Her Silent Secret in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Her Silent Secret - 9

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Her Silent Secret - 9

संयोगिता दीवार से टिककर बैठी थी। उसकी घायल बाँह से अब भी खून बह रहा था। लेकिन उसके चेहरे पर सबसे बड़ा दर्द गोली का नहीं था। उसके सामने बैठा छोटा विवान था। वो जानती थी अगर अभी उसका वो खतरनाक रूप बाहर आया…
अगर विवान ने उसकी आँखों में वो साइको killer देख लिया…तो शायद ये बच्चा डर जाएगा। इसलिए आज पहली बार संयोगिता अपने ही अंधेरे को रोक रही थी। उसकी नजर बार-बार दरवाज़े पर जा रही थी। बाहर गुंडे करीब आते जा रहे थे।

लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ एक बात थी—
किसी भी तरह विवान को यहाँ से निकालना है।

तभी उसकी नजर ऊपर गई। दीवार के पास एक छोटी सी खिड़की थी। बहुत ऊँचाई पर। एक बड़ा इंसान वहाँ से नहीं निकल सकता था…लेकिन छोटा विवान निकल सकता था।
संयोगिता तुरंत उठी। उसने पास पड़ी पुरानी table खींची।
दर्द से उसकी साँसें काँप रही थीं…फिर भी वो रुकी नहीं। संयोगिता table पर चढ़ी। फिर बहुत मुश्किल से खिड़की खोली। ठंडी हवा अंदर आई। उसने विवान को गोद में उठाया।
विवान डरकर उससे चिपक गया।बसंयोगिता ने धीरे से उसे ऊपर खिसकाया। कुछ सेकंड बाद विवान खिड़की के बाहर पहुँच गया।

संयोगिता ने नीचे से जल्दी से कहा—
विवान… जाओ। भाग जाओ। पापा के पास जाओ।

विवान की आँखें भर आईं।

विवान बोला - 
मम्मा… आप?

ये सुनते ही संयोगिता का दिल फिर काँप गया। लेकिन उसने खुद को मजबूत किया। संयोगिता ने हल्की मुस्कान लाने की कोशिश की।

संयोगिता बोली —
मैं आ जाऊंगी…

उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई।

फिर उसने almost विनती करते हुए कहा—
पर तुम अभी जाओ… please.

विवान वहीं रुका रहा। जैसे वो उसे छोड़कर जाना ही नहीं चाहता था। बाहर से कदमों की आवाज़ अब और करीब आ रही थी। संयोगिता घबरा गई। उसने जल्दी से विवान के सिर पर हाथ फेरा।

संयोगिता बोली —
Good boy बनो… पापा के पास जाओ।

विवान की आँखों से आँसू बह निकले। लेकिन फिर उसने धीरे से सिर हिलाया। विवान भागता हुआ अंधेरे में दूर चला गया।
और नीचे बेसमेंट में संयोगिता अकेली खड़ी रह गई। उसने धीरे से ऊपर उस खुली खिड़की को देखा। फिर अपनी gun कसकर पकड़ ली। अब उसके सामने सिर्फ दो रास्ते थे या तो वो मरेगी…या फिर आज पूरी फैक्ट्री खून से भर जाएगी।

संयोगिता दीवार के सहारे खड़ी थी। उसकी घायल बाँह से खून अब भी बह रहा था।बलेकिन उसकी आँखों में दर्द नहीं था।
क्योंकि अब विवान वहाँ नहीं था। अब उसे किसी मासूम निगाह से डरने की जरूरत नहीं थी। उसने कुछ मिनट पहले ही अपने आदमियों को location भेज दी थी। मदद रास्ते में थी। तभी—
धड़ाम! कमरे का दरवाज़ा लात मारकर खोला गया। चार-पाँच गुंडे अंदर घुस आए। उनके हाथों में guns थीं।

एक आदमी हँसते हुए बोला—
भाग कहाँ गई तेरी ममता?

दूसरा बोला—
अब कौन बचाएगा तुझे?

