Avni ek Atut Vishwas in Hindi Love Stories by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | अवनि एक अटूट विश्वास - 9

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अवनि एक अटूट विश्वास - 9

खामोश इकरार

पहाड़ी से कार तक का वह छोटा सा रास्ता जैसे एक अनंत सफर बन गया था। न अवनि कुछ बोली, न आर्यमन। 



बस उनकी धड़कनें एक-दूसरे से बातें कर रही थीं। आर्यमन का सीना गर्व और ग्लानि से भरा था कि उसने एक ऐसी दिव्य आत्मा को पहचानने में भूल की, जो उसके लिए अपनी जान तक देने को तैयार थी।




वह उसे गोदी में लिए बस चलता जा रहा था, और उसकी नज़रें अवनि के मासूम चेहरे पर टिकी थीं, जैसे वह उस चेहरे की हर लकीर को अपने दिल में हमेशा के लिए उतार लेना चाहता हो।



आज उसे अहसास हो गया था कि सच्ची खूबसूरती दिखावे में नहीं, बल्कि उस रूह में होती है जो दूसरों को बचाने के लिए खुद को जोखिम में डाल देती है।




अध्याय १३: आर्यमन की उलझन और पिघलती बर्फ

गाड़ी के पास पहुँचते ही आर्यमन ने जैसे ही अवनि को सावधानी से नीचे उतारना चाहा, उसकी नज़र पहियों पर पड़ी। वह ठिठक गया—गाड़ी के दोनों टायर पंचर थे।



ऐसा लग रहा था मानो किस्मत आज उनकी कड़ी परीक्षा लेने पर तुली थी।


गहराती रात और बर्फीला सन्नाटा



पहाड़ी पर सूरज पूरी तरह ढल चुका था और स्याह अंधेरा अपनी चादर फैला रहा था। शहर की रोशनी नीचे कहीं दूर टिमटिमा रही थी।


आर्यमन ने घबराकर अपनी जेब में हाथ डाला, पर उसका मोबाइल उसी जद्दोजहद में खाई की भेंट चढ़ चुका था। 


उसने अवनि की ओर देखा, तो पता चला कि उसका फोन भी कहीं गिर गया है।



उधर हवेली में कोहराम मचा था। बाबूजी बार-बार घड़ी देख रहे थे और माँ का दिल किसी अनहोनी की आशंका से बैठा जा रहा था।



नीलम बाहर से तो फिक्र जता रही थी, पर अंदर ही अंदर वह जीत की मुस्कान लिए बैठी थी कि उसका ज़हर काम कर गया होगा।



ठिठुरती रात और पश्चाताप का स्पर्श



पहाड़ी की हवा अब किसी बर्फीले तूफान की तरह चलने लगी थी। अवनि, जो पहले से ही चोटिल और थकी हुई थी, उस कड़कड़ाती ठंड को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी।



उसके दांत किटकिटाने लगे और उसका पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा।



आर्यमन ने जब अवनि की यह हालत देखी, तो उसका कलेजा फटने लगा। उसके पास वहाँ न आग जलाने का कोई साधन था, न ही गाड़ी चलने की हालत में थी।


बिना एक पल सोचे, आर्यमन ने अपना महंगा कोट उतारा और बड़े ही अपनापन के साथ अवनि के कंधों पर डाल दिया।



अवनि का संदेह और आर्यमन की सच्चाई



अवनि ने फटी आँखों से आर्यमन को देखा। वह पूरी तरह सुन्न पड़ गई थी। उसके मन में रह-रहकर वही सवाल कौंध रहा था—



"आर्यमन जी को अचानक क्या हो गया है? क्या यह उनकी कोई नई चाल है? कहीं यह फिर से किसी अपमान की भूमिका तो नहीं?"




