Extramarital Affair - 4 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 4

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एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 4

कमरे में गूंजती हुई उस घंटी की आवाज़ ने जैसे किसी सोए हुए बवंडर को अचानक जगा दिया था। वह आवाज़ सिर्फ एक दरवाजे की दस्तक नहीं थी, बल्कि उस अदृश्य तलवार की तरह थी जो किसी भी वक्त एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर के इस नाजुक और वर्जित ताने-बाने को चीरकर रख सकती थी। राघवन का दिल एक पल के लिए जैसे अपनी जगह से छिटक कर हलक में आ गया था। उसके हाथ में दबी सिगरेट की राख बिस्तर की सफेद चादर पर बिखर गई, और उसके चेहरे का रंग फीका पड़ गया।
दूसरी तरफ, मीरा, जो कुछ पल पहले तक अपनी ही दुनिया में बेफिक्र थी, एकदम से सतर्क हो गई। उसकी आँखें फैल गईं और उसने तेजी से चादर को अपने ऊपर खींचते हुए राघवन की तरफ देखा। उस एक सेकंड के भीतर, दोनों के चेहरों पर जो खौफ और असमंजस उभरा, वह उस हकीकत का सबसे कड़वा सच था—जिसे वे दोनों जितनी शिद्दत से जी रहे थे, उतनी ही शिद्दत से उसके अंजाम से डर भी रहे थे।
"कौन हो सकता है इस वक्त?" मीरा की आवाज लगभग फुसफुसाहट में बदल चुकी थी। उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें उभर आई थीं।
"संभलो..." राघवन ने धीमी लेकिन कांपती हुई आवाज में खुद को और मीरा को निर्देश दिया। उसके दिमाग में एक साथ सैकड़ों विचार दौड़ने लगे—क्या यह उसकी पत्नी थी, जो किसी काम से अचानक लौट आई थी? क्या किसी पड़ोसी को कोई शक हो गया था? या फिर यह कोई ऐसा अनचाहा मेहमान था जो इस वक्त इस चारदीवारी के भीतर झांकने की हिम्मत कर रहा था?
घंटी एक बार फिर बजी—इस बार पहले से ज्यादा तेज और बेसब्र।
राघवन ने हड़बड़ाते हुए अपने बिखरे हुए कपड़े संभाले, खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश की और लिविंग रूम की तरफ कदम बढ़ाए। हर एक कदम उठाते हुए उसके पैरों में एक अजीब सा भारीपन था, मानो वह किसी फांसी के तख्ते की तरफ बढ़ रहा हो। उसने गहरी सांस ली, अपने माथे का पसीना पोछा और धीरे से मुख्य दरवाजे की कुंडी पर हाथ रखा। उसने ‘पीप होल’ (आंख से देखने वाले लेंस) से बाहर झांका।
बाहर का नजारा देखकर उसकी सांसें एक पल के लिए अटक गईं।
वहाँ कोई और नहीं, बल्कि उसकी अपनी पत्नी, शालिनी, खड़ी थी। उसके एक हाथ में ऑफिस का भारी बैग था और दूसरे हाथ में चाबियों का गुच्छा। उसके चेहरे पर थकावट के साथ-साथ एक अजीब सी बेचैनी साफ झलक रही थी। शालिनी का यूं अचानक, बिना किसी पूर्व सूचना के दोपहर में घर लौट आना किसी बड़े झटके से कम नहीं था। आमतौर पर वह शाम को ही लौटती थी, लेकिन आज... आज क्या हुआ था? क्या उसे कोई शक हो गया था? या फिर ऑफिस से जल्दी छुट्टी मिल गई थी?
