A Simple Love Story - 6 in Hindi Love Stories by Anamika books and stories PDF | एक आम सी प्रेम कहानी - 6

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एक आम सी प्रेम कहानी - 6

​एक आम सी प्रेम कहानी

भाग -६

लेखिका "अनामिका"

भाग - ६: चार साल बाद – दो अलग दुनियाएँ

​समय अपनी रफ्तार से बीतता गया और देखते ही देखते चार साल का लंबा वक्त गुजर गया।

​°लड़की का घर और उसकी दुनिया (निहारिका - कॉलेज स्टूडेंट)

​निहारिका अब स्कूल की दहलीज लांघकर कॉलेज के फर्स्ट ईयर में पहुँच चुकी थी। लेकिन उसके मिजाज में कोई बदलाव नहीं आया था—वही खिलखिलाती मुस्कान, वही नादानियाँ और वही चुलबुलापन। घर में वह आज भी सबकी लाडली थी। सुबह उसकी चहक से ही घर की शुरुआत होती और उसकी बेफिक्र बातें पूरे माहौल में ताज़गी भर देती थीं।

​कॉलेज की नई दुनिया और नए दोस्तों के बीच भी, उसके दिल का एक कोना वहीं रुका हुआ था। वह अपने उस पहले प्यार को भूल नहीं पाई थी। वे दिन जब दोनों के बीच कोई लंबी बातें नहीं होती थीं, बस एक बुक स्टोर में हुई छोटी सी नोकझोंक और एक-दूसरे का नाम जानना ही तो था उनके पास। फिर भी, चार साल बाद भी वह नाम और वह खामोश एहसास उसके दिल में उतने ही ताज़ा थे।

​उसकी आँखों के सामने अक्सर वह आखिरी दिन तैर जाता—जब वह अपने पापा के साथ कार में बैठकर हॉस्टल के लिए निकल रही थी। उसकी आँखों से छलकते आँसू और दिल में छाई वह उदासी... वह मंज़र आज भी उसे भावुक कर देता था।

°​लड़के की ज़िम्मेदारी और बदलता नज़रिया (मलय - वर्किंग)

​दूसरी तरफ, मलय की जिंदगी बेफिक्री से निकलकर पूरी तरह जिम्मेदारियों के घेरे में आ चुकी थी। कॉलेज खत्म होते ही उस पर परिवार को संभालने और घर के खर्चे उठाने का बोझ आ गया था। वह अब एक नौकरीपेशा इंसान बन चुका था। रोज अपनी बाइक से एक नए और लंबे रास्ते से दफ्तर जाना, काम में उलझे रहना और शाम को थक-हारकर लौटना—यही उसकी रोजमर्रा की जिंदगी बन गई थी।

​जिंदगी के इस व्यावहारिक मोड़ ने उसे बहुत गंभीर और समझदार बना दिया था। उसके दिमाग में भी उस आखिरी दिन की धुंधली सी याद अब भी कहीं दबी हुई थी—कार की खिड़की से उदास नज़रों से देखती हुई वह लड़की, जो तब 10th क्लास में थी और हॉस्टल जा रही थी। दोनों बिना कुछ कहे बस एक-दूसरे को दूर जाते देख रहे थे।

​लेकिन चार साल के इस लंबे अंतराल, रोज़मर्रा की भागदौड़ और परिवार की चिंताओं ने उसके व्यवहार को काफी शांत और सीरियस बना दिया था। उसे लगता था कि वह अतीत का एक मासूम सा पन्ना था, जबकि अब जिंदगी बड़ों वाली वास्तविकताओं से चल रही थी।

कुछ दिनों बाद....

धीमी-धीमी बरसात हो रही थी। बाज़ार की एक पुरानी दुकान के शेड के नीचे खड़ा मलय बारिश से बचने की कोशिश कर रहा था। तभी उसकी नज़र हाथ में छाता लिए अपनी तरफ़ आती एक लड़की पर पड़ी। वह सीधे उसी के पास आकर रुकी।

​"हेलो!" लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा।

​मलय ने उसे ध्यान से देखा, पर पहचान नहीं पाया। उसने झिझकते हुए पूछा, "अह... हेलो! क्या हम एक-दूसरे को जानते हैं?"

