Paths - 22 in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 22

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राहें - 22

अपनी अपनी सोच

तेजू को आता देखकर सेठ धरमचंद बोले - आज तुम फिर लेट
हो गये। बहुत ग्राहक बैठे हैं तुम्हारे इन्तजार में ।
तेजू बोला क्या करू? सेट मकान मालकिन हेमा बहुत
बीमार है ,उसकी देखभाल कर ,दवा देकर व उसे खाना बनाकर
खिलाकर आता हूँ, इसलिये देर हो जाती है।
सेठ बोले - उस दाई के कोई बेटी या बेटा नहीं, जो तुम उसकी
सेवा करते हो?
तेजू बोला- है मालिक, हेमा दाई के एक बेटी है जो दूसरे गॉव
में रहती हैं, मैं उसे दो बार खबर भेज चुका हूँ। परन्तु वह नहीं आती
हेमा दाई कराहती है, रोती है तो देखा नहीं जाता, दाई के पति का
एक लड़का भी है, मैने उससे भी कई बार कहा कि वह बीमार है
उसकी देखभाल करने वाला कोई नही है तो वह लड़का भी कुछ
ध्यान नही देता- इसलिये मुझे ही उसकी देखभाल करनी पड़ रही
है।
ठीक है- कहकर सेठ चुप रहे, सेठ को भी मालूम है कि हेमा
एक बेटी की माँ है। बेटी की शादी के बाद से हेमा अकेली हो गई,
बेटी कभी कभी आती थी और कभी कभी बेटी अपनी मां को अपने यहाँ रख लेती
थी। हेमा को बेटी के घर रहना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि दामाद
का व्यवहार उसके प्रति ठीक ना होने के कारण वह जल्दी ही बेटी
के घर से अपने घर आ जाती थी।
इधर हेमा का बनाया हुआ विजातीय पति ईश्वर भी अपने बेटा
बहू के व्यवहार से परेशान था। आये दिन बहू झगड़ा करती और
खाना भी नहीं देती थी। खाने पीने से दुखी ईश्वर हेमा के घर आकर
घंटो बैठा रहता, हेमा खाना बनाती और शिष्टाचार वश उससे खाने
के लिये कहती तो ईश्वर उसके घर खाना खाकर चैन से रहता और


वहीं आराम भी कर लेता। दोनो एक दूसरे का दुख -सुख बॉटते
बॉटते धीरे धीरे नजदीक आते गये और एक दूसरे का सहारा बनते
गये । बिना कोई औपचारिकता निभाये साथ-साथ रहते-रहते लोगों
की नजर में वे प्रेमी युगल हो गये। बूढ़ापा, स्वार्थ और परिस्थितियाँ
उन्हें नजदीक लाती रहीं। परन्तु समाज ऐसे सम्बन्धों को मान्यता
नहीं देता। इसलिये ईश्वर के पुत्र ने अपने पिता व हेमा की बेटी ने
अपनी माता से दूरी बना ली थी। दोनों ने ईश्वर व हेमा के घर अना
जाना बंद कर दिया था। समाज ने भी ईश्वर व हेमा का सामाजिक
बहिष्कार कर दिया था।
ये सब होने के बाद भी हेमा और ईश्वर अपना जीवन जी रहे
थे। ईश्वर बीमार पड़ा तो हेमा ने उसकी देखभाल व सेवा की परन्तु
ईश्वर को बचा नहीं सकी और ईश्वर इस दुनियां से चल बसा। जो
इस दुनियाँ में आया है, उसे एक दिन इस दुनियॉँ से जाना भी है, इस
सत्य को स्वीकार करके हेमा ने ही उसका दाह संस्कार, तिज
नहावन व तेरहवीं भोज का कार्यक्रम जैसे तैसे निपटाये।
स्वयं हेमा बीमार हैं तो उसकी देखभाल करने वाला व उसे
खाना देने वाला कोई नहीं था। तेजू से यह सब देखा नहीं जाता था
इसलिये वह हेमा को दवा देकर, खाना खिलाकर ही अपने काम पर
जाता था।
तेजू गॉव के सेठ धरमचंद की आटा चक्की व हॉलर मिल
चलाता था। आसपास के गॉँव में आटा चक्की व हॉलर मिल नहीं थी
इसलिये ग्राहक बैठे रहते। तेजू ग्यारह बजे तो कभी बारह बजे
आकर दोपहर तक मशीने चलाकर ग्राहकों का काम पूरा कर देता
था। तेजू व्यवहार कुशल अच्छा कर्मचारी है, इसलिये सेठ धरमचंद
उससे खुश रहते थे और उसको सहारा देते थे। गाँव में सेठ जी का
सम्मान हैं ,लोग उनकी बातों से प्रभावित होते हैं तथा गाँव के विभिन्न
कार्यक्रमों में उन्हें बुलाया जाता रहा है।


