Raaj ke saat phere in Hindi Thriller by jaisy singh books and stories PDF | राज़ के सात फेरे - 5

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राज़ के सात फेरे - 5

राठौर मेंशन की भव्य सीढ़ियाँ चढ़ते हुए चंचल मुस्कुराती हुई अन्विका को ऊपर ले जा रही थी।
पूरे कॉरिडोर में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। दीवारों पर लगी महंगी पेंटिंग्स, सुनहरे फ्रेम वाले बड़े-बड़े आईने और छत से लटकते क्रिस्टल के झूमर पूरे माहौल को किसी शाही महल जैसा बना रहे थे।
अन्विका चलते-चलते हर चीज़ को बहुत ध्यान से देख रही थी।
उसकी निगाहें किसी नई दुल्हन की तरह घर की खूबसूरती नहीं निहार रही थीं, बल्कि किसी ऐसे इंसान की थीं जो अपने दुश्मन के किले का एक-एक कोना याद कर लेना चाहता हो।
कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद चंचल एक बड़े से दरवाज़े के सामने जाकर रुक गई।
दरवाज़ा भी सामान्य नहीं था।
काले रंग की मजबूत सागौन की लकड़ी से बना वह विशाल दरवाज़ा, जिस पर चाँदी की नक्काशी की गई थी, दूर से ही अलग दिखाई दे रहा था।
चंचल ने मुस्कुराकर दरवाज़े का हैंडल घुमाया।
खट...
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
जैसे ही अन्विका की नज़र कमरे के अंदर गई...
वह कुछ क्षणों के लिए बिल्कुल शांत रह गई।
उसने जितने भी कमरे आज तक देखे थे...
उनमें ऐसा कमरा उसने कभी नहीं देखा था।
पूरा कमरा...
सिर्फ और सिर्फ काले रंग में डूबा हुआ था।
दीवारें मैट ब्लैक रंग की थीं।
छत भी गहरे काले रंग की थी, जिसमें हल्की-हल्की एलईडी स्ट्रिप्स लगी हुई थीं। उनकी धुंधली सफेद रोशनी कमरे को रहस्यमयी बना रही थी।
कमरे के बीचों-बीच एक विशाल किंग-साइज़ बेड रखा था।
बेड का हेडबोर्ड काले चमड़े का था।
उस पर बिछी बेडशीट, तकिए, कुशन...
सब कुछ काले रंग का था।
यहाँ तक कि कमरे के परदे भी गहरे काले मखमली कपड़े के थे, जिनसे बाहर की एक किरण भी अंदर नहीं आ सकती थी।
कमरे के एक कोने में काले शीशे की बड़ी-सी स्टडी टेबल रखी थी।
उस पर एक महँगा लैपटॉप, कुछ फाइलें और बिल्कुल करीने से रखी हुई घड़ी दिखाई दे रही थी।
दूसरी तरफ आधुनिक डिजाइन का ब्लैक लेदर सोफा रखा था।
दीवार पर लगा विशाल एलईडी टीवी भी काले फ्रेम वाला था।
कमरे में रखी हर चीज़...
अलमारी...
बुकशेल्फ...
लैंप...
कालीन...
यहाँ तक कि फूलदान तक...
सब कुछ काले रंग का था।
ऐसा लग रहा था मानो इस कमरे में किसी ने रंगों के अस्तित्व को ही खत्म कर दिया हो।
कमरे में हल्की-सी लकड़ी और महंगे परफ्यूम की मिली-जुली खुशबू फैली हुई थी।
अन्विका ने पूरे कमरे पर एक लंबी नज़र डाली।
उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।
वह मन ही मन बोली—
"कमरा नहीं... इसके मालिक के दिमाग का आईना है।"
"हर तरफ अंधेरा..."
"हर तरफ सन्नाटा..."
"जैसे इस इंसान की ज़िंदगी में कभी कोई रंग था ही नहीं।"
उसी समय चंचल हँसते हुए बोली—
"कैसा लगा कमरा?"