राघवन का दिमाग सुन्न पड़ गया। उसके सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि बेडरूम में मीरा मौजूद थी—वह मीरा, जिसके साथ उसके इस अवैध रिश्ते का कच्चा चिट्ठा इस घर के हर कोने में फैला हुआ था। हवा में अभी भी उस अंतरंगता की महक घुली हुई थी, कॉफ़ी के कप बिखरे थे, और मीरा का लेदर बैग सोफे पर ही रखा था। अगर शालिनी ने एक कदम भी अंदर रखकर घर की इस हालत को देख लिया, तो उनके पास सफाई देने का कोई मौका नहीं बचेगा। पूरी गृहस्थी, समाज में इज्जत, और उनका वर्षों पुराना दांपत्य जीवन एक झटके में खाक हो जाएगा।
उसने धीरे से दरवाजा खोला, अपने चेहरे पर एक बनावटी मुस्कان और आश्चर्य का मुखौटा ओढ़ते हुए पूछा, "शालिनी? तुम... इतनी जल्दी? सब ठीक तो है ना?"
शालिनी बिना कुछ कहे सीधे अंदर आ गई। उसने अपना बैग ज़ोर से सोफे पर पटका—ठीक उसी जगह जहाँ कुछ ही पल पहले मीरा का बैग रखा था, जिसे राघवन ने घबराहट में छुपाने का मौका ही नहीं पाया था। शालिनी की नजरें सीधे उस बैग पर पड़ीं। उसके चेहरे के हाव-भाव पल भर में बदल गए।
"यह किसका बैग है, राघवन?" शालिनी की आवाज़ में तीखापन और एक अजीब सा शक साफ झलक रहा था। उसकी आँखें कमरे का जायजा लेने लगीं—टेबल पर रखे दो कप, हवा में तैरती हुई एक अलग सी महक, और राघवन के माथे पर टपका हुआ वह पसीना जो उसकी चोरी पकड़े जाने की गवाही दे रहा था।
राघवन का गला सूख चुका था। आधुनिक जीवन की यह सबसे बड़ी विडंबना होती है कि इंसान कितना भी शातिर क्यों न हो, जब उसके झूठ का पर्दाफाश होने का वक्त आता है, तो उसकी सारी बुद्धिमत्ता धरी की धरी रह जाती है। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या जवाब दे। अगर वह सच बोलता है तो सब कुछ खत्म, और अगर झूठ बोलता है तो झूठ के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकती जा रही थी।
"वह... वो मेरी एक कलीग है... ऑफिस के किसी काम से आई थी," राघवन की जुबान लड़खड़ा गई। उसके मुँह से निकला यह झूंठा बहाना इतना कमजोर था कि कोई भी समझ सकता था।
शालिनी ने एक ठंडी और जहरीली हंसी हँसी। उसने मुड़कर राघवन की आँखों में देखा—ऐसी नज़रों से जिसमें वर्षों के विश्वास के टूटने का दर्द और गुस्से की आग एक साथ सुलग रही थी। "कलीग? दोपहर के ढाई बजे, इस घर में, और तुम्हारे पसीने छूटे हुए हैं? राघवन, मुझे बेवकूफ मत समझो। मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, तुम्हारे हर झूठ और सच को अच्छी तरह जानती हूँ। वो अंदर कमरे में कौन है? बाहर निकालो उसे!"
