एक आखिरी चिट्ठी -
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे - मोहनपुरा में, एक बहुत पुराना डाकघर था। उस डाकघर की लाल ईंटों पर बरसात के पानी के निशान थे, और उसके बाहर एक बूढ़ा पीपल का पेड़ था। उसी डाकघर में पिछले 35 सालों से काम करते थे - रामप्रसाद।
रामप्रसाद अब 62 साल के थे। उनके बाल पूरे सफेद हो चुके थे, चश्मा मोटा हो गया था, पर उनकी साइकिल आज भी उसी रफ्तार से चलती थी जैसी 30 साल पहले चलती थी। पूरे कस्बे के लोग उन्हें "डाक बाबू" कहते थे।
रामप्रसाद की जिंदगी में दो ही चीजें थीं - उनकी ड्यूटी और उनकी पत्नी सावित्री। उनका एक ही बेटा था, अमन, जो पढ़ लिखकर दिल्ली में एक बड़ी कंपनी में नौकरी करने लगा था। अमन की शादी के बाद वो अपनी पत्नी के साथ दिल्ली में ही बस गया था। साल में एक बार दिवाली पर आता, दो दिन रुकता और फिर चला जाता।
रामप्रसाद को इसका कोई दुख नहीं था। वो कहते, "बच्चे जहाँ खुश रहें, वहीं रहने दो। हमारा क्या है, हमारी तो ये चिट्ठियां ही बच्चे हैं।"
लेकिन पिछले एक साल से डाकघर में चिट्ठियां आनी लगभग बंद हो गई थीं। सबके पास मोबाइल आ गया था। अब कोई चिट्ठी नहीं लिखता था। रामप्रसाद दिन भर खाली बैठे रहते, अपनी मेज पर रखी स्याही की दवात को देखते रहते।
फिर एक दिन, कुछ अजीब हुआ।"हम अमेरिका जाकर क्या करेंगे? हमें तो यहाँ की हवा, यहाँ का पीपल, यहाँ के लोग अच्छे लगते हैं। और गुड्डू? उसका क्या होगा?"
उस रात रामप्रसाद ने अपने जीवन में पहली बार अपने लिए एक चिट्ठी लिखी। भगवान जी के नाम।
"हे भगवान,
मैंने जिंदगी भर सबकी चिट्ठियां सही पते पर पहुंचाईं। आज मेरी खुद की जिंदगी का पता गलत हो रहा है। मेरा बेटा मुझे मेरे ही घर से बेदखल करना चाहता है। मैं क्या करूँ? मुझे रास्ता दिखाओ।"
उन्होंने वो चिट्ठी पीपल के पेड़ के नीचे रख दी और हवा में उड़ा दी।
अगले दिन अमन खुद मोहनपुरा आ गया। बड़ी गाड़ी में। सूट-बूट पहने हुए।
"पिताजी, आपने जवाब नहीं दिया? तैयारी कर लो, अगले हफ्ते तक निकलना है।"
रामप्रसाद ने शांत स्वर में कहा, "बेटा, बैठो।"
उन्होंने अलमारी से एक डब्बा निकाला। उस डब्बे में पिछले छह महीनों की सारी "स्वर्ग" की चिट्ठियां थीं।
"ये देखो बेटा, ये है मेरी दौलत। ये लोग, ये गुड्डू, ये बूढ़ी अम्मा, ये सब मेरा परिवार हैं। अगर मैं चला गया तो इनकी उम्मीद कौन बनेगा?"
तभी डाकघर का दरवाजा खुला। बाहर गुड्डू, उसकी दादी, वो फौजी की माँ और कस्बे के 50 लोग खड़े थे।
गुड्डू आगे आया, "डाक बाबू, आज आपका जन्मदिन है न?"
अमन ये सब देख रहा था। उसने अपने पिता को कभी इस रूप में नहीं देखा था। शहर में वो एक मामूली डाकिया था, पर यहाँ वो पूरे कस्बे का भगवान था।
अमन का घमंड टूट गया। वो अपने पिता के पैरों में गिर पड़ा।
"मुझे माफ कर दो पिताजी। ये मकान नहीं बिकेगा। मैं अमेरिका नहीं जाऊंगा।"
रात को जब सब चले गए, रामप्रसाद ने गुड्डू को अपने पास बुलाया। "तुम्हें एक सच बताना है।"
गुड्डू ने कहा, "मुझे पता है बाबूजी। यही कि माँ की चिट्ठियां आप ही लिखते थे। मैंने एक दिन आपको देखा था।"
रामप्रसाद घबरा गए, "तो तुम नाराज हो?"
