samay ka kuaa in Hindi Classic Stories by shrish sharma books and stories PDF | समय का कुआं

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समय का कुआं

अध्याय 1: बरगदपुर का वो कुआँ
बरगदपुर। नाम से ही पता चलता है, गाँव के बीचों-बीच एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसकी जड़ें दूर-दूर तक फैली हुई थीं। और उसी बरगद की सबसे मोटी जड़ के ठीक नीचे था वो कुआँ।

गाँव के बुजुर्ग उसे 'अंधा कुआँ' कहते थे। क्योंकि उसका पानी इतना काला था कि उसमें अपनी परछाई भी नहीं दिखती थी। अंग्रेजों के जमाने का कुआँ था, कहते हैं। किसी ने उसे कभी सूखते नहीं देखा, और किसी ने उसमें से पानी पीते हुए भी किसी को नहीं देखा।

इसी गाँव में रहता था हरिराम। उम्र पच्चीस साल, पेशे से कुम्हार। उसके हाथ में जादू था, मिट्टी को छूते ही वो बर्तन बन जाती थी। पर उसके मन में एक ही दुख था - उसकी माँ की बीमारी। उसकी माँ, सुमित्रा देवी, पिछले तीन साल से खाट पर पड़ी थीं। शरीर ने जवाब दे दिया था, पर आँखें अभी भी दरवाजे पर टिकी रहती थीं। डॉक्टरों ने कह दिया था, "अब तो चमत्कार ही कुछ कर सकता है।"

एक रात, जब हरिराम माँ के पैर दबा रहा था, तो माँ ने धीरे से कहा, "बेटा, मुझे उस कुएँ का पानी पिला दे।"

हरिराम चौंक गया। "कौन से कुएँ का, माँ?"

"बरगद वाले... अंधे कुएँ का। बचपन में मेरी दादी कहती थी, वो कुआँ पानी नहीं, बीता हुआ समय देता है। जो एक बार उसका पानी पी ले, वो अपने जीवन के किसी भी एक दिन में वापस जा सकता है।"

हरिराम को लगा माँ बुखार में बड़बड़ा रही है। पर माँ की आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
अध्याय 2: पहली बाल्टी
अगली सुबह, मुँह अंधेरे ही हरिराम एक बाल्टी और रस्सी लेकर उस कुएँ पर पहुँच गया। गाँव अभी सो रहा था। बरगद के पत्ते सरसरा रहे थे। कुआँ सच में बहुत डरावना लग रहा था। गोल, पत्थरों से बना, और अंदर घुप्प अंधेरा।

उसने रस्सी बाँधी और बाल्टी नीचे फेंकी। छपाक की आवाज भी नहीं आई, जैसे बाल्टी पानी में नहीं, किसी गाढ़े अंधेरे में गिरी हो।

जब उसने रस्सी खींची, तो बाल्टी में पानी नहीं था। उसमें एक तरल, चमकता हुआ, नीले-काले रंग का धुंध था, जो हिल रहा था। जैसे आकाश में तारे हिलते हैं।

वो डर गया, बाल्टी वहीं छोड़कर भागने लगा, तभी पीछे से एक आवाज आई, "पीना नहीं है तो निकाला क्यों?"

हरिराम ने पलटकर देखा। एक बूढ़ा आदमी, जिसकी लंबी सफेद दाढ़ी थी, बरगद की जड़ पर बैठा बीड़ी पी रहा था। वो गाँव का चौकीदार था, रघु काका।

"काका, ये पानी..."

"ये पानी नहीं है, लल्ला। ये समय है। तेरी माँ ने भेजा है न तुझे?" रघु काका ने धुआँ फेंकते हुए कहा।

हरिराम सन्न रह गया।

रघु काका बोला, "इस कुएँ का एक नियम है। तू इसमें से सिर्फ एक बार पानी निकाल सकता है, और सिर्फ एक घूँट पी सकता है। एक घूँट = अपने जीवन का एक दिन। तू जिस दिन को सबसे ज्यादा याद करता है, उसी दिन में तू वापस चला जाएगा। पर याद रखना, तू वहाँ सिर्फ एक सूर्यास्त तक रह सकता है। सूर्यास्त होते ही तू वापस आ जाएगा। और अगर तूने वहाँ कुछ भी बदलने की कोशिश की, तो..."

"तो क्या काका?"