अन्विका ने तुरंत अपने चेहरे के भाव सामान्य कर लिए।
"बहुत... अलग है।"
चंचल खिलखिलाकर हँस पड़ी।
"अलग नहीं... अजीब कहो।"
"पूरा घर चाहे जितना रंग-बिरंगा हो..."
"लेकिन हमारे छोटे साहब का कमरा हमेशा ऐसा ही रहेगा।"
"कई बार मैंने कहा भी कि थोड़ा रंग बदलवा दो..."
"लेकिन इन्होंने किसी की एक नहीं सुनी।"
अन्विका ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।
"हर इंसान की अपनी पसंद होती है।"
चंचल ने भी हामी भरी।
"हाँ... और इनके मूड की तरह इनका कमरा भी हमेशा ब्लैक रहता है।"
दोनों हल्का-सा मुस्कुरा दीं।
उधर...
रुद्रांश सीधे अपने पिता के कमरे की तरफ बढ़ रहा था।
पूरा कॉरिडोर पार करके वह सबसे आखिर में बने विशाल कमरे के सामने पहुँचा।
दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।
जैसे ही उसने अंदर झाँका...
उसकी आँखें एक पल के लिए सिकुड़ गईं।
कमरे के अंदर यशवर्धन राठौर पहले से मौजूद थे।
उनके साथ उनकी बहन सरला सिंह और जीजा महेंद्र सिंह भी बैठे हुए थे।
तीनों के गंभीर चेहरे देखकर ही रुद्रांश समझ गया...
मामला सामान्य नहीं है।
वह बिना कुछ कहे अंदर चला गया।
यशवर्धन ने उसकी तरफ देखा।
उनकी आवाज़ हमेशा की तरह गंभीर थी।
"रुद्रांश..."
"दरवाज़ा बंद कर दो।"
रुद्रांश ने बिना कोई सवाल किए पीछे मुड़कर दरवाज़ा बंद कर दिया।
फिर आराम से जाकर सामने पड़े सोफे पर बैठ गया।
कमरे में कुछ क्षणों तक खामोशी बनी रही।
आखिरकार...
यशवर्धन ने गहरी साँस ली।
उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
"देखो रुद्रांश..."
"आज मैं तुमसे राजनीति की नहीं..."
"अपने भविष्य की बात करने चाहता हूँ।"
रुद्रांश शांत बैठा रहा।
यशवर्धन आगे बोले—
"सिर्फ छह महीने बाद चुनाव हैं।"
"इस बार मुझे किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री की कुर्सी चाहिए।"
उन्होंने कुछ पल रुककर उसकी आँखों में देखा।
"लेकिन..."
"तुम्हारी हरकतों की वजह से मुझे नहीं लगता कि ये इतना आसान होगा।"
रुद्रांश ने भौंहें सिकोड़ लीं।
"मैं कुछ समझा नहीं डैड।"
"मैंने ऐसा क्या कर दिया?"
यशवर्धन कुछ बोलते उससे पहले...
महेंद्र सिंह ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला।
उन्होंने फोन रुद्रांश की तरफ बढ़ा दिया।
"पहले ये देखो।"
रुद्रांश ने बिना कुछ कहे मोबाइल हाथ में लिया।
स्क्रीन पर एक वीडियो चल रही थी।
वीडियो किसी हाई-प्रोफाइल नाइट क्लब की थी।
तेज़ म्यूजिक...
शराब...
डांस...
और बीच में...
रुद्रांश।
वह नशे में धुत एक सोफे पर बैठा हुआ था।
एक लड़की उसकी गोद में बैठकर उसे शराब पिला रही थी।
दो दूसरी लड़कियाँ उसके दोनों तरफ बैठी उसके गले में बाँहें डाले हँस रही थीं।
आसपास मौजूद लोग मोबाइल से वीडियो बना रहे थे।
पूरा वीडियो देखकर भी...