संयोगिता बिल्कुल शांत खड़ी रही। उसका सिर थोड़ा झुका हुआ था। कुछ सेकंड तक कमरे में सिर्फ उसकी धीमी साँसें सुनाई देती रहीं। फिर…वो धीरे-धीरे मुस्कुराई। ऐसी मुस्कान…
जो इंसान की नहीं लग रही थी। उसने बहुत धीरे से सिर उठाया। और अगले ही पल उसकी आँखों में वही पुराना अंधेरा लौट आया। वही खतरनाक चमक…जिससे शहर काँपता था।
अब वो मजबूर औरत नहीं थी। अब वो फिर से साइको killer संयोगिता सिंह थी। संयोगिता ने अपनी gun सीधी की। उसकी आवाज़ बेहद शांत थी। लेकिन वही शांति सबसे डरावनी थी।

संयोगिता बोली —
गलती कर दी तुम लोगों ने…

वो एक कदम आगे बढ़ी।

संयोगिता बोली —
बच्चों को छूकर।

गुंडों की हँसी धीरे-धीरे गायब होने लगी। क्योंकि अब उन्हें उसकी आँखों में मौत दिख रही थी। एक गुंडे ने जल्दी से गोली चलाई। लेकिन संयोगिता बिजली की तरह side में हुई। और अगले ही पल—
धाँय!
उसकी गोली सीधे उस आदमी के माथे में लगी। वो वहीं ढेर हो गया।बाकी गुंडे घबरा गए।संयोगिता धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ने लगी। उसके कदमों की आवाज़ कमरे में गूंज रही थी।
उसकी घायल बाँह से टपकता खून जमीन पर गिर रहा था।
लेकिन उसके चेहरे पर दर्द नहीं…सिर्फ पागलपन था।

संयोगिता (धीरे से) बोली —
आज… कोई दया नहीं होगी।

ऊपर फैक्ट्री के बाहर विवान अंधेरे में भागते-भागते रो रहा था।

विवान बोला —
मम्मा…

और नीचे बेसमेंट में संयोगिता ने gun reload की। फिर कमरे की light अचानक बंद हो गई। अंधेरे में सिर्फ चीखें गूंजने लगीं। क्योंकि अब…शिकारियों का सामना असली दरिंदे से हो चुका था।

पूरा बेसमेंट खून से भर चुका था। हर तरफ टूटी चीज़ें…गोलियों के निशान…और बेजान bodies पड़ी थीं। संयोगिता ने एक-एक करके उन सभी दरिंदों को खत्म कर दिया था। बिना दया। बिना डर। आज उसका साइको killer पूरी तरह जाग चुका था। संयोगिता धीरे-धीरे दीवार के पास गई। उसके हाथों पर अब भी ताज़ा खून लगा हुआ था। उसने अपनी उंगलियाँ खून में डुबोईं…

और दीवार पर लिख दिया—
**“जो बच्चों की मासूमियत बेचते हैं…
उनकी मौत भी इंसानियत से नहीं होती।”**

लाल खून से लिखे वो शब्द पूरे कमरे को और डरावना बना रहे थे। संयोगिता धीरे-धीरे फैक्ट्री से बाहर निकली। उसके कदम बिल्कुल शांत थे। लेकिन उसके कपड़ों पर…हाथों पर…यहाँ तक कि जूतों पर भी खून लगा हुआ था। उसके चेहरे पर पसीना और खून दोनों मिले हुए थे। और उसकी आँखों में एक अजीब सा पागलपन था। जैसे अंदर का इंसान अब बहुत पीछे छूट चुका हो। बाहर काली SUVs खड़ी थीं। उसके आदमी तुरंत उसके पास दौड़े। लेकिन उसे उस हालत में देखकर…सब एक पल के लिए रुक गए। उनकी मलक़िन हमेशा खतरनाक लगती थी।लेकिन आज वो सचमुच मौत जैसी दिख रही थी।

संयोगिता ने धीरे से अपने चेहरे को छुआ। उसकी उंगलियों पर खून लग गया। वो कुछ सेकंड तक उसे देखती रही। फिर जैसे अचानक उसे होश आया। उसने जल्दी से अपने चेहरे से खून पोंछने की कोशिश की। लेकिन जितना पोंछती…उतना ही वो खून फैलता जा रहा था। जैसे वो सिर्फ चेहरे पर नहीं…उसकी रूह पर लग चुका हो।

उसकी आँखों के सामने अचानक विवान का चेहरा आया—
मम्मा… आप मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगी ना?

