Shakti ke Shiv - 11 in Hindi Women Focused by sheetal books and stories PDF | Shakti ke Shiv - 11

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Shakti ke Shiv - 11

शिवाय और कुशल की एसयूवी शहर की तंग गलियों से निकलकर एक पुराने मोहल्ले में पहुँची।
गाड़ी एक साधारण से दोमंज़िला मकान के सामने आकर रुकी।
कुशल ने बाहर नज़र दौड़ाई।
"यही पता है, सर।"
शिवाय ने बिना कुछ कहे दरवाज़ा खोला और नीचे उतर गए।
मकान पुराना था, लेकिन साफ़-सुथरा। बरामदे में तुलसी का चौरा बना था और दरवाज़े पर पीतल की घंटी लगी हुई थी।
कुशल ने आगे बढ़कर घंटी बजाई।
कुछ ही क्षण बाद दरवाज़ा खुला।
करीब पैंतालीस वर्ष का एक व्यक्ति सामने खड़ा था। उसकी नज़र पहले कुशल पर गई, फिर शिवाय पर टिक गई।
"जी... किससे मिलना है?"
शिवाय ने शांत स्वर में कहा—
"हमें आपके पिता के पुराने रिकॉर्ड के बारे में बात करनी है।"
यह सुनते ही उस व्यक्ति के चेहरे का रंग हल्का-सा बदल गया।
उसने कुछ पल तक दोनों को गौर से देखा, फिर धीमे स्वर में पूछा— "आप लोग... आखिर हैं कौन?"

कुशल ने शिवाय की तरफ़ देखा, मानो उनके इशारे का इंतज़ार कर रहा हो।
शिवाय ने बिना किसी हड़बड़ी के उस व्यक्ति की आँखों में देखा।
"हम यहाँ किसी परेशानी के लिए नहीं आए हैं।"

उनकी आवाज़ हमेशा की तरह शांत थी।
"हमें सिर्फ़ कुछ पुराने सवालों के जवाब चाहिए।"
वह व्यक्ति अब भी असमंजस में था।
"मेरे पिता को गुज़रे हुए पंद्रह साल हो चुके हैं। उन्होंने कभी किसी रिकॉर्ड का ज़िक्र नहीं किया।"

"हो सकता है..." शिवाय ने धीमे स्वर में कहा,

"...उन्होंने आपको सब कुछ न बताया हो।"
यह सुनते ही उस व्यक्ति के चेहरे के भाव बदल गए।
वह कुछ पल चुप रहा, फिर धीरे से बोला—
"अंदर आइए।"
तीनों बैठक में आकर बैठ गए।
कमरे की दीवारों पर पुराने फ़ोटो टंगे थे। एक कोने में लकड़ी की अलमारी रखी थी, जिस पर वर्षों की धूल जमी हुई थी।
उस व्यक्ति ने अलमारी की तरफ़ देखा।
"पिताजी अपनी ज़रूरी चीज़ें इसी में रखते थे।"
वह कुछ क्षण रुका।
"उनके जाने के बाद मैंने इसे कभी खोलने की ज़रूरत नहीं समझी।"
कुशल ने एक नज़र शिवाय की तरफ़ देखा।
शिवाय की नज़र अब उस पुरानी अलमारी पर टिकी हुई थी।
उन्हें महसूस हो रहा था...
शायद वर्षों से जिस सच की तलाश थी...
उसकी पहली असली कड़ी इसी अलमारी के भीतर छिपी थी।

वह व्यक्ति धीरे-धीरे अलमारी के पास पहुँचा।

उसने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली और ताला खोल दिया।

अलमारी का दरवाज़ा खुलते ही पुराने कागज़ों और धूल की हल्की-सी गंध पूरे कमरे में फैल गई।

उसने एक-एक करके पुरानी फ़ाइलें, रजिस्टर और डायरियाँ बाहर निकालनी शुरू कर दीं।

कमरे में सन्नाटा था।

शिवाय की नज़र हर कागज़ पर टिकी हुई थी।

करीब दस मिनट तक सब कुछ देखने के बाद भी उन्हें कोई ऐसा रिकॉर्ड नहीं मिला जिसकी उन्हें तलाश थी।

वह व्यक्ति निराश स्वर में बोला—

"सर... शायद आप गलत जगह आ गए हैं।"

कुशल ने भी चारों ओर नज़र दौड़ाई, लेकिन उसे भी कुछ नहीं दिखा।

तभी...

