Extra Marital Affair - 2 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 2

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एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 2

सुबह की पहली किरण जब खिड़की के उन मोटे पर्दों को चीरती हुई कमरे के भीतर दाखिल हुई, तो उसने किसी स्वागत का संदेश देने के बजाय केवल इस बात की गवाही दी कि एक और लंबा, उलझनों से भरा दिन शुरू हो चुका है। राघवन की आँखें खुली थीं। वह पिछले कई घंटों से छत पर बने सीलिंग फैन के परों को घूमते हुए देख रहा था। उसके बगल में, बिस्तर के दूसरे हिस्से पर मीरा गहरी नींद में सो रही थी। उसके बिखरे हुए बाल और चेहरे पर छाई एक अनाम सी शांति इस बात का अहसास करा रही थी कि सात साल की इस लंबी और थका देने वाली यात्रा के बाद, कम से कम कुछ पलों के लिए ही सही, उसे एक ठिकाना मिल गया था।
लेकिन क्या यह वाकई कोई ठिकाना था? या फिर यह दो ऐसे भटकते हुए जहाजों का अस्थायी मिलन था, जो अपनी-अपनी तूफानी यात्रा के बाद महز एक लहर के थपेड़े से एक-दूसरे के करीब आ गए थे?
राघवन ने धीरे से उठने की कोशिश की ताकि मीरा की नींद न टूटे। फर्श पर उसके पैर पड़े तो ठंडी टाइल्स का अहसास रीढ़ में सिहरन पैदा कर गया। उसने लिविंग रूम की तरफ कदम बढ़ाया। रात की वह ठंडी कॉफी अभी भी टेबल पर वैसे ही रखी थी। उसने खिड़की के पास जाकर बाहर देखा। सुबह की दिल्ली अब जाग चुकी थी—सड़कों पर गाड़ियों का शोर, अखबार वाले की साइकिल की घंटी, और बालकनी के ग्रिल पर आकर बैठती कुछ बेकरार कबूतरों की फड़फड़ाहट। यह सब कुछ सामान्य था, बेहद सामान्य। लेकिन राघवन के भीतर जो उथल-पुथल मची हुई थी, उसका इस बाहरी सामान्यता से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था।
एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर या यूं कहें कि विवाह की उस अदृश्य परिधि के बाहर खड़े होकर किसी पुराने रिश्ते की राख से नए शोले को कुरेदने की यह जिद कोई साधारण बात नहीं थी। राघवन का अपना एक बसा-बसाया संसार था—पत्नी, एक व्यवस्थित गृहस्थी, समाज की नजरों में एक सम्मानित छवि और वे तमाम जिम्मेदारियां जो एक आदर्श पति होने की कसौटी पर कसी जाती हैं। दूसरी तरफ मीरा थी, जिसका अपना अतीत था, अपनी एक दुनिया थी, और शायद उसके जीवन में भी वे तमाम समझौते थे जिन्हें इंसान दुनिया की नजरों से छिपाकर अपने भीतर दफना देता है।
दरवाजे पर हल्की सी सुगबुगाहट हुई। मीरा जाग चुकी थी। वह अपने कंधों पर एक शॉल लपेटे हुए हॉल में आई। उसकी आंखें अभी भी नींद से भारी थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी चौकसी भी थी—वैसी ही चौकसी जो किसी चोर दरवाजे से अपनी ही जिंदगी में दाखिल होने वाले इंसान के पास होती है।
"नींद नहीं आई?" मीरा ने अपनी भारी आवाज़ में पूछा, और धीरे-धीरे चलकर ठीक राघवन के करीब आ खड़ी हुई।
राघवन ने मुड़कर उसे देखा। उसके और मीरा के बीच की यह समीपता अब रात जैसी अकुलाहट नहीं, बल्कि एक गहरे, अपराधबोध और अनकहे आकर्षण के मिश्रित अहसास से भरी हुई थी। आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यह इंसान को सब कुछ देता है—भौतिक सुख, आज़ादी, और अपनी शर्तों पर जीने का भ्रम—लेकिन यह उससे वह सुकून छीन लेता है जो अपने ही घर में सुरक्षित महसूस करने से मिलता है। अब राघवन के अपने घर का यह कमरा, उसका अपना बिस्तर, सब कुछ पराया सा लगने लगा था।
"नींद तो शायद सात साल पहले ही कहीं छूट गई थी, मीरा," राघवन ने धीमी और ठहरी हुई आवाज़ में कहा। उसने मीरा के कंधे पर पड़े शॉल को थोड़ा और करीने से ठीक करना चाहा, लेकिन उसके हाथ हवा में ही रुक गए। वह रेखा जिसे समाज, नैतिकता और वैवाहिक संस्था ने खींच रखा था, अचानक दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार बनकर खड़ी हो गई।
"तो फिर तुम क्यों रुक गए थे उस रात?" मीरा की आँखें सीधे राघवन की आँखों में झांक रही थीं। उन आँखों में कोई शिकवा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी भूख थी—सच्चाई को जीने की भूख, भले ही वह सच्चाई कितनी भी खतरनाक क्यों न हो। "क्यों तुमने मान लिया कि जो जिंदगी तुमने चुनी है, वही तुम्हारी नियति है? क्या कभी तुमने आईने के सामने खड़े होकर खुद से यह नहीं पूछा कि तुम जो जी रहे हो, वो जिंदगी है या सिर्फ एक समझौता?"