एक दिन सुबह सुबह तेजू सेठ के पास आया और बोला - सेठ
हेमा दाई की मृत्यु हो गई है-
सेठ बोला उसकी बेटी को खबर कर दे।
तेजू बोला - एक लड़के को बेटी के गॉव भेजा है।
सेठ बोला - बेटी के आते तक इन्तजार कर ले यदि नहीं आती
तो तू ही दाह संस्कार कर दे- क्या करेगा करना तो पड़ेगा? पैसे की
जरूरत हों तो बताना मैं व्यवस्था कर दूँगा।
तेजू बोला --कुछ पैसे दे दो सेठ, जैसी स्थिति होगी वैसा
करूगाँ।
सेठ ने उसे पॉच हजार रूपये दे दिये, तेजू रूपयों के जेब में
रखतें हुये बोला - सेठ आज तो काम में नहीं आ पाऊंगा।
सेठ बोले - मैं भी समझता हूँ, आज तू उधर की स्थिति को
सम्हाल।इधर के ग्राहकों को मै सम्हाल लेता हूं, तो तेजू चला गया।
दोपहर हो गया। हेमा की बेटी नहीं आई, उसको खबर देने जो
लड़का गया था उसने कहा वह नहीं आयेगी,वह कह रही - मॉ
विजातीय हो गई है, मैं वहाँ आऊंगी तो मेरे बच्चों की शादी मेरी
जाति वाले नहीं करेंगें.
तेजू को ऐसे ही उत्तर की उम्मीद थी। उसने हेमा के दाह
संस्कार की सब व्यवस्था पहले से ही बना रखी थी। अपने परीचितों
व मित्रों के सहयोग से उसने हेमा का दाह संस्कार किया और तीसरे
दिन सब कार्यक्रम निपटा दिये।
तीन दिन बाद वह काम पर आया, सेठ से मिला और सब बातें
बतायी - सेठ भले व्यक्ति थे उन्होनें उसकी बहुत प्रशंसा की और
कहा कि - ऐसे में तुमने अपना कर्तव्य निभाया है, लोग कुछ भी कहें,
कहने दो।
कुछ दिनों समय बीतने के बाद हेमा की बेटी अपने मॉ के घर
आई और घर पर अपना कब्जा बताने लगी तेजू से कहने लगी - तुम


घर खाली करों ,मेरी मॉ का घर है ,मैं इसे बेचूंगी।
तेजू बोला- मां बीमार थी तो तुम आयी नहीं। मॉ की मृत्यु के
बाद मैंने आदमी भेज कर तुम्हें बुलाया ,तब भी माँ विजातीय हो गई है ,कहकर
तुम नहीं आयी, यहाँ आओगी तो जात वाले तुम्हारे बच्चों की शादी
जात में नहीं होने देंगें, अब घर तुम्हारा है ,कह रही हो,अब जाति वालों
को तुम्हारे बच्चों की शादी में जाति नहीं दिखेगी ? माँ के लिये जाति 
है, घर के लिये नहीं। मैं घर खाली नहीं करूंगा, और उसने घर
खाली नहीं किया।
हेमा की बेटी ने गाँव में पंचायत बुलायी - गाँव के सयाने लोग
बैठे व सेठ धरमचंद भी उस पंचायत में बुलाये गये। सबके अपने
अपने तर्क थे। बेटी घर पर अपना अधिकार चाह रही थी, तेजू अपना
अधिकार चाह रहा था। घर और कुऑ, बाड़ी, थोड़े से बर्तन, खटियाँ,
पीढ़ा व दो-चार कुर्सी, लोहे की एक अलमारी दो-तीन स्वर्ण व रजत
के आभूषण, यही थोड़ा बहुत सामान था , हेमा का।
पंचायत में तय हुआ कि तेजू ने बुड्डी हेमा की सेवा की, महीनों
खाना बनाकर खिलाया व दाह संस्कार किया तो हेमा की विरासत
पर तेजू का ही अधिकार है, यदि उसने हेमा की मृत्यु की खबर
उसकी बेटी को ना दी होती तो वह दोषी होता । तेजू ने हेमा की मृत्यु
की खबर गॉव के लड़के द्वारा बेटी को भेजी थी, उसे बुलाया गया था 
परन्तु वह नहीं आयी। उसने अपनी माँ की देखभाल नहीं की, अंतिम
समय में भी नहीं आयी । अपने किसी भी कर्तव्य का निर्वहन नहीं
किया जबकि तेजू ने किरायेदार हो कर भी एक बेटे की तरह अपना
कर्तव्य निभाया इसलिये हेमा के घर व घर के सामान पर तेजू का
ही अधिकार है, इसतरह हेमा के घर और सामानों पर तेजू का अधिकार हो गया और अब वो तेजकरण बन गया।

छतीसगढ़ रत्न 
डॉ.शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा
Email- shiromanimathur@gmail.com 
Contact- 9893742299