वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी
फैक्ट्री से लौटते हुए अज़हर की मां ने फोन पर कहा-"ग़फूर की बेटी की शादी में चले जाना। उससे कहना अपनी बेटी को मेरी तरफ से बहुत ज़्यादा प्यार दे। रुपए कम पड़ जाए तो मुझसे कह दे और भिजवा दूंगी।"
"ओके मॉम डॉन्ट वरी"अजहर ने कहा।
मॉम फिर बोली-"अच्छा सुनो, मैंने तुम्हारे लिए एक लड़की पसंद की है। तुम्हारी आंटी तो उससे मिलकर भी आई हैं। कह रही थी, मासूमियत की मिसाल है। ।" मैंने तो अभी इसकी तस्वीर देखी और इतनी पसंद आई। तुम भी इस लड़की को देखोगे तो फिदा हो जाओगे। - तुम्हारे लौटने के बाद उसके घर चलेंगे।
"मॉम सच कहूं मुझे शादी की इतनी जल्दी नहीं है! आपको क्यों जल्दी पड़ गई है।"
"यह लड़की तुम्हें भी पसंद आएगी। मैं वहां से रिश्ता डन करके ही उठूंगी, पर अब तुमने शादी करने में देर की तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
"ओके, ओके, ओके।"मैं ग़फूर के घर के करीब हूं, मुझे लोकेशन भेज दें। आई विल सी यू बाय।"
"कहां फंसा दिया यार, शादी, शादी, शादी। अज़हर ने मन- ही- मन कहा।"
उधर लड़की की मां को फिक्र सता रही थी-"उनकी बेटी को देखने के लिए लड़के वाले आ रहे हैं और वह ब्यूटी पार्लर गई हुई है। उन्होंने उसके अब्बू से कहा-"समझ में नहीं आता, आजकल यह ब्यूटी पार्लर जाने का क्या रिवाज निकल आया है, आप भी न, रोकते ही नहीं है, रिज़वाना को।"
अब्बू बोले,"बच्ची का शौक था। थोड़ा सजना- संवरना चाहती है। आ जाएगी। बाप के घर में है, जब तक बच्ची अपने अरमान पूरे कर ले।"
मां बोली-"अब फोन भी नहीं उठा रही है।"
अज़हर गफूर के घर पहुंचा। ग़फूर उसकी फैक्ट्री में
काम करता है।
"साहब आप आ गए।" कहकर ग़फूर हाथ मिलाने को बढ़ा।
अजहर हंसते हुए बोला, "हाथ मिलाने का मौका नहीं है- गले मिलो। कैसी चल रही है तैयारियां?"
"ग़रीब आदमी की क्या तैयारीयां? बेटी है, बस रुख़सत हो जाए।" गफूर ने गमगीन लहजे में कहा।
"अरे, हो जाएगी। फिक्र क्यों करते हो-यह लो, कम पड़े तो ख़बर भिजवा देना।" पास खड़ी गफूर की बीवी ने रुपए हाथ में लेते हुए कहा,"बहुत-बहुत शुक्रिया जी। आप आ गए, हमारे लिए यही ख़ुशी है।"
इतने में घर के भीतर से घबराई हुई एक लड़की दौड़ती हुई आई- "चाचा... रुख़साना आपा कमरे में नहीं है।"
ग़फूर का चेहरा उड़ गया। "क्या मतलब?"
ताई अम्मा उसे उबटन लगा रही थी। उसने कहा, "मैं पार्लर होकर आती हूं। पीछे वाले दरवाज़े से निकली थी। अभी तक नहीं लौटी।"
उसी समय किसी ने आकर ख़बर दी-"बारात मोहल्ले में पहुंच गई है।"
गफूर के हाथ-पांव फूल गए। "या अल्लाह..."
अज़हर ने तुरंत स्थिति संभाली। "कौन सा पार्लर?"
लड़की ने नाम बताया।
"आप बारात संभालिए। मैं लेकर आता हूं।
पार्लर में काफी भीड़ थी। अज़हर ने रिसेप्शन पर जाकर कहा,"रुख़साना को बुला दीजिए। उसके घर से आया हूं। बारात पहुंच चुकी है।"
रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने भीतर झांक कर आवाज़ लगाई-"रुखसाना को लेने आए हैं, तैयार हो गई क्या?"
अंदर ब्यूटीशियन समझी, दूसरी लड़की रिज़वाना को लेने आए हैं-"हां, भेजते हैं!"
कुछ क्षण बाद एक खूबसूरत लड़की बाहर आई। हल्के गुलाबी सूट में, सलीके से किया गया मेकअप, और चेहरे पर शर्म।
अज़हर ने समझा यही रुख़साना है।
लड़की ने दुपट्टा संभाला। उसे लगा, "मुझे देखने के लिए लड़के वाले आ गए होंगे, इसलिए अब्बू ने किसी परिचित को भेज दिया है।"
वह कार में बैठ गई।
रास्ते भर दोनों ने बहुत कम बातें की। "देर तो नहीं हो गई?" अज़हर ने पूछा।
"थोड़ी,"लड़की ने मुस्कुराकर कहा।
अजहर वापस पहुंचा तो ग़फूर बोला-"बारातियों को क्या मुंह दिखाऊंगा? मेरी बेटी भाग गई। गफूर का आज जनाज़ा उठेगा, बेटी की डोली नहीं।"
अज़हर धीरे से बोला- "अरे चाचा, रोने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं उसे ले आया।"
"कहां थी यह? जान से मार दूंगा।" गफूर गुस्से में बोला।
अज़हर ने गफूर से कहा-"चाचा, आहिस्ता-आहिस्ता। सारे बाराती सुन लेंगे, ज़्यादा सख़्ती से बात करने की ज़रूरत नहीं है। गाड़ी में बैठी हुई है। जो हो गया वह हो गया।
शाम को विदा करेंगे तुम्हारी लड़की को।"
कार में बैठी लड़की को ग़फूर आंखें फाड़-फाड़ कर देख रहा था।
अजहर ने कहा,"क्या हो गया ग़फूर- अपनी बेटी को देखकर सकते में क्यों हो गया?"