गुड्डू हँसा, "नहीं बाबूजी। मेरी दादी कहती है, भगवान खुद नहीं आते, वो किसी न किसी को भेज देते हैं। मेरे लिए आप ही भगवान हो।"
उस दिन के बाद डाकघर के बाहर आज भी एक बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है:
"यहाँ दिल से लिखी हर चिट्ठी, सही पते पर पहुंचाई जाती है - चाहे पता इस दुनिया का हो या उस दुनिया का।"सीख: इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि दिल से और कर्म से बनते हैं। एक छोटा सा झूठ अगर किसी टूटे हुए दिल को जोड़ दे, किसी को जीने की उम्मीद दे दे, तो वो झूठ, सौ सच से भी बड़ा होता है। और असली खुशी बड़ी इमारतों में या विदेश में नहीं, बल्कि अपने लोगों के बीच, उनकी मदद करने में है।अब गुड्डू हर हफ्ते एक चिट्ठी लिखता। कभी कहता - "माँ, आज मैंने कंचे जीते।" कभी कहता - "माँ, दादी की खांसी बढ़ गई है।" और रामप्रसाद हर बार उसका जवाब "माँ" बनकर देते।
धीरे-धीरे ये बात पूरे मोहनपुरा में फैल गई कि डाक बाबू स्वर्ग में चिट्ठी पहुंचा सकते हैं।
एक दिन एक बूढ़ी औरत आई, उसकी आँखें झुकी हुई थीं। उसने कहा, "बाबूजी, मेरा बेटा फौज में शहीद हो गया था दो साल पहले। क्या आप एक चिट्ठी उस तक पहुंचा दोगे?"
रामप्रसाद सन्न रह गए। फिर उन्होंने कहा, "अम्मा, लाओ, कोशिश करता हूँ।"
अब उनके पास हर दिन 2-3 ऐसी चिट्ठियां आने लगीं। कोई अपने मरे हुए पति को चिट्ठी लिखता, कोई अपने पिता को।
रामप्रसाद सबके जज्बात समझते थे। वो सबका जवाब लिखते। किसी को हिम्मत देते, किसी को सांत्वना। वो किसी से पैसे नहीं लेते।
उनकी पत्नी सावित्री ने एक दिन पूछा, "ये आप क्या कर रहे हैं? ये झूठ नहीं है?"
रामप्रसाद ने कहा, "सावित्री, ये झूठ नहीं है। ये वो सच है जो लोग सुनना चाहते हैं। मैं किसी को धोखा नहीं दे रहा, मैं तो बस उनके घाव पर मरहम लगा रहा हूँ। डाकिये का काम ही क्या है? सिर्फ कागज पहुंचाना? नहीं, दिलों को जोड़ना भी है।"
सावित्री समझ गई। वो भी अब चिट्ठियों का जवाब लिखने में उनकी मदद करने लगी।
छह महीने बीत गए। डाकघर जो कभी खाली रहता था, अब लोगों की उम्मीद का घर बन गया था। लोग अब रामप्रसाद को "स्वर्ग के डाकिये" कहने लगे थे।
लेकिन एक दिन, एक ऐसी चिट्ठी आई जिसने रामप्रसाद को हिला दिया।
वो चिट्ठी गुड्डू की नहीं थी। वो चिट्ठी उनके अपने बेटे अमन की थी, जो दिल्ली से आई थी।
लिफाफा बहुत महंगा था। अंदर लिखा था:
"पिताजी,
प्रणाम। आपको एक जरूरी बात बतानी थी। मुझे और नेहा को अमेरिका में नौकरी मिल गई है। हम अगले महीने हमेशा के लिए अमेरिका जा रहे हैं। वहाँ सब कुछ बिक रहा है, तो सोचा आपका वो पुराना मकान भी बेच देते हैं, आप दोनों भी हमारे साथ अमेरिका चलो। यहाँ आपका क्या रखा है इस पुराने कस्बे में।
आपका बेटा, अमन।"
रामप्रसाद के हाथ कांपने लगे। जिस घर में उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बिताई थी, जहाँ सावित्री के साथ बूढ़े होने के सपने देखे थे, बेटा उसे बेचना चाहता था।
उन्होंने सावित्री को चिट्ठी दिखाई। सावित्री रोने लगी।
"हम अमेरिकासावन का महीना था। झमाझम बारिश हो रही थी। डाकघर बंद होने वाला था, तभी एक 10 साल का लड़का दौड़ता हुआ अंदर आया। पूरी तरह भीगा हुआ।
"बाबूजी, चिट्ठी पोस्ट करनी है।"
रामप्रसाद ने चश्मा ठीक किया, "लाओ बेटा।"
लड़के ने अपनी जेब से एक मुड़ी-तुड़ी चिट्ठी निकाली। कागज किसी स्कूल की कॉपी से फाड़ा हुआ था, और उस पर पेंसिल से लिखा था।
रामप्रसाद ने देखा - चिट्ठी पर पता लिखा था:
श्री भगवान जी,
स्वर्गलोक।
रामप्रसाद चौंक गए। "ये क्या है बेटा? ये किसका पता है?"
