Extramarital affair - 5 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 5

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एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 5

शालिनी के बेडरूम का दरवाजा बंद होने की आवाज़ राघवन के लिए किसी गिलोटीन की तरह थी, जो उसके पूरे संसार को दो हिस्सों में बांट चुकी थी। उस बंद दरवाजे के पीछे का सन्नाटा किसी भी शोर से ज्यादा डरावना था। लिविंग रूम में राघवन खड़ा था, उसका शरीर जड़वत हो चुका था, और दिमाग में विचारों का एक ऐसा बवंडर था जिसने उसे पूरी तरह बेबस कर दिया था। उसने मीरा को बाहर जाते देखा था, उसे रोकने का खयाल उसके मन में आया था, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे। यह सिर्फ डर नहीं था, यह उस अंत का अहसास था जो हर एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर के मुकद्दर में लिखा होता है।
आधुनिक जीवन में हमारे पास सब कुछ है—इमारतें, गैजेट्स, सफलता की दौड़, और एक मुखौटा जिसे हम 'सुखी परिवार' कहते हैं—लेकिन उन चार दीवारों के भीतर जो रसातल है, उसे कोई नहीं देखना चाहता। शालिनी और राघवन के रिश्ते की नींव भी इसी तरह के एक दिखावे पर टिकी थी, जिसे आज मीरा की मौजूदगी ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था।
राघवन ने धीरे से सोफे की ओर कदम बढ़ाया और बैठ गया। उसके सामने मीरा का लेदर बैग अभी भी वैसे ही पड़ा था। उसने अपना हाथ बढ़ाकर उस बैग को छुआ। बैग का स्पर्श उसे मीरा की मौजूदगी का अहसास दिला रहा था। सात साल पहले की वह मीरा, जो अचानक गायब हो गई थी, और आज की मीरा, जो किसी बिजली की तरह आई और सब कुछ झुलसाकर चली गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि मीरा का यहाँ आना एक इत्तेफाक था या कोई गहरी सोची-समझी साजिश, जिसे वह खुद ही नहीं समझ पा रही थी।
मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें, तो एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर सिर्फ शारीरिक आकर्षण नहीं होता, बल्कि यह उस अधूरेपन की भरपाई की कोशिश होती है जिसे हम अपने वैध रिश्तों में नहीं पा पाते। राघवन का मीरा की तरफ खिंचाव उस पुरानी याद के प्रति लगाव नहीं था, बल्कि उस आधुनिक जीवन के विरुद्ध विद्रोह था जिसे उसने शालिनी के साथ जिया था।
करीब एक घंटे तक वह उसी तरह बैठा रहा। सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी खुद की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। अचानक, बेडरूम का दरवाजा खुला। शालिनी बाहर आई। उसकी आँखें लाल थीं, चेहरा सूजा हुआ था, लेकिन उसमें अब वह आक्रोश नहीं था जो कुछ पल पहले था। उसकी जगह एक ठंडी, पत्थर जैसी निर्जीवता आ गई थी।
"तुम्हें लगता है कि तुम बस अपनी गलती मान लोगे और सब ठीक हो जाएगा?" शालिनी ने बहुत ही शांत स्वर में पूछा। वह सोफे के सामने आकर रुकी, लेकिन उसने राघवन की तरफ नहीं देखा। "राघवन, हम इस तरह के समाज में रहते हैं जहाँ शादी का मतलब सिर्फ शारीरिक साथ नहीं, बल्कि एक सामाजिक कॉन्ट्रैक्ट होता है। तुमने न केवल मेरे भरोसे को तोड़ा है, बल्कि तुमने हमारे उस 'परफेक्ट' होने के ढोंग को भी तार-तार कर दिया है जिस पर हम दोनों ने मिलकर काम किया था।"