गफूर बोला-"साब समझ नहीं रहे हैं-यह मेरी बेटी नहीं है। कोई मज़ाक कर रहे हैं?"
अजहर बोला-"आंखें खोल कर देख -तेरी बेटी नहीं है-पहचान!"
तभी सड़क से आती उसकी बेटी ने पुकारा- "अब्बा।"
गफूर चिल्लाया-"कहां चली गई थी, तू?"
बेटी बोली-"मैं तो पार्लर गई थी, पीछे के दरवाज़े से। ताईं अम्मा ने मेरे चेहरे पर इतना उबटन लगा दिया था। सारे मेहमानों के बीच से तो नहीं जा सकती थी। उस पार्लर पर बहुत भीड़ थी तो मैं दूसरे में चली गई थी। फोन की बैटरी भी ख़त्म हो गई थी।"
ग़फूर ने राहत की सांस ली।
अजहर ने कार में बैठी हुई लड़की से कहा-"मैं बेहद शर्मिंदा हूं।" मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपको कोई और समझ लिया।"
लड़की ने पहली बार उसे गौर से देखा। "और मैं भी आपको वही समझी, जो आप थे नहीं।" उसके स्वर में शिकायत से अधिक ग़लतफहमी थी।
उधर ग़फूर की बीवी उसे अज़हर के साथ समझ बैठी।
"बेटी, कार में क्यों बैठी हो? अंदर चलो।"
लड़की झिझकी।
अजहर ने धीमे स्वर में कहा, "अगर आप अभी वापस चली गई तो लोग सवाल पूछेंगे। किसी ने सुन लिया कि दुल्हन गायब थी तो बेकार का हंगामा हो जाएगा। इस ग़रीब आदमी की इज़्ज़त का सवाल है।
लड़की ने ग़फूर के चेहरे की ओर देखा। उसमें अभी तक डर पूरी तरह उतरा नहीं था।
वह चुपचाप पंडाल में चली गई। सब यही समझते रहे कि वह अज़हर साहब के साथ आई है- उनकी मंगेतर होगी। डीजे बजा तो कुछ लड़के डांस करने के लिए अज़हर को पकड़ लाए- "साहब, अकेले नहीं, भाभी को भी लाइए।"
दोनों ने बहुत मना किया, लेकिन कोई नहीं माना। वे डांस करने गए तो एक-दूसरे के लिए मुकम्मल अजनबी थे लेकिन जब बाहर आए तो लगा उस अजनबीपन में एक अजीब सी जान-पहचान थी, जैसे बरसों या शायद सदियों के बाद आज वह दोनों मिले हो...।
निकाह शुरू हुआ। धीरे- धीरे घर का तनाव कम होने लगा। अज़हर ने लड़की से कहा-"आपने मेरी नहीं इस परिवार की इज़्ज़त बचाई है। आपका नाम तो जान सकता हूं?"
"रिज़वाना।"
"मेरा नाम नहीं पूछेंगी..न जाने किस मोड़ पर फिर मुलाक़ात हो।
"बता दीजिए...! लड़की ने शर्माते हुए कहा।
"अज़हर।"
"मैं आपके घर छोड़ देता हूं।"
"शुक्रिया, मैं चली जाऊंगी।
घर पहुंचा तो मां तैयार बैठी थी।"चलो, लड़की वालों के यहां जाना है।"
अजहर रिज़वाना से प्यार करने लगा था और शायद वह भी। उसने टालने की नियत से कहा, "माॅम, आज बहुत थक गया हूं।"
"कोई बहाना नहीं।"
मां का दिल रखने के लिए उसे जाना पड़ा।
अनमने मन से वह बातचीत कर रहा था कि चाय की ट्रे लेकर रिज़वाना कमरे में दाख़िल हुई।
दोनों एक साथ ठिठक गए।
कमरे में कुछ पल का मौन छा गया।
रिज़वाना की मां ने पूछा-"लगता है, आप लोग पहले से एक दूसरे को जानते हैं?"
अज़हर कुछ बोलता, उससे पहले रिज़वाना ने धीमे से कहा-"जी... एक छोटी सी ग़लतफहमी की वजह से।"
अब सब की निगाहे उन्ही पर थीं। अज़हर ने मुस्कुराते हुए पूरी घटना सुना दी। बात ख़त्म होते-होते कमरे में हंसी गूंज उठी।
अज़हर की मॉम ने स्नेह से रिज़वाना से पूछा-"बेटी, तुम्हें अज़हर पसंद आया?"
रिज़वाना ने सिर झुका लिया। उसके गालों पर हल्की- सी लाली उतर आई। अज़हर की नजरे एक पल को उस पर ठहर गई। दोनों की आंखों में अब कोई ग़लतफहमी नहीं थी, केवल एक शांत सा अपनापन था।
मॉम ने रिज़वाना को गले लगा लिया और अपने गले से हार उतार कर उसके गले में डाल दिया। मुबारकबाद देने का सिलसिला शुरू हो गया जो मंगनी और शादी तक चलता रहा।
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