शालिनी की आवाज़ घर की दीवारों से टकराकर गूंजने लगी। उस आवाज़ में एक ऐसा तूफान था जो सब कुछ बहा ले जाने की ताकत रखता था।
बेडरूम के भीतर, बंद दरवाजों के पीछे खड़ी मीरा यह सब साफ सुन रही थी। उसके दिल की धड़कनें भी उतनी ही तेजी से भाग रही थीं जितनी राघवन की। वह जानती थी कि अब छुपने का कोई फायदा नहीं है। एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर के इस खेल का अंत आखिरकार यहीं, इसी तरह होना था—आमने-सामने, बिना किसी परदे के, और बिना किसी लिहाज के।
राघवन ने जब देखा कि अब बात हाथ से निकल चुकी है, तो उसके भीतर का वह डर धीरे-धीरे एक अजीब सी सुन्नता में बदलने लगा। उसने शालिनी को रोकने की कोशिश की, लेकिन शालिनी गुस्से से कांपते हुए सीधे बेडरूम की तरफ बढ़ गई। उसने झटके से बेडरूम का दरवाजा खोल दिया।
कमरे के उस पार, बिस्तर के पास खड़ी मीरा और दरवाजे पर खड़ी शालिनी—दोनों आमने-सामने थीं। वक्त जैसे उसी एक सेकंड में हमेशा के लिए जम गया हो।
यह सिर्फ दो औरतों का आमना-सामना नहीं था; यह आधुनिक समाज के उस दोहरे चरित्र, रिश्तों की उलझनों, और वर्जित प्रेम की उस कीमत का चरमोत्कर्ष था जिसे हर वह इंसान चुकाने को मजबूर होता है जो अपनी सीमाओं को लांघकर किसी ‘ख्वाबगाह’ की तलाश में निकल पड़ता है। कमरे की खामोशी अब किसी विस्फोटक बारूद की तरह थी, जो कभी भी फट सकती थी। शालिनी की आँखों के अंगारे और मीरा के चेहरे की वह शांत लेकिन दृढ़ स्वीकारोक्ति—इन दोनों के बीच राघवन खड़ा था, खुद अपने ही बुने हुए जाल में पूरी तरह फंस चुका।
शालिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने मीरा को पहचान लिया था। भले ही सात साल बीत चुके थे, भले ही समय ने दोनों के चेहरों पर थोड़ी लकीरें खींच दी थीं, लेकिन शालिनी उस चेहरे को कभी नहीं भूल सकती थी—वही मीरा, जिसके जाने के बाद राघवन ने अपने भीतर एक चुप्पी ओढ़ ली थी, हालांकि तब शालिनी को लगा था कि वह सिर्फ करियर का तनाव है।
"तुम... तुम हो मीरा?" शालिनी की आवाज़ में गुस्से से ज्यादा एक गहरा अचंभा और आघात था। "सात साल पहले तुम अचानक गायब हो गई थी... और आज तुम मेरे घर में, मेरे पति के साथ... इस हालत में?"
मीरा ने अपनी जगह से हिलने की कोशिश नहीं की। उसने बहुत ही सधे हुए कदमों से आगे बढ़कर खुद को संभाला। उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि एक ऐसा सुकून था जो सब कुछ खो देने के बाद इंसान के हिस्से में आता है। उसने शालिनी की तरफ देखा और बहुत ही शांत स्वर में कहा, "हाँ, मैं हूँ शालिनी। और मैं जानती हूँ कि इस वक्त मेरे यहाँ होने का कोई भी ऐसा तर्क नहीं है जिसे तुम स्वीकार कर सको। लेकिन सच यह है कि कुछ रिश्ते वक्त के साथ खत्म नहीं होते, वे बस दफ़्न हो जाते हैं... और मौका मिलने पर अपनी कब्र चीरकर बाहर आ जाते हैं।"
"फालतू की दार्शनिक बातें मत करो मुझसे, मीरा!" शालिनी का गुस्सा अब सीमा लांघ चुका था। उसकी आवाज़ में चीख जैसी कड़वाहट थी। उसने मुड़कर राघवन की तरफ देखा, जिसकी नज़रें ज़मीन पर टिकी थीं। "और तुम? राघवन, तुम्हें शर्म आनी चाहिए! अपनी गृहस्थी के पीछे, इस साफ-सुथरी जिंदगी के पीछे तुम ये सब खेल खेल रहे थे? क्या कमी थी तुम्हारी जिंदगी में? मैंने क्या नहीं किया तुम्हारे लिए?"