राघवन ने अपनी आँखें ऊपर कीं। "परफेक्ट होने का ढोंग ही तो हमें मार रहा था, शालिनी। क्या तुम कभी खुश थी? सच बताना। क्या हमारे बीच वह आत्मीयता थी जो दो इंसानों को एक बनाती है? हम तो बस एक दूसरे के साथ रहने का 'मैनेजमेंट' कर रहे थे।"
"मैनेजमेंट ही जिंदगी होती है, राघवन!" शालिनी चिल्लाई, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी लाचारी थी। "आधुनिक जीवन में भावनाएं लग्जरी हैं। लोग साथ रहते हैं क्योंकि वे एक-दूसरे पर निर्भर हैं—आर्थिक रूप से, सामाजिक रूप से। तुमने इसे 'अफेयर' के जरिए अपनी निजी खुशी के लिए इस्तेमाल किया, लेकिन तुमने कभी सोचा कि मेरी सुरक्षा का क्या? तुमने मेरी दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ से मैं पीछे मुड़कर नहीं देख सकती।"
राघवन को लगा कि शालिनी की बात में दम है। आधुनिक दौर में विवाह एक सुरक्षा कवच की तरह है। जब इस कवच में दरार पड़ती है, तो सबसे पहले वह इंसान असुरक्षित महसूस करता है जिसने अपनी पूरी जिंदगी इस कवच पर भरोसा करके बनाई थी। राघवन का अफेयर मीरा के साथ सिर्फ उसका व्यक्तिगत चुनाव नहीं था, यह उस असुरक्षा का एक बड़ा विस्फोट था जो समाज के हर उस जोड़े के भीतर दबा हुआ है जो अपने रिश्तों की असलियत का सामना करने से डरते हैं।
"मैं तुमसे माफी नहीं मांगूंगा, शालिनी," राघवन ने अपनी आवाज में एक ऐसी कठोरता लाने की कोशिश की जो उसके भीतर थी नहीं। "क्योंकि अगर मैं माफी मांगता हूँ, तो इसका मतलब होगा कि मैं उस सच्चाई को भी नकार रहा हूँ जिसे मैंने मीरा के साथ महसूस किया। वह गलत था, मुझे पता है। लेकिन वह 'झूठ' नहीं था। और हमारी यह शादी... यह पिछले पांच सालों से सिर्फ एक 'झूठ' ही थी।"
शालिनी ने एक गहरी सांस ली। वह सोफे के दूसरे छोर पर बैठ गई। उन दोनों के बीच की जगह, जो पहले सामान्य थी, अब एक ऐसा विशाल अंतर बन चुकी थी जिसे शायद पूरी जिंदगी भी नहीं भरा जा सकता था। शालिनी ने अपना फोन निकाला और कुछ स्क्रॉल किया। वह मीरा की सोशल मीडिया प्रोफाइल देख रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी कड़वाहट थी।
"वह तुमसे क्या चाहती है, राघवन? क्या वह तुम्हें वापस ले जाना चाहती है उस दौर में, जब तुम शायद थोड़े ज्यादा खुश थे?" शालिनी ने फोन राघवन की तरफ बढ़ा दिया।
स्क्रीन पर मीरा की तस्वीरें थीं। वह किसी कैफे में बैठी थी, उसके चेहरे पर एक ऐसी स्वतंत्रता की चमक थी जो शालिनी के चेहरे पर कभी नहीं दिखी थी। मीरा एक ऐसी जिंदगी जी रही थी जो बंधनों से मुक्त थी। राघवन ने उन तस्वीरों को देखते हुए महसूस किया कि वह सिर्फ मीरा के शरीर या उसके बीते हुए कल के प्रति आकर्षित नहीं था, बल्कि वह उस 'आज़ादी' के प्रति आकर्षित था जो मीरा का व्यक्तित्व दर्शाती थी। आधुनिक समय में, हम सब किसी न किसी तरह अपनी बेड़ियों को तोड़ना चाहते हैं, और एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर अक्सर उसी बेड़ियों को तोड़ने का एक माध्यम बन जाते हैं।