"तो समय तुझसे उसकी कीमत ले लेगा। सबसे कीमती चीज की कीमत।"
अध्याय 3: वो दिन
हरिराम बाल्टी लेकर घर आया। उसकी माँ खाट पर बेहोश सी पड़ी थी।

उसने आँखें बंद कीं और उस चमकते हुए धुंध में से एक घूँट भरा।

वो कड़वा नहीं था, मीठा नहीं था। उसका कोई स्वाद ही नहीं था। बस पीते ही उसे लगा जैसे उसके शरीर के अंदर हजारों घड़ियाँ एक साथ टिक-टिक करने लगीं।

और फिर... सब कुछ घूम गया।

जब उसने आँखें खोलीं, तो वो अपने ही आँगन में खड़ा था। पर आँगन नया था। दीवारों पर नया पलस्तर था। और सामने चूल्हे पर उसकी माँ, बिल्कुल ठीक-ठाक, जवान, रोटियाँ सेंक रही थी।

उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े। ये दस साल पुराना दिन था। वो दिन जब उसके पिता की मृत्यु हुई थी।

आज ही के दिन, उसके पिता बैलगाड़ी लेकर शहर गए थे और वापस नहीं आए थे। एक हादसे में उनकी जान चली गई थी। उस दिन के बाद ही उसकी माँ टूट गई थी, और धीरे-धीरे बीमार पड़ गई थी।

उसे सब याद आया। आज दोपहर दो बजे उसके पिता घर से निकलेंगे।

उसके पास सूर्यास्त तक का समय था। यानी लगभग 8 घंटे।

उसने सोचा, अगर मैं पिताजी को आज शहर जाने से रोक दूँ, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। माँ कभी बीमार नहीं पड़ेगी।

वो दौड़कर अपनी माँ से लिपटा। माँ ने कहा, "अरे हरिया, क्या हुआ? ऐसे क्यों रो रहा है?"

"कुछ नहीं माँ, बस ऐसे ही।"

तभी दरवाजे से उसके पिता अंदर आए - रामलाल। बिल्कुल वैसे ही, धोती-कुर्ता, कंधे पर गमछा।

हरिराम का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
अध्याय 4: समय को रोकने की कोशिश
हरिराम ने अपने पिता का रास्ता रोक लिया।

"पिताजी, आज शहर मत जाइए।"

रामलाल हँसा, "क्यों? शहर में कुम्हारों की हड़ताल है क्या?"

"नहीं, बस मेरा मन कह रहा है, आज मत जाइए।"

"पागल हुआ है क्या? सेठ जी को मटके देने हैं, पैसे मिलेंगे तभी तो तेरी नई साइकिल आएगी। तू तो कब से साइकिल मांग रहा था।"

हरिराम को याद आया, हाँ, उस दिन पिता उसके लिए साइकिल लाने वाले थे।

उसने बहुत जिद की, रोया, गिड़गिड़ाया, यहाँ तक कि पिता के पैर पकड़ लिए। पर रामलाल नहीं माना। उसने कहा, "तू चिंता मत कर, मैं शाम से पहले आ जाऊँगा।"

और वो बैलगाड़ी लेकर निकल गया।

हरिराम उसके पीछे भागा। गाँव की कच्ची सड़क पर, धूल उड़ाते हुए। वो चिल्लाता रहा, "पिताजी, रुक जाइए!"

पर बैलगाड़ी नहीं रुकी।

तभी हरिराम को एक दूसरा रास्ता सूझा। अगर पिता को रोक नहीं सकता, तो हादसे की जगह पर पहुँचकर हादसे को रोक दूँ।

हादसा शहर के मोड़ पर हुआ था, जहाँ एक ट्रक ने बैलगाड़ी को टक्कर मार दी थी।

वो शॉर्टकट लेकर, खेतों के बीच से दौड़ता हुआ, उस मोड़ पर पहुँच गया। दोपहर के डेढ़ बज रहे थे। धूप बहुत तेज थी।

वो वहाँ खड़ा रहा, हाँफता हुआ। तभी उसने दूर से अपनी बैलगाड़ी आती देखी। और दूसरी तरफ से एक तेज रफ्तार ट्रक।

उसका खून सूख गया।

उसने बीच सड़क में खड़े होकर दोनों हाथ फैला दिए। ट्रक ड्राइवर ने हॉर्न बजाया, पर हरिराम नहीं हटा।

ट्रक को मजबूरन ब्रेक मारना पड़ा। ट्रक रुक गया। बैलगाड़ी भी रुक गई।

रामलाल चिल्लाया, "अरे हरिया! तू यहाँ क्या कर रहा है? मरना है क्या?"

