घाट पर अब पहले से कहीं ज़्यादा भीड़ जमा हो चुकी थी।
गंगा की लहरों पर तैरते छोटे-छोटे दीपक अंधेरे पानी को रोशनी से भर रहे थे।
चारों ओर घंटियों की आवाज़, शंखनाद और "हर-हर महादेव" के जयकारे गूँज रहे थे।
आरती शुरू होने वाली थी।
शक्ति और अलिशा भीड़ के बीच एक किनारे खड़ी थीं।
शक्ति की नज़र सामने गंगा पर टिक गई।
दिनभर की थकान जैसे उस शांत दृश्य को देखते ही कुछ कम हो गई।
अलिशा ने धीरे से कहा—
"मैडम... आरती शुरू होने वाली है।"
शक्ति ने हल्का-सा सिर हिलाया।
"हम्म।"
उसी समय...
घाट की दूसरी ओर शिवाय अपनी बहन और कुशल के साथ आकर खड़े हुए।
शिवाय की नज़र भी गंगा की ओर थी।
तभी आरती की पहली घंटी गूँजी।
पुजारी ने दीप प्रज्वलित किया।
लपटों की रोशनी धीरे-धीरे पूरे घाट पर फैलने लगी।
हवा का एक हल्का झोंका आया।
शक्ति के खुले बाल उसके चेहरे पर आ गए।
उसने हाथ उठाकर बालों को पीछे करने की कोशिश की।
और उसी क्षण...
उसकी नज़र सामने उठी।
भीड़ के उस पार...
कुछ दूरी पर...
एक व्यक्ति शांत खड़ा था।
काली शर्ट और काली पैंट में।
चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता...
और आँखें सीधे गंगा की ओर थीं।
लेकिन अगले ही पल...
उसकी नज़र भीड़ के बीच खड़ी शक्ति पर जाकर ठहर गई।
दोनों की नज़रें पहली बार मिलीं।
सिर्फ़ कुछ सेकंड के लिए।
लेकिन उन कुछ सेकंडों में...
जैसे आसपास का शोर धीमा पड़ गया हो।
शक्ति ने बिना किसी वजह के अपनी नज़रें नहीं हटाईं।
शिवाय भी कुछ पल तक उसे देखते रहे।
फिर दोनों ने लगभग एक साथ अपनी नज़रें गंगा की ओर मोड़ लीं।
आरती की लौ हवा में लहरा रही थी...
और उन्हें अभी नहीं पता था...
कि यह कुछ सेकंड की मुलाकात...
आने वाले समय में उनकी पूरी ज़िंदगी बदलने वाली थी।
शक्ति ने जैसे ही पीछे मुड़कर देखा...
उसके कदम वहीं ठिठक गए।
शिवाय ठीक उसके पीछे खड़े थे।
इतने करीब कि अचानक हुई उस मौजूदगी से शक्ति एक पल के लिए घबरा गई।
अगले ही पल उसका पैर फिर से लड़खड़ा गया और वह पीछे की ओर गिरने लगी।
शिवाय ने बिना देर किए उसका हाथ पकड़ लिया।
एक झटके में उसने उसे अपनी ओर खींच लिया।
शक्ति फिर से शिवाय के सीने से आ लगी।
कुछ पल के लिए दोनों बिल्कुल स्थिर रह गए।
शिवाय ने उसे संभालने के लिए उसका हाथ थामे रखा।
और जैसे ही शक्ति ने खुद को पीछे करने की कोशिश की, उसका संतुलन फिर थोड़ा बिगड़ा।
शिवाय ने सहजता से उसका दूसरा हाथ थाम लिया और उसे संभाल लिया।
दोनों की नज़रें मिलीं।
आसपास की भीड़ आगे बढ़ती रही...
घाट पर दीपों की रोशनी अब भी गंगा की लहरों पर झिलमिला रही थी...
लेकिन उन दोनों के लिए जैसे उस पल में बाकी सब कुछ धुंधला पड़ गया था।
शक्ति कुछ कह नहीं पाई।
शिवाय भी खामोश रहे।
बस...
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
दोनों एक-दूसरे की आँखों में जैसे खो गए थे।
आसपास की भीड़, आरती की आवाज़ें और गंगा की लहरों का शोर...
कुछ पल के लिए सब जैसे उनसे दूर हो गया था।
दोनों एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी थे...
फिर भी उस पल उनकी नज़रें एक-दूसरे से हट नहीं रही थीं।
उधर...
