"आख़िरी किताब" - एक साहित्यिक कहानी
भैरवपुर का पुस्तकालय अब कोई नहीं जाता था।
एक ज़माना था जब उसकी दीवारें नए अखबारों की खुशबू से महकती थीं, जब सुबह-सुबह कॉलेज के लड़के साइकिल पर आकर पूछते थे, "मास्टर जी, दिनकर की नई कविता आई क्या?" अब वहाँ सिर्फ एक पीपल का पेड़ था जो छत पर उग आया था, और अंदर एक आदमी - मास्टर जी।
मास्टर जी का असली नाम राघव प्रसाद था। हिंदी के रिटायर्ड अध्यापक। पाँच साल से बिना वेतन के इस सरकारी पुस्तकालय को संभाल रहे थे। लोग कहते, "मास्टर जी सठिया गए हैं।" क्योंकि वह हर आने वाली किताब पर पहले अपने हाथ से धूल झाड़ते, फिर उस पर एक छोटा सा पीला कागज़ चिपकाते जिस पर लिखा होता - "इसे पढ़ने के बाद आप पहले जैसे नहीं रहेंगे।"
एक दिन दोपहर में, जब बाहर लू चल रही थी, पुस्तकालय का लोहे का गेट चरचराया। एक लड़की अंदर आई। उम्र बीस-बाईस साल। हाथ में एक बड़ा झोला, आँखों पर मोटा चश्मा।
"ये भैरवपुर का पुस्तकालय है?" उसने पूछा।
मास्टर जी ने चश्मे के ऊपर से देखा, "हाँ। पर यहाँ ए.सी. नहीं है, वाई-फाई नहीं है। सिर्फ किताबें हैं।"
लड़की हँस दी, "मुझे वही चाहिए। मैं आनंदी। दिल्ली से आई हूँ। एम.फिल कर रही हूँ - 'पूर्वांचल के विलुप्त होते हुए साहित्यकार' पर।"
मास्टर जी के हाथ थोड़ा काँपे।
"विलुप्त? मतलब मरे हुए?"
"नहीं, जो भुला दिए गए।"
आनंदी ने झोला खोला, एक लिस्ट निकाली। पचास नाम थे उसमें। आख़िरी नाम पर मास्टर जी की नज़र अटक गई - "शिवनाथ बाबू - भैरवपुर।"
कमरा एक पल के लिए बिल्कुल शांत हो गया। बाहर पीपल के पत्ते भी जैसे हिलना भूल गए।
"ये नाम तुम्हें कहाँ से मिला?" मास्टर जी की आवाज़ भारी हो गई।
"एक पुरानी पत्रिका 'सारंग' के 1978 के अंक में। उनकी एक कहानी छपी थी - 'कागज़ का पुल'। उसके बाद कुछ नहीं। कोई किताब नहीं, कोई फोटो नहीं। लोग कहते हैं वो पागल हो गए थे।"
मास्टर जी ने धीरे से अलमारी खोली। सबसे नीचे वाली, जिसमें ताला लगा था। अंदर से एक बोरी निकाली। बोरी में से एक गत्ता। गत्ते में से एक पांडुलिपि। धागे से बंधी हुई, पीले पड़ गए पन्ने।
"ये शिवनाथ बाबू हैं," मास्टर जी ने कहा।
आनंदी ने पांडुलिपि खोली। पहले पन्ने पर मोटी स्याही से लिखा था - "शिवनाथ - जो अब राघव है।"
आनंदी ने चौंक कर मास्टर जी को देखा।
"मैं ही शिवनाथ हूँ," मास्टर जी ने कहा, और वो हँस रहे थे, पर उनकी आँखें गीली थीं। "जब लिखता था तो नाम शिवनाथ रखा था। माँ कहती थी, ये नाम लेखक वाला नहीं लगता। राघव तो मास्टर वाला नाम है।"
उस रात पचास साल में पहली बार पुस्तकालय में बत्ती जली रही। आनंदी फर्श पर बैठी पांडुलिपि पढ़ रही थी और मास्टर जी, यानी शिवनाथ बाबू, एक पुराने मूढ़े पर बैठ कर उसे देख रहे थे।
कहानी "कागज़ का पुल" एक लड़के के बारे में थी जो हर रोज़ नदी पर कागज़ की नाव बनाता था और सोचता था एक दिन वो नाव उसे शहर ले जाएगी। गाँव वाले हँसते थे। एक दिन बाढ़ आई, और उसी कागज़ की नाव ने उसके छोटे भाई को बचा लिया।
आनंदी ने पढ़ते-पढ़ते कहा, "ये तो... ये तो प्रेमचंद से भी ज्यादा सच्ची है। इतनी सरल, पर दिल को चीर देती है। आपने इसके बाद लिखना क्यों छोड़ दिया?"