लड़के की आँखों में आँसू थे। "बाबूजी, ये मेरी माँ के लिए है। वो पिछले महीने भगवान जी के पास चली गई। मुझे उनसे बात करनी है।"
रामप्रसाद का दिल बैठ गया। उन्होंने लड़के का नाम पूछा।
"गुड्डू।"
"गुड्डू, तुम्हारे पिताजी?"
"पिताजी दूसरे शहर में मजदूरी करते हैं। मैं अपनी दादी के साथ रहता हूँ।"
रामप्रसाद ने चिट्ठी को देखा। उस पर एक टिकट भी नहीं लगा था। उन्होंने धीरे से कहा, "बेटा, ये चिट्ठी वहाँ नहीं जाएगी। भगवान जी का कोई पता नहीं होता।"
गुड्डू ने जिद की, "आप तो डाक बाबू हो, आप सबकी चिट्ठी पहुंचाते हो। मेरी भी पहुंचा दो। मुझे माँ से कहना है कि दादी बीमार है और मुझे स्कूल में सब चिढ़ाते हैं।"
उस रात रामप्रसाद सो नहीं सके। उन्होंने अपने जीवन में हजारों चिट्ठियां पहुंचाई थीं - प्रेम पत्र, नौकरी के पत्र, किसी की मौत की खबर, किसी के जन्म की खुशी। पर ऐसी चिट्ठी कभी नहीं देखी थी।
अगले दिन सुबह, रामप्रसाद ने वो चिट्ठी खोली। उन्होंने सोचा, ये गलत है, किसी की चिट्ठी खोलना पाप है, पर वो खुद को रोक नहीं पाए।
उसमें टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था:
"प्रिय माँ,
तुम कैसी हो? मैं ठीक नहीं हूँ। दादी खांसती रहती है, दवा के पैसे नहीं हैं। स्कूल में मैडम कहती है फीस लाओ। तुम होती तो मुझे कोई नहीं चिढ़ाता। तुम जल्दी वापस आ जाओ। तुम्हारा गुड्डू।"
रामप्रसाद की आँखें भर आईं। उनकी अपनी कोई पोती-पोता नहीं था। अमन के अभी बच्चे नहीं हुए थे। उस चिट्ठी में उन्हें अपने अकेलेपन की झलक दिखी।
उन्होंने एक फैसला किया। उन्होंने अपनी अलमारी से एक नया कागज निकाला, और बहुत सुंदर लिखावट में एक चिट्ठी लिखी।
"प्रिय गुड्डू बेटा,
तुम्हारी चिट्ठी मिली। मैं यहाँ स्वर्ग में बहुत खुश हूँ। यहाँ सब अच्छा है। तुम चिंता मत करो। तुम अपनी दादी का ध्यान रखो, मन लगाकर पढ़ो। मैं हर रोज तुम्हें आसमान से देखती हूँ। तुम जब भी मुझे याद करोगे, मैं तुम्हारे पास आ जाऊंगी, हवा बनकर।
तुम्हारी माँ।"
उन्होंने उस चिट्ठी को एक लिफाफे में बंद किया, उस पर गुड्डू का पता लिखा और अपने थैले में रख लिया।
अगले दिन वो साइकिल से गुड्डू के मोहल्ले में गए और चिट्ठी उसके घर के दरवाजे के नीचे से सरका दी।
दो दिन बाद, गुड्डू फिर डाकघर में दौड़ता हुआ आया। इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
"बाबूजी! माँ की चिट्ठी आई! माँ ने जवाब दिया! उसने कहा वो मुझे देख रही है!"
रामप्रसाद ने मुस्कुराते हुए कहा, "देखा! भगवान जी के यहाँ डाक बहुत तेज चलती है।"
गुड्डू खुशी-खुशी भाग गया।
बस, यहीं से रामप्रसाद की नई नौकरी शुरू हो गई।