रुद्रांश के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।
उसने बिना कुछ कहे मोबाइल लॉक किया।
फिर वापस महेंद्र सिंह को लौटा दिया।
कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।
यशवर्धन धीमे स्वर में बोले—
"यही तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या है।"
"तुम्हें अपनी छवि सुधारनी होगी।"
"आज पूरी जनता तुम्हें शराबी..."
"आवारा..."
"और लड़कियों के पीछे घूमने वाला लड़का समझती है।"
"ऐसी छवि के साथ मैं चुनाव कैसे जीतूँगा?"
उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"देखो बेटा..."
"तुम्हें जो करना है..."
"इस घर की चारदीवारी के अंदर करो।"
"शराब पीनी है..."
"घर में पियो।"
"अलग से बार बनवाना है..."
"बनवा लो।"
"मुझे कोई आपत्ति नहीं।"
"लेकिन बाहर जाकर रोज़ नए-नए विवाद खड़े मत करो।"
यशवर्धन की आवाज़ और गंभीर हो गई।
"बहुत मुश्किल से मैंने तुम्हारी शादी मल्होत्रा परिवार की बेटी से करवाई है।"
"ताकि तुम्हारी छवि सुधरे..."
"और चुनाव के लिए आर्थिक सहयोग भी मिल सके।"
"ध्यान रखना..."
"अन्विका हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।"
"उसकी वजह से आधी लड़ाई हम पहले ही जीत चुके हैं।"
"इसलिए..."
"उस लड़की को इस घर में ज़रा-सी भी तकलीफ नहीं होनी चाहिए।"
उन्होंने आखिरी शब्दों पर विशेष ज़ोर दिया।
"उम्मीद है तुम मेरी बात समझ गए हो।"
रुद्रांश अब भी चुप बैठा था।
उसके चेहरे से यह समझ पाना मुश्किल था कि वह अपने पिता की बात मान रहा है...
या बिल्कुल नहीं।
कुछ क्षणों तक कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा रहा।
यशवर्धन की बातें खत्म हो चुकी थीं, लेकिन रुद्रांश अब भी शांत बैठा था। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। ऐसा लग रहा था मानो वह हर शब्द को सुन तो रहा है, पर उन्हें दिल से स्वीकार करने का उसका कोई इरादा नहीं है।
अचानक उसने लंबी साँस ली और बिल्कुल बेफिक्र अंदाज़ में सोफे की बैक से टिक गया।
फिर उसने दोनों पैर सामने रखी सेंटर टेबल पर रख दिए।
उसकी इस हरकत से कमरे का माहौल और भी भारी हो गया।
वह सीधे अपने पिता की आँखों में देखते हुए बोला,
"मुझे यकीन नहीं हो रहा, डैड..."
"आप इतनी-सी बात के लिए इतने परेशान हैं।"
उसके होंठों पर हल्की-सी व्यंग्य भरी मुस्कान आ गई।
"लड़कियाँ खुद चलकर मेरे पास आती हैं... मैं किसी को बुलाने नहीं जाता।"
"मैं किसी के साथ जबरदस्ती नहीं करता..."
"और रही बात क्लब जाने, पार्टी करने या शराब पीने की..."
"तो मैं ये सब अपने पैसों से करता हूँ।"
"किसी के बाप के पैसे नहीं उड़ाता।"
रुद्रांश के शब्द खत्म होते ही यशवर्धन का धैर्य जवाब दे गया।
वह गुस्से में सोफे से उठ खड़े हुए।
"रुद्रांश!"
उनकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।
"होश में रहकर बात कर!"
"अपने बाप से बात कर रहा है तू!"
रुद्रांश भी तुरंत खड़ा हो गया।
उसकी आँखों में भी अब वही आग उतर आई थी।
लेकिन उसकी आवाज़ अब भी हैरान कर देने वाली शांति लिए हुए थी।
"याद है कि आप मेरे बाप हैं..."
"इसीलिए अब तक तमीज़ से बात कर रहा हूँ।"
"अगर ये बात भूल गया होता..."