राघवन ने धीरे से अपनी नज़रें उठाईं। उसके भीतर का वह दबा हुआ घुटन, वह बरसों का एकांत और वह समझौतावादी जीवन अब और छिपाए नहीं छुप रहा था। उसने शालिनी की आँखों में आँखें डालकर कहा, "कमी किसी चीज़ की नहीं थी, शालिनी... सब कुछ था—घर था, गाड़ी थी, समाज में इज़्जत थी, और एक व्यवस्थित जीवन था। लेकिन जो नहीं था, वो था 'जीवन' खुद। हम दोनों एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दो अलग-अलग अजनबियों की तरह जी रहे थे। क्या कभी तुमने रुककर मुझसे पूछा कि मैं अंदर से कितना टूट चुका हूँ? क्या कभी तुमने उस खामोश तन्हाई को महसूस किया जो हमारे इस आदर्श रिश्ते के पीछे पल रही थी?"
यह सच्चाई किसी खंजर की तरह शालिनी के सीने में उतरी। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि राघवन के मन में इतनी गहरी घुटन पल रही है। आधुनिक महानगरों की चकाचौंध और भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अपने पार्टनर को सब कुछ दे देते हैं सिवाय अपने वक्त और अपनी सच्ची भावनाओं के। वे एक आदर्श पति-पत्नी होने का नाटक तो करते हैं, लेकिन भीतर से पूरी तरह मर चुके होते हैं।
"तो इसका मतलब यह नहीं है कि तुम मेरे पीठ पीछे ये सब करोगे!" शालिनी की आँखों से अब आँसू छलक आए थे—वह गुस्सा अब एक लाचार दर्द में बदल चुका था। "अगर तुम्हें इतनी ही घुटन थी, तो तुम मुझसे कह सकते थे, तलाक ले सकते थे! इस तरह चोरी-छिपे किसी पुराने रिश्ते की राख से आग भड़काना... यह कायरता है, राघवन!"
"हाँ, हम कायर थे, शालिनी," इस बार मीरा ने बीच में बोलते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी नरमी और दृढ़ता दोनों थी। उसने अपना लेदर बैग उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी। "हम में इतनी हिम्मत नहीं थी कि समाज की इस बनी-ब बनाई व्यवस्था को खुलेआम चुनौती दे सकें। हम अपनी-अपनी कायरता के दायरे में घुटते रहे। लेकिन आज जो हुआ, वह अच्छा ही हुआ। कम से कम अब इस झूठ का परदा तो गिरा।"
मीरा ने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया। राघवन ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा। उसके भीतर एक जबरदस्त खिंचाव था—वह मीरा को रोकना चाहता था, उस रिश्ते को बचाना चाहता था जो अभी-अभी शालिनी के सामने बेनकाब हुआ था। लेकिन उसके पैर जमीन पर जैसे सीसे की तरह जम चुके थे।
मीरा दरवाजे से बाहर निकल गई। उसकी वह परछाईं, जो सात साल पहले धुएं की तरह गायब हुई थी, आज एक बार फिर उसी सन्नाटे में कहीं खो गई।
पीछे छूट गए कमरे में केवल शालिनी की सिसकियों की आवाज़ और राघवन का वह टूटा हुआ वजूद था। आधुनिक जीवन के रिश्तों की इस जटिलता ने एक बार फिर साबित कर दिया था कि इंसान चाहे जितनी भी आधुनिकता अपना ले, जब उसके भीतर का सच बाहर आता है, तो वह अपने पीछे सिर्फ खंडहर छोड़ जाता है।
शालिनी बिना कुछ कहे अपने बेडरूम की तरफ मुड़ गई, और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उस बंद दरवाजे की आवाज़ ने राघवन के जीवन के एक और अध्याय को हमेशा के लिए सील कर दिया था। वह अकेला, उस शांत लिविंग रूम में खड़ा था, जहाँ कॉफ़ी के दो कप अभी भी अपनी ठंडी गवाही दे रहे थे।



क्रमशः