संयोगिता की साँस हल्की काँप गई। कुछ पल के लिए उसकी आँखों का पागलपन धीमा पड़ा। लेकिन अगले ही पल वो फिर पत्थर जैसी हो गई।

उसका एक आदमी धीरे से बोला—
मैडम… अब कहाँ?

संयोगिता ने अंधेरे आसमान की तरफ देखा।

फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली—
वादा अभी पूरा नहीं हुआ…

उसने कार का दरवाज़ा खोला। और उसी समय दूर सड़क पर छोटा विवान अकेला भागता हुआ दिखाई दिया। संयोगिता की आँखें तुरंत उसकी तरफ मुड़ गईं। उसके अंदर का साइको killer…और एक अधूरी माँ दोनों फिर आमने-सामने खड़े थे।

छोटा विवान अंधेरे में भागते-भागते थक चुका था। उसके छोटे कदम अब लड़खड़ा रहे थे। चारों तरफ सुनसान सड़क थी।
ना कोई घर…ना कोई पहचान। आखिरकार वो डरकर सड़क किनारे बैठ गया। उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं।

विवान बोला —
पापा…

फिर धीरे से —
मम्मा…

कुछ दूरी पर खड़ी संयोगिता उसे देख रही थी। उसके कपड़ों और हाथों पर अभी भी खून के निशान थे। वो जानती थी अगर विवान ने उसे उस हालत में देखा…तो डर जाएगा। इसलिए उसने जल्दी से अपना चेहरा साफ किया।नहाथों से खून पोंछा।
जैकेट सीधी की। लेकिन उसकी आँखों का दर्द छिप नहीं पा रहा था।

संयोगिता धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी। जैसे ही विवान ने उसे देखा उसकी आँखों में डर की जगह चमक आ गई। वो तुरंत उठकर उसकी तरफ भागा। और अगले ही पल वो संयोगिता से कसकर लिपट गया। विवान ने अपना छोटा चेहरा उसके पेट से छुपा लिया।

विवान बोला —
मम्मा… आप आ गईं…

संयोगिता की साँस अटक गई। उसके हाथ धीरे-धीरे विवान की पीठ पर चले गए। जैसे वो खुद भी उस एहसास को छोड़ना नहीं चाहती थी। विवान ने मासूमियत से ऊपर देखा। उसकी आँखें रोने की वजह से लाल थीं।

विवान बोला —
चलो ना घर चलते हैं…

उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

विवान बोला —
पापा भी wait कर रहे होंगे…

ये सुनते ही संयोगिता की आँखों में हल्की नमी उतर आई। क्योंकि वो जानती थी जिस घर की बात ये बच्चा कर रहा है…
वहाँ उसकी असली माँ अब कभी नहीं लौटेगी। कुछ पल तक वो सिर्फ विवान को देखती रही। उसके अंदर दो आवाज़ें लड़ रही थीं—

एक कह रही थी दूर रहो।
 दूसरी कह रही थी…वादा निभाओ।
आखिरकार उसने धीरे से विवान का हाथ पकड़ लिया।

संयोगिता विवान को गोद में उठाकर अपनी car की तरफ बढ़ने लगी।

विवान उसके कंधे पर सिर रखकर धीरे से बोला—
मम्मा… अब आप कहीं मत जाना…

संयोगिता कुछ नहीं बोली। बस उसकी पकड़ थोड़ी और मजबूत हो गई। और पहली बार…उस साइको killer के अंदर
एक माँ जैसा दर्द जन्म लेने लगा था।