Paths - 16 in Hindi Classic Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 16

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राहें - 16

स्थान बुलाता है

शारदा के पुत्र तरूण के ससुर के हृदयघात से मृत्यु का
समाचार जब से आया है, घर मे कोहराम मचा हुआ है। तरूण की
पत्नी प्रिया रोये ही जा रही थी। बार-बार अपने पिता को याद करके
रो रही थी। पत्नी को ज्यादा दुखी देखकर तरूण पत्नी से बोला-
धीरज रखो मैं अभी तुमको तुम्हारे मायके ले चलता हूँ। तुम तैयारी
करो। प्रिया -मायके जाने की तैयारी करने लगी- वह इस आशा में
थी कि समय पर पहुँच गई तो पिता को आखिरी बार देख सकूंगी।
तरूण व प्रिया को जाते देखकर शारदा ने भी उनके साथ जाने का
प्रोग्राम बना लिया।
इसी बीच शारदा के भाई शरद भी इस दुखद समाचार को
सुनकर आये। उन्होनें भी तरूण व प्रिया को समझाया व धीरज
दिया।
शरद और शारदा दोनों भाई बहन का माउन्ट आबू जाने का
प्रोग्राम पहले से तय था। ट्रेन में दोनों का रिजरवेशन भी हो चुका
था। नियत तिथि पर उन लोंगों को जाना भी था। इस बीच शारदा
के पुत्र तरूण के ससुर की मृत्यू का समाचार आने पर घर में बहू के
दुखी होने व मायके जाने के प्रोग्राम के कारण शारदा ने भी उन लोगों
के साथ यू, पी. जाने का विचार बना लिया। शारदा ने सोचा यदि वह
प्रिया के साथ उसके पिता के देहावसान पर नहीं जायेगी तो प्रिया
सोचेगी कि सासु मॉँ को मेरे पिता की मृत्यु पर कुछ संवेदना नहीं है,
इसलिये वह मेरे साथ नहीं जा रहीं हैं, दुविधा में फंसी शारदा ने
तरूण व प्रिया के साथ जाने का विचार बना लिया।

तरूण और प्रिया अपने जाने की तैयारी करने लगे तो एकान्त
पाकर शरद ने शारदा से कहा- दीदी यदि तुम इन लोगों के साथ
यू.पी. चल दोगी तो माउन्ट आबू जाने का हमारा प्रोग्राम का क्या
होगा?
शारदा बोली - भैया माउन्ट आबू अब कैसे जा पाऊंगी? ये
दोनो यू.पी. जा रहे हैं, मैं भी इनके साथ जा रही हूँ और इसी बीच
माउन्ट आबू के रिजरवेशन की तिथि भी है, वह तो अब कैसिल ही
समझो।
शरद ने कहा - दीदी तुम नहीं जाओगी तो मुझे भी बच्चे अकेले
माउन्ट आबू जाने नहीं देगें मेरा भी वहाँ का प्रोग्राम कैंसिल हो
जायेगा- इसलिये तुम अभी इन लोगों के साथ मत जाओ, माउन्ट
आबू से आने के बाद हम लोग यू.पी. जाकर सब रिश्तेदारों से मिल
आयेगें।
शारदा बोली - भैया बेटा-बहु के सामने आप ही इस बात को
ठीक से रखो जिससे उन्हें बुरा भी ना लगे और हमारा माउन्ट आबू
जाने का प्रोग्राम भी पूरा हो जाये।
शरद ने कहा - "मैं बाहर जाकर बात करता हूँ।"
शरद ने तरूण से कहा कि तुम अभी प्रिया के साथ यू पी. चल
दो। शारदा के साथ रहने से तुमको भी परेशानी होगी। तुम वहाँ
ससुराल में उन लोगों को सहारा देने में व्यस्त रहोगे, शारदा दीदी
भी इतने दिन वहाँ कहॉँ रहेगी ? तुम्हारी और दीदी की बात में फर्क
है, दीदी और मैं बाद में यू.पी. जाकर उन सब से मिल आयेंगें।
तरूण ने भी शरद की बातों का समर्थन किया कि पता नहीं यू.
पी. में कितने दिन रूकना हो, ऐसे में मम्मी को हमारे साथ परेशानी
होगी। यही सोचकर वे लोग यू.पी. चले गये और शारदा घर में रह
गई।
नियत तिथि पर शारदा और शरद माउन्ट आबू के लिये चल
दिये। ट्रेन में यात्रा के बीच रात में शारदा और शरद ने खाना


