Trinamool's disintegration in Hindi Magazine by Virendra Dewangan books and stories PDF | तृणमूल का यूँ बिखराव

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तृणमूल का यूँ बिखराव

4 मई 2026, विधानसभा चुनाव परिणाम का दिन। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह दिन ऐसा सदमा लेकर आया, जो उसको तिनका-तिनका करने का आधार बन गया। पार्टी बुरी तरह हार गई। उसकी फायर ब्रांड नेत्री ममता बनर्जी सहित उसके कई दिग्गज मंत्री तक का हिट विकेट हो गया।

शर्मनाक हार से उत्पन्न हताशा से पार्टी में, जो धमासान मचा, पार्टी में दो-तीन फाड़ हो गया। तृणमूल के 28 में-से 20 सांसद पार्टी से अलग होकर अपना विलय नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में कर लिया।

बागियों का नेतृत्व सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार कर रहे थे। बागियों के आवेदन पर लोकसभा अध्यक्ष ने इन्हें लोकसभा में अलग बैठने की अनुमति दे दी।

वहीं, विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में तकरीबन 60 विधायक बागी हो गए और तृणमूल के बहुतेरे विधायकों को लेकर अलग गुट बना लिए। इन्हें विधानसभा अध्यक्ष ने अलग गुट के रूप में मान्यता भी दे दी। बागी गुट के नेता को विपक्ष का नया नेता चुन लिया गया।

यही नहीं, बागी गुट ने 3 जुलाई 2026 को कोलकाता स्थित पार्टी के मेट्रोपॉलिटन भवन पर कब्जा कर लिया। विधानसभा में नेता विपक्ष और बागी गुट के प्रमुख ऋतब्रत बनर्जी ने कार्यालय में पार्टी नेताओं के साथ बैठक की और बाद में ताला जड़कर चाबी अपने साथ ले गए।

दरअसल, चुनाव आयोग के साथ दिल्ली में हुई 2 जुलाई की बैठक के बाद बागी गुट ने यह कदम उठाया। उन्होंने आयोग से मुलाकात कर संगठनात्मक बदलाओं से जुड़े सभी दस्तावेज उन्हें सौंपने की मांग की थी।

यही नहीं, तृणमूल कांग्रेस का बैंक खाता सील कर दिया गया है, जिसमें तकरीबन 400 करोड़ रुपया जमा है। विवादों के निपटारा होते तक इस राशि का उपयोग कोई नहीं कर सकेगा।

ऊपर से ममता के भतीजे और पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखनेवाले तृणमूल के महासचिव अभिषेक बनर्जी पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। इनके खिलाफ कई संस्थाएं जांच कर रही हैं। इन्हें सुप्रीमकोर्ट, हाईकोर्ट व सेशन कोर्ट के चक्कर-पे-चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

वक्त-वक्त की बात है। जो अभिषेक व ममता बनर्जी सत्ता के नशे में चूर रहकर केंद्र सरकार व संवैधानिक संस्थाओं को गाजर-मूली समझ रहे थे; उनकी लगातार अवहेलना कर रहे थे, वे अब उन्हीं संस्थाओं के शरणागत हैं और उन्हीं से न्याय की गुहार लगा रहे हैं।

यही वह अभिषेक बनर्जी है, जिसपर ममता ने अयोग्य होने के बावजूद अत्यधिक विश्वास किया। कहा जाता है कि यह आदमी गुंडों के सरदार के रूप में बंगाल में जाना जाता था।

सत्ता का दुरूपयोग करते हुए जहां मनमर्जी करता था, वहीं पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं को हिकारत की नजर से देखता था और एक राजनीतिक पार्टी को अपनी जागीर समझता था।

पश्चिम बंगाल के नवनियुक्त मुख्यमंत्री शुभेंदू ने अधिकारी इसी की वजह से पार्टी से त्यागपत्र दे दिया था और बीजेपी में शामिल हो गए थे, जो अब बंगाल के मुख्यमंत्री बन गए।

इनकी मुसीबतें यहीं तक सीमित नहीं है। पार्टी के छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं व नेताओं के ऊपर बंगाल की जनता बेतहाशा अंडे बरसा रही है। वे जहां भी जाते हैं, मुंह छिपाकर आते-जाते हैं, ताकि अंडों की मार से बचे रहें।