अवनि का मन अब भी डरा हुआ था। उसे लग रहा था कि शायद आर्यमन उसे फिर से कोई घाव देने के लिए यह नकाब पहन रहा है।



पर वह नहीं जानती थी कि इस बार आर्यमन के भीतर कोई छल नहीं, बल्कि पवित्र पश्चाताप था। वह बिना कोट के उस बर्फीली हवा में खुद ठिठुरने लगा था, पर उसकी नज़रें सिर्फ अवनि की सलामती पर टिकी थीं।




आर्यमन ने धीरे से अवनि के कांपते हाथों को अपने हाथों में लिया और अपनी गर्माहट उसे देने की कोशिश की। उसकी आँखों में एक ऐसी नमी थी जो अवनि के हर शक को धोने के लिए काफी थी।




नियति का खेल



उस बर्फीली रात में, जहाँ एक तरफ खौफनाक सर्दी थी, वहीं दूसरी तरफ दो दिलों के बीच बरसों की जमी बर्फ पिघल रही थी।




आर्यमन अब वह अहंकारी इंसान नहीं रहा था; वह अब एक ऐसा प्रेमी था जो अपनी भूल सुधारने के लिए खुद को भी दांव पर लगाने को तैयार था।




पहाड़ी की वह रात अब किसी निर्दयी दुश्मन की तरह उन पर टूट रही थी। हवाएँ इतनी सर्द हो चुकी थीं कि मानो वे शरीर को चीर कर हड्डियों तक पहुँच रही हों। 



अवनि की हालत बिगड़ने लगी थी; उसके होंठ नीले पड़ने लगे थे और वह बुरी तरह थरथरा रही थी।



आर्यमन का आत्म-त्याग



जब आर्यमन ने देखा कि उसका कोट भी अवनि की जानलेवा सर्दी को कम नहीं कर पा रहा है, तो वह विचलित हो उठा।



उसने बिना किसी संकोच के अपनी कमीज (शर्ट) के बटन खोल दिए और उसे भी उतार दिया। अब वह कड़कड़ाती ठंड में केवल एक बनियान और पैंट में रह गया था।



उसने अपनी शर्ट भी अवनि के ऊपर लपेट दी और उसे सहारा देकर गाड़ी की सीट से सटा दिया। 


वह खुद ठंड से कांप रहा था, उसके शरीर पर रोंगटे खड़े हो गए थे, लेकिन उसकी फिक्र सिर्फ अवनि के लिए थी।



अवनि के मन का द्वंद्व



इधर अवनि, जो सर्दी से अधमरी हो रही थी, उसका दिमाग किसी और ही जंग में उलझा हुआ था।


जैसे-जैसे आर्यमन उसके करीब आ रहा था और अपने कपड़े उतारकर उसे ढँक रहा था, अवनि के मन में डर और संदेह का तूफान उठ खड़ा हुआ।



उसने मन ही मन सोचा:



"आर्यमन जी आखिर करना क्या चाहते हैं? अभी कुछ देर पहले तो ये मुझे बाज़ारू कह रहे थे, मेरे चरित्र पर कीचड़ उछाल रहे थे... और अब अचानक इतना त्याग?



क्या यह सब एक नाटक है? कहीं... कहीं ये मेरी मजबूरी का फायदा उठाकर मेरी पवित्रता के साथ खेलना तो नहीं चाहते?



क्या यह उनकी कोई नई और घिनौनी चाल है?"


वह आर्यमन के हर स्पर्श को शक की निगाह से देख रही थी। उसे लग रहा था कि शायद आर्यमन उसे भावनात्मक रूप से कमज़ोर कर देना चाहता है ताकि वह फिर से उस पर हमला कर सके। 



अवनि ने डर के मारे खुद को कोट में और समेट लिया और अपनी आँखें बंद कर लीं, मानो वह खुद को उस संभावित 'खतरे' से बचाना चाहती हो।




दो विपरीत दिशाएँ



आर्यमन जहाँ अपनी रूह तक को अवनि को बचाने के लिए झोंक रहा था, वहीं अवनि उस पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। 



नी

लम भाभी ने आर्यमन के मन में जो ज़हर घोला था, उसके नतीजे में आर्यमन ने जो कड़वाहट दिखाई थी, उसने अवनि के विश्वास की बुनियाद हिला दी थी।