहते है।



मीना इतनी खुशी की उसकी जमींदार से शादी हो गई और अब वह इस राज, महल की रानी बनकर रहेगी।  और दोनों ने उसे, रात इतनी ज्यादा दारु पी।


के दारु पीते पीते ही उनकी मौत हो गई पर कोई तो, यह भी कहता है कि यह कोई साधारण मौत,नहीं थी उन दोनों को किसी भूत प्रेत ने,


मारा है हो सकता है कालू ने ही अपनी मौत का बदला लिया हो।



कहानी खत्म हो चुकी थी और अब कार्तिक कहता है बाबा मुझे बताइए कि उसे कल्याण सिंह कालू को कैसे मुक्ति दिलाए ताकि वह इस दलदल से बाहर निकल सके।


जो वह निर्दोष लोगों को मार रहा है अपनी प्रतिशोध में उसका यह प्रतिशोध एक प्रेम में बदल जाए।



बुजुर्ग ने अपनी कांपती हुई लालटेन को एक तरफ रखा और कार्तिक के करीब आकर फुसफुसाते हुए बोले, "बेटा, मौत को जीतना आसान है, लेकिन एक प्यासी और प्रतिशोधी रूह को शांत करना सबसे कठिन। 


अगर तू कालू को इस दलदल से निकालकर मुक्त करना चाहता है, तो तुझे ये तीन काम हर हाल में पूरे करने होंगे:"