अलिशा की आँखें हैरानी से फैल गई थीं।
वह पहली बार शक्ति को किसी अजनबी लड़के के इतने करीब देख रही थी।
उसके चेहरे पर साफ़ सदमा था।
वहीं दूसरी ओर शिवाय की बहन और कुशल भी कुछ पल से उन दोनों को ही देख रहे थे।
उनके चेहरों पर भी वही हैरानी थी।
किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर अभी हुआ क्या था।
तभी...
शक्ति का ध्यान अचानक टूटा।
उसने जैसे ही आसपास देखा, उसे एहसास हुआ कि वह कब से शिवाय के इतने करीब खड़ी थी।
वह झेंप गई।
और बिना कुछ सोचे उसने शिवाय को हल्का-सा धक्का दे दिया।
शिवाय अचानक मिले उस धक्के से एक कदम पीछे हुए।
उसी क्षण...
उन्होंने शक्ति को संभालने के लिए उसकी कमर पर बना अपना सहारा हटा लिया।
लेकिन जैसे ही सहारा हटा...
शक्ति का संतुलन फिर बिगड़ गया।
"अरे—!"
वह पीछे की ओर लड़खड़ाई।
अगले ही पल...
छपाक!
शक्ति सीधे घाट के पानी में जा गिरी।
"दीदी!"
अलिशा की चीख निकल गई।
कुछ ही सेकंड में आसपास मौजूद लोगों का ध्यान भी उस ओर चला गया।
लोग तेजी से वहाँ इकट्ठा होने लगे।
शिवाय वहीं खड़े रह गए।
उनकी नज़रें गंगा के पानी पर टिक गईं...
जहाँ अभी-अभी शक्ति गिरी थी।
अचानक पानी में गिरने से शक्ति कुछ पल के लिए घबरा गई।
उसे तैरना आता था, लेकिन इस तरह अचानक संतुलन बिगड़ने से वह खुद को ठीक से संभाल नहीं पा रही थी।
"बचाओ...!"
उसकी आवाज़ घाट पर गूँज उठी।
"कोई है... हेल्प!"
अलिशा का चेहरा घबराहट से सफेद पड़ गया।
"दीदी!"
वह घाट के किनारे तक पहुँचते हुए चीखी।
फिर अचानक उसकी नज़र शिवाय पर पड़ी।
उसका सारा डर गुस्से में बदल गया।
"हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी मेरी बहन को पानी में धक्का देने की?"
शिवाय ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
"क्या?"
अलिशा गुस्से में बोली—
"ऐसे कैसे तुम किसी लड़की को पानी में गिरा सकते हो?"
"जाओ... उन्हें बचाओ!"
"कहीं उन्हें कुछ हो गया तो?"
शिवाय ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा—
"मैंने उन्हें धक्का नहीं दिया।"
"उन्होंने खुद मुझे धक्का दिया था..."
"और उसी वजह से मेरी पकड़ छूट गई।"
अलिशा ने गुस्से में कहा—
"बकवास मत करो!"
"जो भी हुआ हो, अभी बहस का समय नहीं है।"
"जाओ और उन्हें बचाओ!"
शिवाय कुछ कह पाते, उससे पहले उनकी बहन भी आगे आ गई।
अभी कुछ पल पहले तक वह दोनों को साथ देखकर मन ही मन न जाने कितने सपने सजा रही थी।
लेकिन अब उसकी सारी खुशी चिंता में बदल चुकी थी।
वह भी शिवाय पर बरस पड़ी—
"भैया सा! आप खड़े क्या देख रहे हैं?"
"पहले उन्हें बाहर निकालिए!"
"बाद में सफाई देते रहना कि किसने किसे धक्का दिया था!"
कुशल ने भी तुरंत घाट की ओर देखा।
"सर... जल्दी कीजिए!"
शिवाय ने एक पल भी और समय बर्बाद नहीं किया।
उन्होंने अपनी बहन और कुशल की ओर देखा...
फिर गंगा की ओर।
और अगले ही पल...
वह शक्ति की मदद के लिए आगे बढ़ गए।
गंगा की लहरों के बीच शक्ति अब भी मदद के लिए पुकार रही थी...
और शिवाय बिना एक पल गँवाए उसकी ओर बढ़ चुके थे।
उन्हें अभी नहीं पता था...
कि आज गंगा के किनारे जिस अजनबी को वह बचाने जा रहे थे...
वही अजनबी आगे चलकर उनकी ज़िंदगी का सबसे खास हिस्सा बनने वाली थी।
जानने के लिए पढ़ते रहिए... Shakti Ke Shiv...