साथ-साथ खाया और अपनी अपनी सीट पर दोनों सोने चले गये ।
सुबह शारदा की ऑँख खुली तो उसने देखा शरद अपनी सीट पर
नही हैं उसने सोचा भैया बाथरूम गये होंगें, आते होंगे, चलती ट्रेन
में कहाँ जायेंगें? अगले स्टेशन पर ट्रेन रूकी तो भी शरद नहीं आये
तो शारदा को चिंता हुयी कि भैया वापस सीट पर क्यों नहीं आये
उसने सहयात्रियों से भैया का पता लगाने के लिये कहा। भिलाई से
ब्रहमाकुमारी का पूरा ग्रप माउन्ट आबू जा रहा था, उन्हीं के साथ
शरद और शारदा भी थे। भैया का कहीं पता नही चला तो शारदा
स्वयं शरद को खोजने निकली। सब बाजू वाली बोगी में, बाथरूम जा
रहे थे इस बोगी में पानी नहीं था शारदा बाजू वाली बोगी में गई तो
उस बोगी के तीन बाथरूम खुले थे एक बाथरूम बंद था।
बंद बाथरूम के पास वाली सीट पर बैठे यात्रियों से शारदा ने
पूछा- इस बाथरूम में कौन गया है?
सहयात्री ने कहा- "एक आदमी बहुत देर से गया था बाहर
नहीं निकला है।'
शारदा ने भी बाथरूम के दरवाजे पर धरक्का मारा जोर से
खोलने के लिये भी कहा परन्तु अन्दर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी।
शारदा घबरा गई। उसे कुछ अनहोनी का अभास हुआ, ट्रेन
चलती जा रही थी, शारदा भिलाई के अपनी संस्था के भाईयों से
आकर बोली- लगता है भैया उस बाथरूम में है, वह बाथरूम अंदर
से बंद है खुलता नहीं है। आप लोग वहाँ चलकर कुछ उपाय करो।
कई साथी लोग उस बाथरूम के पास गये बाहर से दरवाजा
खोलने का प्रयास किये पर सब व्यर्थ था।
अगले स्टेशन पर ट्रेन रूकने पर बाहर खिड़की से देखा कि
बाथरूम में भैया गिरे पड़े थे। स्टेशन पर कुलियों की सहायता से
खिड़की से छड के द्वारा दरवाजे की सिटकनी खोली गई तो भैया को
बाहर निकाला गया। बाथरूम में ही भैया को हार्टेअटैक आ गया था
और भैया वहीं गिरकर खत्म हो गये थे।

संस्था के सभी सदस्य व बहनें घबरा गये। अगले नादियाड
स्टेशन पर शारदा व अन्य कुछ भाई व बहनजी ने शरद के शव को
उतारा और स्टेशन पर पुलिस को सूचना दी।
अब शब को वापस लाना था। सबकी अपनी अपनी राय और
सुझाव थे। शारदा बहुत घबरा गई कि कैसे किया जाये-- कुछ लोंगों
का कहना था कि शव का दाह संस्कार यहीं कर दिया जाये- शारदा
इस बात पर राजी नहीं थी। घर द्वार छोड़कर रास्ते में दाह संस्कार
कर दिया जाये तो परिजन क्या कहेंगें? शव को वापस लाया जाये
तो कैसे? टैक्सी वाले तैयार नहीं हो रहे थे- बिना पोस्टमार्टम के
लाने से खतरा था और पोस्टमा्टम के बाद शव जल्दी खराब हो
जाता है तो टैक्सी से लाना सम्भव नहीं था। घर पर खबर की गई
तो बच्चे भी सब घबरा गये कि जब गये तो शरद ठीक थे, रास्ते में
क्या हो गया ? तय हुआ शव हवाई जहाज से लाया जाये ।
हवाई जहाज से शव लाने के लिये पैसों की आवश्यकता थी।
इतना पैसा लेकर ये लोग नहीं गये थे। माउन्ट आबू तक आने जाने
खाने की व्यवस्था पहले ही हो चुकी थी। वे लोग थोड़ा बहुत पैसा
रखे थे। नया शहर नये लोग बहुत परेशानी में शारदा आ गई। शारदा एकदम घबरा गई उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाय?--- आज वो भैया के शव के साथ अकेली --- कैसे शव को घर तक ले कर जाय --- इतने बड़े परिवार में आज सहारे के लिए कोई भी नहीं है --- अनजान नगर नए लोग, जिनसे कुछ बोल भी नहीं सकती है, वो अपने को बहुत अकेला समझ रही थी।--- रास्ते में उसके पास पैसे भी कम थे हवाई जहाज से लाने में पैसे भी ज्यादा लगेंगे, वो सोचती रही। मन में अनेकों खयाल आ जा रहे थे।
संस्था के सदस्यों के सहयोग से पैसे की व्यवस्था हो गई । शव बिना
पोस्टमार्टम के जा नही सकता था। नादियाल शहर में शव का
पोस्टमार्टम हुआ और पुलिस से सर्टिफिकेट लेकर शव टैक्सी से
अहमदाबाद लाया गया क्योंकि नादियाड़ में हवाई अड़डा नहीं था
उस समय अहमदाबाद से रायपुर के लिये कोई सीधी हवाई सेवा भी
नहीं थी। शव को डाक्टर के पास अहमदाबाद में फिर से ले जाया
गया और ताबूत में पैक करवाकर शरद के शव को बाम्बे होते हुये
नागपुर तक लाया गया। परिजन नागपुर से शव को लेकर दल्ली
राजहरा आये और परिजनों ने सब की उपस्थिति में अंतिम संस्कार
किया। शारदा सोचती ---इतना बड़ा परिवार परन्तु भैया के अंतिम समय में कोई
भी सामने नहीं था।यात्रा में उसे अकेले शरद के म्रत्यु पश्चात्‌ शरीर को घर लाने में बहुत परेशानी हुयी। म्रत्यु 


शरद को कहाँ से कहा ले गई। माउन्ट आबू पहुँच भी नहीं पाये, बीच
में ही शरद संसार से बिदा हो गये, शारदा के यू. पी. जाने के प्रोग्राम
को कैंसिल कराकर माउन्ट आबू के रास्ते में ट्रेन में हृदयघात से
शरद का संसार से यों चले जाना , सभी को आश्चर्य चकित कर गया।
किसी ने सच ही कहा है - व्यक्ति को जहाँ दाना-पानी मिलना
होता है, व्यक्ति उस स्थान पर पहुँच ही जाता है, उसी प्रकार जिसकी
जहाँ मौत लिखी होती है, वो स्थान व्यक्ति को अपने पास बुला ही लेता
है। यू पी जाते जाते शारदा भी शरद के साथ माउंट आबू के लिए चल दी और रास्ते में ही शरद खत्म हो गए । बिधि के विधान को कौन टाल सकता है?

छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर 
दल्ली राजहरा
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