"वह कुछ नहीं चाहती, शालिनी। हम बस एक दूसरे के तिनके हैं जो डूबते हुए दरिया में एक-दूसरे को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं।" राघवन ने फोन वापस कर दिया।
रात गहरी होती जा रही थी। बाहर की दुनिया सो चुकी थी, लेकिन उनके घर का यह लिविंग रूम अब किसी युद्धक्षेत्र की तरह था। शालिनी ने राघवन की तरफ देखा। उसकी आँखों में अब आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसा फैसला था जो उसने शायद उन दो घंटों में ले लिया था जब वह अंदर बंद थी।
"मैं तुम्हें छोड़ नहीं रही हूँ, राघवन। अभी नहीं," उसने धीमी आवाज़ में कहा। "क्योंकि मुझे पता है कि अगर मैं गई, तो समाज में मेरी क्या स्थिति होगी। मैं इस शादी के उस 'कॉन्ट्रैक्ट' को निभाऊंगी जो हमने किया था। लेकिन एक बात समझ लो—तुम अब मेरे लिए केवल एक पार्टनर हो, एक ऐसे साथी जिसके साथ मुझे अपनी जिंदगी के कुछ साल गुजारने हैं। प्यार, भरोसा, या वो अपनापन जो कभी था... वह सब आज उसी वक्त खत्म हो गया जब मैंने उस बेडरूम का दरवाजा खोला था।"
यह वाक्य राघवन के लिए सजा-ए-मौत जैसा था। यह शारीरिक अलगाव से कहीं ज्यादा भयानक था—यह एक 'भावनात्मक मृत्युदंड' था। उसने शालिनी को एक ठंडे, व्यावसायिक पार्टनर की तरह स्वीकार कर लिया था, और यह एहसास राघवन के भीतर एक गहरा सन्नाटा पैदा कर गया।
वह उठकर खिड़की के पास गया। बाहर की दुनिया में अंधेरा था, लेकिन दूर कहीं एक सड़क की बत्ती जल रही थी। उसका ध्यान मीरा की तरफ चला गया। वह कहाँ होगी इस वक्त? क्या वह भी उसी अकेलेपन को महसूस कर रही होगी जो शालिनी के साथ रहने के बावजूद राघवन के भीतर एक ज्वालामुखी की तरह सुलग रहा था?
अफेयर की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। यह एक ऐसी अधूरी सी कहानी होती है जिसमें दोनों पक्ष हमेशा किसी न किसी की बलि चढ़ाते हैं। राघवन ने शालिनी की बलि दी थी, शालिनी ने राघवन की आत्मा की, और मीरा... मीरा ने शायद खुद की।
राघवन ने महसूस किया कि उसे अब किसी तरह के 'ख्वाब' की जरूरत नहीं थी। उसने जो ख्वाबगाह बनाई थी, वह शालिनी के एक छोटे से वाक्य—'मैनेजमेंट ही जिंदगी है'—के आगे ढह चुकी थी। अब आगे क्या? क्या वह उसी मैनेजर वाली जिंदगी में वापस लौट जाएगा, जहाँ सब कुछ सही है लेकिन कुछ भी अपना नहीं है? या फिर वह मीरा के पास वापस जाएगा, भले ही उसके लिए उसे अपनी बची-खुची इज्जत भी दांव पर लगानी पड़े?
इंसानी मनोविज्ञान बड़ा अजीब है। हम जानते हुए भी गलतियां करते हैं, क्योंकि हम उस दर्द को नहीं सह पाते जो हमें असलियत के आईने में दिखता है। राघवन ने अपनी आँखें बंद कीं। उसके कान में मीरा की वे बातें गूंज रही थीं—कि समाज ने हर रिश्ते का एक नाम दिया है। राघवन ने सोचा कि अगर वह अपनी इस नई 'मैनेजमेंट वाली' शादी में रहेगा, तो उसका नाम क्या होगा? क्या वह एक पति होगा, या एक कैदी?