यह सवाल सीधा राघवन के सीने में उतरा। एक ऐसा सवाल जिसका जवाब उसके पास पिछले कई सालों से नहीं था। उसने अपनी जिंदगी के हर समीकरण को गणित की तरह सुलझाया था—करियर, प्रमोशन, सामाजिक प्रतिष्ठा, और एक आदर्श परिवार। लेकिन इस सारे गणित के बीच वह इंसान कहां खो गया था, जो किसी की एक हंसी पर अपनी पूरी दुनिया लुटा देने का दम रखता था?
"समझौते और जरूरतें इंसान को कायर बना देती हैं, मीरा," राघवन ने अपनी नजरें चुराते हुए कहा। वह किचन की तरफ मुड़ा और इस बार बिना किसी औपचारिकता के गैस ऑन करके पानी चढ़ाया। "जब तुम समाज के बीच में रहते हो, तो तुम्हें उसके नियमों के दायरे में चलना पड़ता है। तुम अपनी चाहतों के हिसाब से दुनिया नहीं चला सकते।"
"तो फिर ये चाहतें हमें क्यों तंग करती हैं?" मीरा उसके पीछे-पीछे किचन के छोटे से दायरे में आ गई। उसकी मौजूदगी से वह छोटी सी जगह और भी संकरी महसूस होने लगी, पर उस संकीर्णता में एक अजीब सी गर्माहट थी। मीरा ने अपना हाथ राघवन के कंधे पर रख दिया। उसकी उंगलियों का स्पर्श बिजली के हल्के झटके की तरह राघवन के पूरे जिस्म में दौड़ गया। "क्यों हम अपने भीतर के उस सूनेपन को छिपाने के लिए दिन-रात पागलों की तरह भागते हैं? क्या इसलिए कि कोई दूसरा हमारे इस खोखलेपन को न देख ले?"
यह स्पर्श साधारण नहीं था। यह उस वर्जित दायरे में प्रवेश करने की पहली दस्तक थी, जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं होता। जब दो इंसान अपने-अपने वैध रिश्तों की सीमाओं को लांघकर किसी तीसरे कोने में मिलते हैं, तो उनके बीच का हर पल एक साथ एक वरदान और एक अभिशाप बन जाता है। वे जानते हैं कि यह रिश्ता समाज की नजरों में अवैध है, नैतिक तर्कों के तराजू पर यह हमेशा हल्का साबित होगा, और इसके अंत में सिर्फ बिखराव या खामोशी के सिवा कुछ नहीं है। फिर भी, इंसानी मनोविज्ञान की यह विडंबना है कि वह उस वर्जित फल की मिठास के आगे सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार रहता है।
चाय उबलने लगी थी। उसकी खदबदाहट ने दोनों के बीच के उस भारी सन्नाटे को तोड़ा। राघवन ने गैस बंद की और दो कपों में चाय उड़ेलने लगा। उसके हाथ हल्के से कांप रहे थे। यह कंपन ठंड की वजह से नहीं थी, बल्कि इस बात का डर था कि अगर यह सिलसिला यूं ही आगे बढ़ा, तो आने वाले दिनों में उनके पास खोने के लिए बहुत कुछ होगा—इज्जत, परिवार, और वह बनावटी स्थिरता जिसे उन्होंने बरसों की मेहनत से सींचा था।
चाय का कप हाथ में लेते हुए मीरा ने लिविंग रूम की सोफे पर बैठते हुए कहा, "जानते हो राघवन, जब मैं सात साल पहले गई थी, तो मुझे लगा था कि मैं किसी नए शहर में जाकर खुद को फिर से पा लूंगी। मैंने काम किया, नए लोगों से मिली, बड़ी-बड़ी कंपनियों के प्रोजेक्ट संभाले। लेकिन जैसे-जैसे मेरी सफलता का ग्राफ ऊपर चढ़ता गया, मेरा आंतरिक खालीपन और गहरा होता गया। महानगरों की ये बड़ी-बड़ी इमारतें, ये कांच के ऑफिस और इनके अंदर काम करने वाले हम जैसे रोबोट—सबके सब बस अपनी तन्हाई को छिपाने का नाटक कर रहे हैं।"