"तो आज आप इस तरह मेरे सामने खड़े भी नहीं होते।"
उसकी आँखें बिल्कुल स्थिर थीं।
"मेरे लिए इतना ही काफी है कि मैं लोगों के सामने आपकी बेइज्जती नहीं करता।"
"वरना..."
"जो इंसान सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए अपने बेटे का इस्तेमाल करे..."
"वो बाप कहलाने का हक नहीं रखता।"
कमरे का माहौल पलभर में विस्फोटक हो गया।
यशवर्धन के चेहरे की नसें तन गईं।
महेंद्र सिंह भी असहज होकर दोनों को देखने लगे।
उन्हें डर था कि अगर अभी किसी ने बीच-बचाव नहीं किया, तो बात हाथापाई तक पहुँच सकती है।
तभी सरला सिंह तेजी से दोनों के बीच आ गईं।
उन्होंने पहले अपने भाई की तरफ देखा, फिर रुद्रांश की ओर मुड़ीं।
"रुद्र..."
"ऐसी कोई बात नहीं है।"
"तेरे पापा ने तेरा इस्तेमाल नहीं किया।"
"भला कोई पिता अपने बेटे का इस्तेमाल करता है क्या?"
उन्होंने प्यार से उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
"और शादी के लिए हाँ भी तो तूने खुद ही कही थी।"
"किसी ने तेरे साथ जबरदस्ती नहीं की।"
"फिर अब ये सब क्यों?"
रुद्रांश ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ सेकंड तक वह अपनी साँसों को नियंत्रित करता रहा।
फिर धीरे-धीरे उसने आँखें खोलीं।
"बुआ..."
"सच आप भी जानती हैं..."
"और मैं भी।"
उसने यशवर्धन की तरफ देखते हुए कहा,
"ये इंसान बिना मतलब किसी को एक गिलास पानी तक नहीं पिलाता।"
"इनके लिए हर रिश्ता..."
"हर इंसान..."
"बस राजनीति का एक मोहरा है।"
उसने हल्की-सी हँसी हँसी।
"प्रणव भैया को ही देख लीजिए।"
"उन्होंने उन्हें बेटा कम..."
"अपना सबसे आज्ञाकारी नौकर ज्यादा बना दिया है।"
"ये कहते हैं उठो..."
"तो वो उठ जाते हैं।"
"ये कहते हैं बैठो..."
"तो वो बैठ जाते हैं।"
"लेकिन..."
उसकी आवाज़ कठोर हो गई।
"ये रुद्रांश राठौर किसी का गुलाम नहीं है।"
"मैं अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीता हूँ..."
"और आगे भी वैसे ही जीऊँगा।"
"अगर आपको लगता है कि मैं आपकी राजनीतिक विरासत सँभालूँगा..."
"तो ये सपना आज ही छोड़ दीजिए।"
"मैं कभी इस कीचड़ में कदम नहीं रखूँगा।"
यशवर्धन का धैर्य पूरी तरह टूट चुका था।
उन्होंने गुस्से से कहा,
"अच्छा!"
"तो फिर क्या करेगा तू?"
"बस मेरी कमाई पर ऐश करेगा?"
"और मुझे स्वार्थी कहता है?"
"कभी अपनी मेहनत से एक रुपया कमाया है?"
"जिस दिन खुद कमाकर दिखाएगा..."
"उस दिन मुझे सीख देना!"
यह सुनते ही कमरे में फिर तनाव फैल गया।
सरला सिंह ने तुरंत यशवर्धन का हाथ पकड़ लिया।
"भैया..."
"आप शांत हो जाइए।"
"मैं बात कर रही हूँ ना।"
लेकिन इस बार रुद्रांश ने खुद ही बात खत्म कर दी।
उसने गहरी साँस ली और सपाट आवाज़ में बोला,
"मुझे अब किसी से कोई बात नहीं करनी।"
इतना कहकर वह पलटा।
दरवाज़ा खोला।
और बिना पीछे देखे कमरे से बाहर निकल गया।
दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई।
इधर...