रात का तीसरा पहर था। घर में सन्नाटा था, लेकिन उस सन्नाटे में एक अजीब सी चीख छिपी थी। राघवन जानता था कि सुबह होने पर उसे फिर से वही मुखौटा पहनना होगा—वही दफ्तर, वही मुस्कुराते हुए कलीग्स, वही दुनिया जो यह मानती है कि सब कुछ बिल्कुल ठीक है।
लेकिन कल से सब कुछ बदल चुका था। उसने अपनी कलाई घड़ी देखी। उसका समय अब उसके हाथ में नहीं था। उसके जीवन की डोर अब उन लोगों के हाथों में थी जिन्हें वह कभी नहीं खोना चाहता था, और जिन्हें वह कभी पा नहीं सका।
उसने एक लंबी सांस ली और कमरे की लाइट बंद कर दी। अंधेरे में उसे शालिनी की वह ठंडी दृष्टि महसूस हुई, जो उसे अब एक पति की तरह नहीं, बल्कि एक अजनबी की तरह देख रही थी। एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर का यह नया अध्याय अब शुरू हो रहा था—जहाँ शरीर पास होंगे, लेकिन आत्माएं एक-दूसरे से हजारों मील दूर किसी और ही ख्वाबगाह में भटकती रहेंगी।
राघवन सोफे पर ही लेट गया। उसके दिमाग में मीरा के साथ बिताए वे पल फिल्म की तरह चल रहे थे—उनकी वो पहली मुलाकात, वो छुअन, वो तड़प... सब कुछ कितना असली लग रहा था। और फिर शालिनी की वो ठंडी हंसी, वो दरवाजा बंद होने की आवाज़... सब कितना बेजान।
इंसान की जिंदगी भी कितनी अजीब होती है। हम एक तरफ से मरते हैं तो दूसरी तरफ से जीने की कोशिश करते हैं, और इस कशमकश में न हम मर पाते हैं, न ही पूरी तरह जी पाते हैं। राघवन ने सोचा कि क्या वाकई कोई ऐसा रास्ता है जहाँ बिना किसी को चोट पहुँचाए, बिना किसी को धोखा दिए, इंसान बस 'इंसान' रह सके? आधुनिक दौर में शायद यह मुमकिन नहीं है। यहाँ हर इंसान को किसी न किसी सांचे में फिट होना पड़ता है, और जो सांचे से बाहर निकलता है, उसे या तो समाज कुचल देता है या वह खुद अपनी ही गलतियों के बोझ से दबकर खत्म हो जाता है।
वह मीरा के बारे में सोचने लगा। क्या मीरा को भी ऐसा ही पछतावा हो रहा होगा? क्या उसने भी शालिनी की तरह ही कोई 'कॉन्ट्रैक्ट' साइन किया होगा किसी और के साथ? यह खयाल उसके लिए असहनीय था। वह नहीं चाहता था कि मीरा किसी और के साथ वैसी ही जिंदगी जिए जैसी वह अब शालिनी के साथ जीने वाला था।
अंधेरे कमरे में, राघवन ने एक निर्णय लिया। वह अब मीरा से बात करेगा। वह इस 'मैनेजमेंट' वाली जिंदगी का हिस्सा नहीं बनेगा। उसे चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े, वह सच को अपनाएगा। भले ही वह सच कितना भी कड़वा, कितना भी विनाशकारी क्यों न हो।
यह फैसला लेना आसान था, पर उसे निभाना? राघवन ने अपनी मुट्ठी भींची। उसके नाखून उसकी हथेली में धंस गए। उसे दर्द महसूस हुआ, और उस दर्द में उसे एक अजीब सी राहत मिली। शायद इंसान को अपनी बर्बादी महसूस करने के लिए दर्द की जरूरत होती है।
वह सोफे से उठा और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर की सड़क पर अब एक-दो गाड़ियां गुजर रही थीं। कोई टैक्सी, कोई देर रात काम करने वाला कर्मचारी। वे सब अपनी-अपनी मंजिल की तरफ जा रहे थे। राघवन ने सोचा—'मेरी मंजिल क्या है?'
जवाब नहीं था। कोई जवाब नहीं था। उसके जीवन की सड़क अब एक ऐसे चौराहे पर आकर रुक गई थी जहाँ से चारों दिशाओं में सिर्फ धुंध थी।
उसे मीरा का फोन नंबर याद आया। सात साल पहले भी वही नंबर था। उसने अपना फोन निकाला। स्क्रीन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसने नंबर डायल किया। घंटी बज रही थी। एक बार... दो बार... तीन बार... चौथी घंटी पर आवाज़ आई।
"हेलो?" मीरा की आवाज़। वह भी नहीं सोई थी।
राघवन कुछ नहीं बोला। वह बस उसकी साँसों की आवाज़ सुनना चाहता था। मीरा ने फिर पूछा, "राघवन? तुम हो?"