मार्के की बात यह कि अंडे बरसानेवाले ये वे प्रताड़ित व लांक्षित बंगालवासी व मूलनिवासी हैं, जो तृणमूल की मुस्लिमपरस्त नीति से बेहद खफा और तंग थे।

तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन में बंगाली हिंदू दोयम दर्जे के नागरिक बना दिए गए थे। ममता की प्राथमिकता मुस्लिम वोट बैंक थी, जिसके दम पर वह 15 साल सत्ता में रही और हिंदुओं को पुलिस व अपने कार्यकर्ताओं से पिटवाती रही। उनके घर जलवाती रही और उन्हें बंगाल छोड़कर अन्यत्र जाने के लिए विवश करती रही।

कहा तो यहां तक जाता है कि उसने बीजेपी के एक-दो नहीं, सैकड़ों कार्यकर्ताओं की हत्या कथित तौर पर करवा दी है।

यही वजह है कि वह अपने सत्ता के आखिरी दम तक एसआईआर यानी मतदाता सूची शुद्धीकरण का विरोध करती रही, ताकि मुस्लिम मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से न कटे, न हटे और उसका वोटबैंक सुरक्षित रहे।

ममता की तृणमूल घुसपैठ करवाने में अव्वल थी। वह बंगाल के बार्डर में बाउंड्री वाल या तार फेंसिंग करवाने के लिए केंद्र सरकार को जमीन उपलब्ध नहीं करवा रही थी और अकड़ में थी कि उसका केंद्र सरकार क्या बिगाड़ लेगी?

इसी से तृणमूल के लोग न केवल बांग्लादेशियों का घुसपैठ करवाते रहे, बल्कि उनका आधारकार्ड, राशनकार्ड और वोटर आईडी तक बनवाते रहे। इन्हीं घुसपैठियों की बदौलत ममता 15 साल तक बंगाल में अजेय बनी रही।

वह अपना ज्यादातर वक्त केंद्र से लड़ने-झगड़ने, मुस्लिमपरस्ती और केंद्र की योजनाएं राज्य में लागू न करने में जाया करती थी।

संदेशखाली के अपराधियों को वह शरण दे रही थी, वहीं आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ हुए विभत्स बलात्कारकांड के दोषियों पर ठोस कार्यवाही तक नहीं की।

वह सातवें आसमान में थी और ख्वाब में भी नहीं सोची थी कि वह इस कदर हार जाएगी कि उसकी पार्टी तिनका-तिनका बिखर जाएगी।

इधर तृणमूल कांग्रेस की हार से विपक्षी खेमों में खलबली मची हुई है; वहीं बीजेपी का अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा एक के बाद एक राज्य जीतता चला जा रहा है। पहले बिहार, फिर बंगाल की जीत ने उसको उत्साह के शिखर तक पहुंचा दिया है।

बिहार व बंगाल में विपक्षियों की हार को राजनीति में परिवारवाद व वंशवाद की विदाई के रूप में देखा जा रहा है। इसका एक कारण यह भी कि महाराष्ट्र में वंशवाद के प्रतीक उद्धव ठाकरे की पार्टी के 9 में-से 6 सांसद एकनाथ सिंदे की शिवसेना में पाला बदलकर शामिल हो गए हैं। वहीं, शरद पवार के राकांपा में भी टूट-फूट के आसार हैं।

इसकी बड़ी वजह यह भी है कि इन क्षेत्रीय पार्टियों की देश-प्रदेश के प्रति न नीति, नीयत व सिद्धांत हैं, न उच्च इरादा कि ये देश-प्रदेश के मूलनिवासियों के साथ न्याय करेंगी। अतः, सिद्धांतहीन व मौकापरस्त पार्टियों के लिए तृणमूल का हश्र खतरे की घंटी से कम नहीं है।

अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने तृणमल कांग्रेस के उन 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी किया है, जिन्होंने पार्टी से अलग होकर खुद का विलय ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ में करने का दावा किया है।

तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा में पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश-सूर्यकांत, जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने यह नोटिस जारी किया है।

देखना यह है कि इसका परिणाम क्या निकलता है?
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