चंचल अन्विका को कमरे में छोड़ चुकी थी।
जाते-जाते उसने मुस्कुराकर कहा,
"अन्विका, तुम फ्रेश होकर कपड़े बदल लो।"
"मैं खाना यहीं भिजवा देती हूँ।"
"आराम से खाना खाकर थोड़ा सो जाना।"
"शाम को रिसेप्शन है।"
"तुम्हें तैयार करने के लिए शहर की सबसे बड़ी मेकअप आर्टिस्ट आने वाली है।"
अन्विका ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।
"ठीक है दी।"
"धन्यवाद।"
चंचल मुस्कुराती हुई बाहर चली गई।
दरवाज़ा बंद होते ही कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
अन्विका ने एक बार पूरे कमरे पर नज़र दौड़ाई।
फिर धीरे-धीरे अपनी भारी ज्वेलरी उतारने लगी।
एक-एक करके उसने हार, झुमके, चूड़ियाँ और बाकी सारे गहने ड्रेसिंग टेबल पर रख दिए।
फिर उसने अपना ट्रॉली बैग खोला।
उसमें से एक सफेद टी-शर्ट और सी-ग्रीन रंग का लोअर निकाला।
कुछ कपड़े लेकर वह बाथरूम की ओर बढ़ गई।
करीब आधे घंटे बाद...
बाथरूम का दरवाज़ा खुला।
अन्विका बाहर आई।
अब उसने शादी का भारी लहंगा उतार दिया था।
उसके शरीर पर सफेद ढीली टी-शर्ट और हल्के समुद्री हरे रंग का लोअर था।
लंबे बाल पूरी तरह भीगे हुए थे।
वह तौलिए से बाल सुखाते हुए धीरे-धीरे कमरे के अंदर आई।
तभी उसकी नज़र सामने रखी मेज़ पर पड़ी।
वहाँ गरमागरम खाना सजा हुआ था।
शायद चंचल अपने वादे के मुताबिक खाना भिजवा चुकी थी।
कल से कुछ भी ढंग से न खाने के कारण उसे तेज़ भूख लगी थी।
वह सोफे पर बैठ गई और आराम से खाना खाने लगी।
खाना खत्म करने के बाद उसने संतुष्टि से लंबी साँस ली।
फिर आलस भरी अंगड़ाई लेते हुए मुस्कुराकर खुद से बोली,
"चल अन्विका..."
"थोड़ा आराम कर लेते हैं।"
"आख़िर शाम को बहुत काम भी तो है।"
उसने एक बार दरवाज़े की तरफ देखा।
फिर उसके होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान आ गई।
वह उठी...
दरवाज़े तक गई...
और अंदर से लॉक लगा दिया।
टक...
कुंडी लगते ही उसने संतोष की साँस ली।
"नाउ..."
"It's perfect."
फिर हँसते हुए बोली,
"गुड नाइट, अन्विका।"
इतना कहकर वह सीधे बिस्तर पर लेट गई।
पूरी रात जागने, शादी की रस्मों और लगातार मानसिक तनाव के कारण उसकी आँखें कुछ ही पलों में बंद हो गईं।
कुछ ही मिनटों में वह गहरी नींद में सो चुकी थी।
उधर...
गुस्से से भरा रुद्रांश अपने कमरे के सामने पहुँचा।
उसने हमेशा की तरह दरवाज़े का हैंडल घुमाया।
लेकिन...
दरवाज़ा नहीं खुला।
उसने दोबारा कोशिश की।
फिर भी नहीं।
उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
"लॉक...?"
अगले ही पल उसका गुस्सा भड़क उठा।
उसने ज़ोर से दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया।
धड़ाम! धड़ाम!
"भाभी!"
"भाभी!"
उसकी ऊँची आवाज़ पूरे कॉरिडोर में गूँज गई।
नीचे से चंचल लगभग दौड़ती हुई ऊपर आई।
सीढ़ियाँ चढ़ने के कारण उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।
वह हाँफते हुए बोली,
"क्या हुआ भैया?"