शिवनाथ बाबू ने लंबी साँस ली। कहानी शुरू की जो किसी किताब में नहीं थी।
"1979 था। ये कहानी सारंग में छपी। पटना से एक प्रकाशक का खत आया। बोले, किताब छापेंगे। मैं भैरवपुर से पहली बार पटना गया। धोती पहन कर। प्रकाशक ने कहा, 'कहानी तो अच्छी है शिवनाथ जी, पर अब गाँव की कहानी कौन पढ़ता है? आप शहर की प्रेम कहानी लिखिए, थोड़ा खुला-खुला, थोड़ा मसालेदार। बिकेगा।'"
"मैंने कहा, मुझे वो लिखना नहीं आता। उसने कहा, फिर आप भूखे मरेंगे। मैं लौट आया। यहाँ आकर दूसरी कहानी लिखी - 'भूख'। एक और लिखी - 'मास्टर जी का कुर्ता'। किसी ने नहीं छापी। कहते थे, 'बोरिंग है।' धीरे-धीरे मैं समझ गया कि मेरी कलम से रोटी नहीं निकलेगी। तो मैंने अपना नाम बदल लिया, राघव प्रसाद बन गया, स्कूल में नौकरी कर ली। और शिवनाथ को इस बोरी में बंद कर दिया।"
आनंदी चुप थी। उसके हाथ में वो पांडुलिपि ऐसे थी जैसे कोई नन्ही चिड़िया हो।
"आपको पता है," आनंदी ने धीरे से कहा, "मेरे प्रोफेसर कहते हैं, साहित्य अब मर चुका है। अब सिर्फ कंटेंट बनता है। 30 सेकंड का। आप जैसे लोगों के कारण मुझे लगता था वो झूठ कहते हैं।"
अगली सुबह आनंदी ने कहा, "बाबू, क्या मैं इन्हें ले जा सकती हूँ? दिल्ली? मैं इन्हें टाइप करवाऊँगी। छपवाऊँगी।"
शिवनाथ बाबू डर गए। "नहीं। लोग क्या कहेंगे? अब इस उम्र में..."
"लोग तो वैसे भी कुछ कहते हैं, बाबू। कहने दीजिए कि शिवनाथ लौटा है।"
आनंदी एक महीने तक भैरवपुर में रही। दिन में वो पांडुलिपियाँ टाइप करती, शाम को मास्टर जी उसे अपनी नई कहानी सुनाते जो उन्होंने कल रात लिखी थी। पचास साल बाद कलम फिर चली थी। हाथ काँपते थे, पर शब्द नहीं।
उस महीने पुस्तकालय में अजीब बात हुई। मोहल्ले के दो-तीन लड़के आने लगे। "मास्टर जी, वो कागज़ वाली कहानी सुनाइए ना।" आनंदी ने उनके लिए एक कोने में दरी बिछा दी थी।
जिस दिन आनंदी जा रही थी, उसने एक छोटा सा कागज़ मास्टर जी की जेब में डाला।
दिल्ली जाकर उसने अपनी स्कॉलरशिप के पैसों से एक छोटी सी किताब छपवाई। नाम रखा - "कागज़ का पुल और अन्य कहानियाँ - शिवनाथ बाबू।" पहला पृष्ठ उसने खाली छोड़ा था, वहाँ सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी - "मेरे पहले पाठक और आख़िरी उम्मीद, मास्टर जी के लिए।"
किताब की सौ प्रतियाँ आईं। आनंदी ने सारी प्रतियाँ लेकर भैरवपुर की बस पकड़ी।
जब वो पुस्तकालय पहुँची तो देखा गेट पर ताला था। मोहल्ले की एक औरत ने बताया, "मास्टर जी दो दिन से बुखार में हैं। घर पर हैं।"
आनंदी भागी-भागी उनके एक कमरे के घर गई। मास्टर जी खटिया पर लेटे थे। कमज़ोर। आँखें बंद।
"मास्टर जी! देखिए मैं क्या लाई हूँ!"
मास्टर जी ने आँखें खोलीं। आनंदी ने किताब उनके हाथों में रख दी।
उन्होंने काँपते हाथों से किताब को सहलाया। जैसे कोई अपने खोए हुए बेटे को सहला रहा हो। पहला पन्ना खोला, अपना नाम देखा - शिवनाथ बाबू। उनकी आँखों से आँसू टपक कर सीधे उस नाम पर गिरे।
"आनंदी," उन्होंने फुसफुसाती आवाज़ में कहा, "एक कहानी और लिखनी रह गई थी।"
"कौन सी?"
"इसी किताब की। कि एक बूढ़ा लेखक कैसे मरने से पहले फिर से ज़िंदा हो गया।"
तीन महीने बाद भैरवपुर के पुस्तकालय का रंग-रोगन हुआ। जिला अधिकारी ने उद्घाटन किया। कहा, "ये हमारे जिले के गर्व शिवनाथ बाबू का पुस्तकालय है।" वहाँ अब हर शाम भीड़ लगती है।
एक कोने में एक नई बेंच लगी है, नीम के पेड़ के नीचे। उस बेंच पर लिखा है - "यहाँ बैठ कर कहानी ख़त्म नहीं, शुरू होती है।"
और उस बेंच पर आज भी दो लोग अक्सर बैठे मिलते हैं - एक सफेद कुर्ते वाला बूढ़ा जो अब फिर से कलम रगड़ रहा है, और एक चश्मे वाली लड़की जो अब एम.फिल नहीं, पीएच.डी कर रही है, विषय है - "लौट आने वाले साहित्यकार।"
ये कहानी किसी बड़े लेखक के बारे में नहीं थी। ये उस हर आदमी के बारे में थी जिसके अंदर एक शिवनाथ बंद है, बोरी में, ताले में, जो सिर्फ एक आनंदी का इंतज़ार कर रहा है कि कोई आए और कहे - "तुम्हारी कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है।"