राघवन भी चाय का कप लेकर उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। उसने मीरा की बात को गहराई से महसूस किया। आज का यह आधुनिक जीवन इंसान को भीड़ में अकेला छोड़ देता है। हर कोई किसी न किसी मानसिक दबाव से गुजर रहा है—टारगेट पूरा करने का तनाव, परफेक्शन का दबाव, और सबसे बढ़कर यह साबित करने की होड़ कि उसकी जिंदगी बेहद खुशहाल है। सोशल मीडिया की चमकदार तस्वीरों के पीछे छिपे अवसाद और अकेलेपन को कोई नहीं देखता। और जब इस घुटन भरे माहौल में किसी ऐसे इंसान से मुलाकात हो जाती है, जो आपकी खामोशियॊं को बिना एक शब्द बोले समझ सकता है, तो रिश्तों की सारी सीमाएं और मर्यादाएं एक पल में ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगती हैं।
"तुम्हें क्या लगता है, मीरा? हम इसे क्या नाम दें?" राघवन ने अपनी आंखें उठाईं। उसकी आवाज में एक अजीब सी लाचारी और स्वीकारोक्ति दोनों थी। "इसे प्यार कहें, या अकेलेपन का साझा कारोबार, या फिर एक ऐसा दलदल जिससे बाहर निकलने का रास्ता हमें कभी नहीं मिलेगा?"
मीरा ने ठंडी चाय की चुस्की ली और एक फीकी, दर्द भरी हंसी हंस दी। "नाम देने की जरूरत किसे है, राघवन? समाज ने हर रिश्ते के लिए एक नाम तय कर रखा है—पति, पत्नी, दोस्त, दुश्मन। लेकिन जो रिश्ते इन नामों के दायरे में फिट नहीं बैठते, क्या उनका कोई वजूद नहीं होता? हम दोनों आज एक ऐसे मोड़ पर हैं जहां पीछे लौटने का रास्ता बंद है और आगे बढ़ने पर खाई है। लेकिन यकीन मानो, इस खाई के किनारे पर खड़े होकर जो हवा चल रही है, वह उस दमघोंटू कमरे से कहीं ज्यादा ताज़ा है जिसमें हम इतने सालों से घुट रहे थे।"
कमरे की खिड़की से छनकर आती धूप अब थोड़ी तेज हो चुकी थी। बाहर की दुनिया अपने रोजमर्रा के ढर्रे पर लौट आई थी—ट्रैफिक का शोर और इंसानों की वह अंतहीन दौड़ फिर से शुरू हो चुकी थी। लेकिन इस चारदीवारी के भीतर, समय जैसे एक अलग ही रफ्तार से बह रहा था।
राघवन ने महसूस किया कि मीरा का यहां आना उसके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित होने वाला है। एक तरफ उसका वह संसार था जो पूरी तरह सुरक्षित और स्थापित था, और दूसरी तरफ यह सुलगता हुआ रिश्ता था जो किसी भी वक्त उसकी पूरी गृहस्थी को खाक कर सकता था। लेकिन इन सब खतरों के बावजूद, उसके भीतर का एक कोना इस बात से इनकार नहीं कर पा रहा था कि वह इस खतरे को जीने के लिए अंदर ही अंदर बेकरार था।
मीरा उठी, अपना खाली कप टेबल पर रखा और राघवन के ठीक पास आकर खड़ी हो गई। उसने झुककर राघवन के बालों में अपनी उंगलियां फेरीं। यह अंतरंगता किसी योजना का हिस्सा नहीं थी, बल्कि दो टूटे हुए इंसानों की वह स्वाभाविक पुकार थी जो एक-दूसरे के सहारे खुद को बचाना चाहते थे।
"आज हम कहीं बाहर चलेंगे, राघवन," मीरा ने उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, और उसकी आवाज में एक ऐसी जिद थी जिसे ठुकराना मुमकिन नहीं था। "उन पुरानी जगहों पर जहां हमने कभी अपने सपने बुने थे। देखते हैं कि शहर कितना बदला है, और हम कितने..."
राघवन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी आंखें बंद कर लीं और मीरा के उस स्पर्श को अपने भीतर उतरने दिया। वह जानता था कि यह कदम उसे किस अंधेरे कुएं की तरफ धकेल रहा है, लेकिन वह यह भी जानता था कि अब पीछे हटने का वक्त निकल चुका था। दहलीज़ पर टंगे इस नए साए ने उनके भविष्य की रूपरेखा तय कर दी थी—एक ऐसा सफर जिसमें हर कदम पर जोखिम था, और हर मोड़ पर एक नया सच सामने आने का इंतजार कर रहा था।




क्रमशः