​निहारिका ने अपनी आँखें मटकाते हुए शरारती और हल्के तंज भरे अंदाज़ में कहा, "हाँ, अब आप भला मुझे कैसे पहचानेंगे... अब मैं कोई बच्ची थोड़ी न रही!"

​ये शब्द सुनते ही मलय के दिमाग में पुरानी यादें कौंध गईं। 'नाइंथ क्लास की वही छोटी लड़की...!' दोनों के बीच कुछ सेकंड के लिए एकदम खामोशी छा गई। पुरानी बातें और समय का बितना दोनों की आँखों में तैर गया।

​सन्नाटा तोड़ते हुए मलय ने मुस्कुराकर कहा, "अरे! तुम... इतनी बड़ी हो गई हो कि सच में पहचानना मुश्किल था। आजकल क्या चल रहा है? पढ़ाई कहाँ तक पहुँची?"

​"स्कूल खत्म हो गया है, बस अभी-अभी कॉलेज जाना स्टार्ट किया है। फर्स्ट ईयर है मेरा," निहारिका ने उत्साह से जवाब दिया। "और आप सुनाइए? आप अभी भी वहीं हैं या कुछ नया?"

​"अब तो एक कंपनी में जॉब कर रहा हूँ। लाइफ थोड़ी बिज़ी हो गई है," मलय ने मुस्कुराते हुए कहा।

​"ज़ाहिर है, बड़े लोग जो हो गए हैं!" निहारिका ने चुटकी ली।

​दोनों इस बात पर हँस पड़े। इतने में बारिश की बूँदें थम गईं और आसमान साफ़ होने लगा। निहारिका ने छाता बंद करते हुए कहा, "चलिए, बारिश रुक गई, तो मुझे अब निकलना होगा।"

​निहारिका मुड़कर जाने ही लगी थी कि इस बार मलय ने खुद पहल की और झिझक मिटाते हुए कहा, "सुनो... अगर बुरा न लगे तो क्या अपना नंबर दोगी? ताकि इस बार बात फिर से न छूट जाए।"

​निहारिका ने मुस्कुराकर देखा और अपना नंबर उसके फोन में डायल कर दिया। ओर वो दोनो अपने अपने रास्ते चले गये।

°लड़के का नजरिया: (मलय)

इतने बरसों बाद उसे देखा, तो लगा जैसे जिंदगी की सारी नीरसता पल भर में बह गई हो। जब वह ऑफिस के दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी। जो इंसान हमेशा फाइलों में खोया रहता था और बस काम से काम रखता था, आज वह सहकर्मियों को देखकर मुस्कुरा रहा था। कलीग्स एक-दूसरे को कोहनी मारकर फुसफुसा रहे थे—"आज सर को क्या हो गया? इन्हें हँसते हुए आखिरी बार कब देखा था?" दिन भर मीटिंग्स और काम के बीच उसका दिमाग भले ही व्यस्त रहा, लेकिन दिल में वही एक चेहरा घूम रहा था। जैसे ही शाम को घर पहुँचा और थकावट ने घेरना चाहा, उसे याद आया कि कोई उसका इंतज़ार कर रहा है और उसने बिना देर किए कॉल मिला दिया।

°​लड़की का नजरिया: (निहारिका)

उधर कॉलेज की बेंच पर बैठी लड़की का दिल किसी भी क्लास में नहीं लग रहा था। प्रोफेसर क्या पढ़ा रहे हैं, उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसकी नजरें हर दो मिनट में फोन की स्क्रीन पर चली जातीं। उसके पास लड़के का नंबर सेव नहीं था, फिर भी वह बार-बार स्क्रीन साफ करती, नेटवर्क के डंडे गिनती और यह पक्का करती कि फोन साइलेंट पर तो नहीं है। "कहीं नेटवर्क चला गया तो? कहीं बैटरी खत्म हो गई तो?"—यह डर उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था। घर लौटने के बाद भी वह कमरे में टहलती रही और फिर शाम को अचानक उसके फोन की स्क्रीन जल उठी।

छटा भाग समाप्त,  कहानी जारी हे.....