"इतना क्यों चिल्ला रहे हैं?"
रुद्रांश ने गुस्से से दरवाज़े की तरफ इशारा किया।
"मेरे कमरे में कौन है?"
"किसकी इतनी हिम्मत हुई..."
"जिसने मुझे ही मेरे कमरे के बाहर खड़ा कर दिया?"
चंचल पहले तो कुछ पल उसे देखती रही।
फिर उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
"और किसकी हिम्मत होगी?"
"आपकी बीवी की।"
"लगता है दरवाज़ा बंद करके आराम से सो गई है।"
फिर शरारत से बोली,
"अभी के लिए आप शेखर के कमरे में चले जाइए।"
यह सुनते ही रुद्रांश के चेहरे का गुस्सा और बढ़ गया।
उसने एक बार फिर पूरी ताकत से दरवाज़े पर मुक्का मारा।
धड़ाम!
लेकिन अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।
उसने दाँत भींचे।
कुछ पल तक वहीं खड़ा रहा।
फिर बिना कुछ बोले पलटा और तेज़ कदमों से सीढ़ियाँ उतर गया।
दूसरी तरफ...
शेखर अपने कमरे में आराम से बिस्तर पर लेटा मोबाइल चला रहा था।
कमरे का दरवाज़ा बंद था, लेकिन लॉक नहीं था।
अचानक...
धड़ाम!
दरवाज़ा इतनी ज़ोर से खुला कि वह घबराकर उछल पड़ा।
उसने सिर उठाकर देखा...
सामने गुस्से से लाल चेहरा लिए रुद्रांश खड़ा था।
शेखर कुछ पूछ पाता...
उससे पहले ही रुद्रांश तेज़ कदमों से बाथरूम की तरफ गया।
उसने बाथरूम का दरवाज़ा खोला...
और पूरी ताकत से बंद कर दिया।
धड़ाम!
आवाज़ इतनी तेज़ थी कि शेखर ने डरकर अपनी आँखें बंद कर लीं।
कुछ सेकंड बाद उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
फिर अपने कमरे की ओर देखकर बेचारगी से बुदबुदाया,
"लगता है..."
"आज मेरा ये आशियाना उजड़ने वाला है।"
उसने लंबी साँस ली और छत की तरफ देखने लगा।
उधर...
रुद्रांश के कमरे के बाहर खड़ी सरला सिंह ने धीरे से यशवर्धन की ओर देखा और शांत स्वर में बोली,
"भैया..."
"आप चिंता मत कीजिए।"
"मुझे पता है..."
"रुद्रांश से कौन बात मनवा सकता है..."
उनके चेहरे पर हल्की-सी रहस्यमयी मुस्कान थी, मानो उनके मन में पहले से ही कोई योजना तैयार हो।


🌙 Chapter ending lines:
आख़िर कौन है वो शख्स... जो रुद्रांश जैसे ज़िद्दी इंसान को भी अपनी बात मानने पर मजबूर कर सकता है?
क्या सरला सिंह किसी नए खेल की शुरुआत करने वाली हैं?
और क्या रुद्रांश अपनी मर्जी से झुकेगा... या हालात उसे झुकने पर मजबूर कर देंगे?
जानने के लिए पढ़ते रहिए...

To be continued.....

❤️ Dear Lovely Readers ❤️

अगर आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर दीजिए। आपके कमेंट्स, रिव्यू और सुझाव मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं, क्योंकि वही मुझे हर नए अध्याय को पहले से बेहतर लिखने की प्रेरणा देते हैं।
अब कहानी धीरे-धीरे अपने सबसे बड़े मोड़ की तरफ बढ़ रही है। आने वाले अध्यायों में कई ऐसे रहस्य सामने आएँगे, जो अब तक सिर्फ परछाइयों में छिपे हुए थे।
तो बने रहिए इस सफर का हिस्सा... क्योंकि असली खेल अभी शुरू होना बाकी है।
Happy Reading! ❤️