शिवाय की नज़र अलमारी के सबसे निचले खाने पर गई।

धूल की मोटी परत के पीछे लकड़ी का एक छोटा-सा खांचा बना हुआ था।

उन्होंने बिना कुछ कहे उँगलियों से धूल हटाई।

"ये क्या है?"

वह व्यक्ति चौंक गया।

"मुझे... मुझे नहीं पता। मैंने इसे पहले कभी नहीं देखा।"

शिवाय ने खांचे को हल्का-सा दबाया।

टक...

हल्की-सी आवाज़ के साथ लकड़ी का छिपा हुआ हिस्सा बाहर की ओर खुल गया।

अंदर एक पुराना, पीला पड़ चुका कपड़े का लिफ़ाफ़ा रखा था।

कमरे में मौजूद तीनों लोगों की नज़र उसी लिफ़ाफ़े पर टिक गई।

शिवाय ने धीरे से उसे अपने हाथ में उठाया...

लेकिन खोला नहीं।

उन्होंने कुशल की तरफ़ देखा।

"दरवाज़ा बंद कर दो।"

कुशल तुरंत उठकर बाहर गया और कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया।

शिवाय ने एक गहरी साँस ली...

और फिर उस पुराने लिफ़ाफ़े की डोरी खोलने लगे...

कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था।

शिवाय ने धीरे-धीरे पुराने लिफ़ाफ़े की डोरी खोली।

अंदर कुछ पीले पड़ चुके कागज़ और एक धुंधली-सी पुरानी तस्वीर रखी थी।

उन्होंने सबसे पहले तस्वीर उठाई।

तस्वीर के कोने समय के साथ फट चुके थे।

उसमें कुछ लोग खड़े दिखाई दे रहे थे, लेकिन चेहरों का बड़ा हिस्सा धुंधला हो चुका था।

कुशल तस्वीर को ध्यान से देखने लगा।

"सर... इसमें किसी का चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा।"

शिवाय ने कोई जवाब नहीं दिया।

उन्होंने तस्वीर मेज़ पर रखी और कागज़ों को देखने लगे।

ज़्यादातर कागज़ पुराने हिसाब-किताब और सामान्य नोट्स थे।

लेकिन उनके बीच एक आधा फटा हुआ पन्ना अलग दिखाई दे रहा था।

उस पर सिर्फ़ कुछ पंक्तियाँ पढ़ी जा सकती थीं—

"...बच्ची को सुरक्षित जगह पहुँचा दिया गया..."

"...नाम किसी भी हालत में दर्ज नहीं किया जाएगा..."

और सबसे नीचे...

स्याही लगभग मिट चुकी थी, लेकिन एक शब्द अब भी साफ़ पढ़ा जा सकता था—

"राजघाट"

कमरे में फिर से खामोशी छा गई।

कुशल ने धीमे स्वर में पूछा—

"सर... क्या यही हमारी अगली मंज़िल है?"

शिवाय ने वह पन्ना सावधानी से मोड़कर वापस लिफ़ाफ़े में रखा।
उनकी आँखें अब भी उस एक शब्द पर टिकी थीं—
"राजघाट..."
कुछ क्षण बाद उन्होंने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—
"चलो... अब जवाब वहीं मिलेंगे।"
कुशल ने बिना कुछ पूछे सिर हिला दिया।
दोनों तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गए...

क्या राजघाट सचमुच इकतीस साल पुराने रहस्य का पहला दरवाज़ा था?

जानने के लिए पढ़ते रहिए... Shakti Ke Shiv....