हादसा टल गया। हरिराम जीत गया था। वो खुशी से रो पड़ा।

पर तभी, आकाश में बादल गरजने लगे, जबकि सुबह तक एक भी बादल नहीं था। बरगदपुर में अचानक तेज हवा चलने लगी।

रघु काका की बात याद आई - "अगर तूने वहाँ कुछ भी बदलने की कोशिश की, तो समय तुझसे उसकी कीमत ले लेगा।"
अध्याय 5: कीमत
सूरज ढल रहा था। हरिराम को लगा जैसे कोई उसे पीछे खींच रहा है।

उसने आखिरी बार अपने पिता को देखा, जो उसे डाँट रहे थे, और अपनी माँ को, जो आँगन में उसका इंतजार कर रही थी।

और फिर, एक झटके में, वो वापस अंधे कुएँ के पास था। शाम हो गई थी। बाल्टी खाली थी।

वो खुशी-खुशी घर की तरफ भागा। सोचा, अब सब ठीक हो गया होगा। पिताजी जिंदा होंगे।

पर घर पहुँचकर उसने देखा, घर पर ताला लगा था। पड़ोस की चाची ने कहा, "अरे हरिराम, तू कहाँ था? तेरी माँ..."

"माँ कहाँ है?"

"सुबह ही तो... तेरी माँ चली गई बेटा।"

हरिराम के पैरों तले जमीन खिसक गई।

अंदर जाकर देखा, उसकी माँ खाट पर नहीं थी। उनकी अर्थी उठने वाली थी।

और आँगन में, एक कोने में, उसके पिता की पुरानी साइकिल नहीं, बल्कि उसके पिता बैठे थे। बूढ़े, कमजोर, रोते हुए।

हरिराम समझ गया। उसने समय में जाकर अपने पिता की जान बचाई, तो समय ने उसकी माँ की जान ले ली। यही थी कीमत। सबसे कीमती चीज।

वो फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने अपने पिता को गले लगा लिया।

रामलाल बोला, "मुझे माफ कर दे बेटा। उस दिन अगर मैं तेरी बात मान लेता, तो तेरी माँ आज जिंदा होती। मैं ही जिद पर अड़ा रहा।"

हरिराम ने कहा, "नहीं पिताजी, गलती मेरी है। मैंने समय के नियम को तोड़ा।"

उस रात, उसने फिर से कुएँ पर जाने का सोचा, पर रघु काका वहाँ बैठा था।

"दुबारा नहीं जा सकता, लल्ला। कुआँ एक ही बार मौका देता है। अब जो है, इसी को जीना है।"
अध्याय 6: नया जीवन
समय बीत गया। हरिराम ने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। उसने फिर से मिट्टी गूंथनी शुरू की। पर अब वो जो भी बर्तन बनाता, उस पर वो दो चेहरे बनाता - एक माँ का, एक पिता का।

गाँव के लोग कहते, इस कुम्हार के बर्तनों में जान है।

एक दिन, एक छोटी बच्ची उसके पास आई और बोली, "भैया, मुझे भी उस कुएँ का पानी पीना है। मैं अपने टूटे हुए खिलौने वाले दिन में जाना चाहती हूँ।"

हरिराम ने मुस्कुराकर कहा, "उस कुएँ का पानी बीता हुआ समय नहीं देता, गुड़िया। वो ये सिखाता है कि जो बीत गया, उसे बदलने से बेहतर है, जो बचा है उसे संभालना।"

उसने बच्ची को एक छोटा सा मिट्टी का घोड़ा दिया।

बरगद का पेड़ आज भी वैसा ही खड़ा है। कुआँ आज भी वहीं है। पर अब गाँव में कोई उसे अंधा कुआँ नहीं कहता। सब उसे 'समझ वाला कुआँ' कहते हैं।

कहते हैं, आज भी अगर कोई सच्चे मन से उस कुएँ के पास जाता है और अपनी बाल्टी में झांकता है, तो उसे अपना वो चेहरा दिखता है, जो वो बनना चाहता है, न कि वो चेहरा जो वो पीछे छोड़ आया है।

और हरिराम? वो अब बूढ़ा हो गया है। पर हर शाम, वो उस कुएँ के पास दिया जलाता है। ताकि कोई और, अंधेरे में, अपना रास्ता न भटके।कहानी की सीख: हम अक्सर सोचते हैं कि अगर हम अतीत में जाकर एक गलती सुधार लें तो जीवन सुंदर हो जाएगा। पर जीवन गलतियों को सुधारने से नहीं, उन्हें स्वीकार करके आगे बढ़ने से सुंदर बनता है। समय को बदला नहीं जा सकता, समय के साथ चलना सीखा जा सकता है।