"हाँ," राघवन की आवाज़ कांप रही थी। "शालिनी ने मुझे छोड़ दिया है। मतलब... उसने मुझे एक ऐसे साथी की तरह स्वीकार किया है जिससे उसे नफरत है।"
फोन के उस पार एक लंबी खामोशी थी। और फिर, मीरा की सिसकी सुनाई दी।
"हम दोनों ने बहुत बड़ी भूल की, राघवन," मीरा ने कहा। "हमने उन ख्वाबों को सच मान लिया, जिन्हें हमें सिर्फ ख्वाब ही रहने देना चाहिए था।"
"शायद," राघवन ने कहा। "लेकिन क्या हम अब वापस लौट सकते हैं? क्या हम उस झूठ को मिटा सकते हैं?"
"झूठ मिटाया नहीं जा सकता, राघवन," मीरा ने कहा। "झूठ के साथ ही जीना पड़ता है। बस फर्क इतना है कि अब हमें तय करना है कि हम उस झूठ के साथ कैसे जिएंगे।"
फोन कट गया। राघवन ने फोन हाथ से नीचे कर दिया। मीरा की बात उसके कानों में गूंज रही थी—'झूठ के साथ ही जीना पड़ता है।' क्या यह सच था? क्या आधुनिक जीवन की हर खुशी के पीछे कोई न कोई ऐसा ही झूठ छिपा होता है जिसे हम मरते दम तक ढोते हैं?
राघवन ने फर्श पर पड़ी अपनी डायरी उठाई। उसने उस पन्ने को फाड़ दिया जिस पर 'ख्वाब' लिखा था। उसने उसे जला दिया। कागज जलकर राख हो गया, और उस राख को उसने हवा में उड़ा दिया।
अब न कोई ख्वाब था, न कोई ख्वाबगाह। बस एक सन्नाटा था, और एक ऐसी जिंदगी थी जो अब किसी और की शर्तों पर चलने वाली थी।
सुबह हो रही थी। सूरज की पहली किरण ने कमरे में झांका। राघवन ने देखा कि उसकी जिंदगी अब बदल चुकी थी। शालिनी कमरे से बाहर आई। उसने राघवन को देखा, बिना किसी भाव के, बिना किसी गुस्से के। वह बस किचन की तरफ गई और चाय बनाने लगी।
एक सामान्य सुबह। एक सामान्य घर। एक असामान्य जिंदगी।
राघवन ने महसूस किया कि सबसे बड़ा सच यही था कि जिंदगी कभी रुकती नहीं है। चाहे हम टूट जाएं, चाहे हम मर जाएं, चाहे हम किसी भी 'अफेयर' के दलदल में धंस जाएं—दुनिया चलती रहती है।
उसने एक लंबी सांस ली और किचन की तरफ कदम बढ़ाए। उसे अब शालिनी के साथ उस नई जिंदगी का सामना करना था, जो अब केवल एक 'कॉन्ट्रैक्ट' थी। उसने अपना मुखौटा फिर से पहन लिया। चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान लाई।
"चाय बन गई?" उसने सामान्य स्वर में पूछा।
शालिनी ने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में कोई जज्बात नहीं थे। "हाँ, आ जाओ।"
यही था उसका नया सच। यही था उसके 'ख्वाब' का अंत। राघवन ने कप हाथ में लिया और घूंट भरा। चाय फीकी थी। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह अब सब कुछ सहने के लिए तैयार था।
एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर का अंत हो चुका था। लेकिन अब जो शुरू हुआ था, वह उस अंत से भी ज्यादा भयानक था। यह था—'खामोश मौत'। हर दिन मरना, हर पल घुटकर जीना, और दुनिया के सामने मुस्कुराते रहना।
यही आधुनिक जिंदगी थी। यही इंसान की नियति थी।
उसने खिड़की बंद कर दी। अब उसे बाहर की दुनिया से कोई मतलब नहीं था। उसकी दुनिया अब सिर्फ इन चार दीवारों तक सीमित थी, और उन दीवारों के भीतर वह अब हमेशा के लिए कैद हो चुका था।




क्रमशः