इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक अहम फैसले में तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी कुप्रथाओं पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है,‘‘ऐसी कुप्रथाओं की आड़ में महिलाओं के यौन शोषण की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसी प्रथाएं समाज का काला पन्ना है, जो संवैधानिक मूल्यों, समानता और मानवीय गरिमा के विरूद्ध है। ऐसे कृत्य न केवल कानूनी रूप से अपराध हैं, बल्कि समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोरनेवाली हैं।’’
खंडपीठ ने पीड़िता के पूर्व पति, चाचा, मौलाना समेत 9 आरोपियों की याचिका को सिरे से खारिज करते हुए कहा है,‘‘पर्सनल लॉ की आड़ में अपराधों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता।’’
खंडपीठ ने नजीर देते हुए जबरदस्त टिप्पणी की है, ‘‘प्रथम दृष्टया यह मामला नाबालिग संग सोची-समझी साजिश के साथ सामूहिक दुष्कर्म का है। इसकी गहन जांच जरूरी है। पूरे मामले में सभी आरोपियों ने एक गिरोह के रूप में भूमिका निभाई है, जो कानून के खिलाफ है। कुछ की भूमिका सहायक या षड़यंत्रकारी के रूप में हो सकती है, लेकिन विवेचना के प्रारंभिक स्तर पर उन्हें एफआइआर रद्द करने की मांग का अधिकार नहीं है।’’
गौरतलब है कि मामले में आरोपियों ने अलग-अलग चार याचिकाएं दाखिल कर पर्सनल लॉ और धार्मिक प्रथाओं का हवाला देते हुए मुकदमा रद्द करने व गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने कठोर टिप्पणियों के साथ याचिका खारिज कर दिया है।
दरअसल, निकाह हलाला पर्सनल लॉ की आढ़ में सामूहिक दुष्कर्म से किसी गंभीरतम मामले में कम नहीं है।
मामला क्या है?
मामला उत्तरप्रदेश राज्य के अमरोहा के सैदनागली क्षेत्र का है। एफआइआर के मुताबिक पीड़िता का निकाह 2015 में 15 वर्ष की आयु में हुआ था। इसके बाद तीन तलाक, निकाह हलाला और फिर निकाह के नाम पर उसका जबरिया यौन शोषण किया गया।
पीड़िता का आरोप गंभीरतम है कि 19 फरवरी 2025 को फिर निकाह का झांसा देकर उसे हलाला के नाम पर दरिंदगी का शिकार बनाया गया।
लिहाजा, इलाहाबाद हाईकोर्ट को दुःखीमन से कहना पड़ा, ‘‘पीड़िता नाबालिग थी, तब उसके साथ रेप हुआ। बाद में गैंगरेप किया गया, जिसे कथित तौर पर दूसरे हलाला के नाम पर छिपाया व दबाया गया।’’
जबकि याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 2016 में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) शरिया कानून के तहत मान्य था। इस्लामी कानून के अनुसार, निकाह हलाला एक वैध रस्म है। ऐसे में, इस मामले में दर्ज एफआईआर रद्द की जानी चाहिए।
सुप्रीमकोर्ट के पूर्व फैसले का हवाला-
इलाहाबाद के खंडपीठ ने फैसला देते हुए इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में शिखर कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में शीर्ष कोर्ट के द्वारा व्यवस्था दिया गया है कि अन्य कानूनों के बावजूद, नाबालिगों से जुड़े मामलों में पॉक्सो अधिनियम के प्रावधान ही प्राथमिकता पाएंगे।
अजीब हालात हैं कि मुस्लिम रहेंगे भारत में, यहीं जीएंगे-खाएंगे; लेकिन भारत के कानूनों को मानने के बजाय मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देकर अपराधों से बचने का बेजा प्रयास करेंगे।
अपराध संहिता के तहत निकाह-हवाला यौन शोषण के अपराध के अधीन आता है। जबकि यहां तो धर्म के नाम पर सामूहिक रूप से बलात्कार करने का घिनौना और साजिशाना अपराध किया गया है।
ऊपर से पीड़िता नाबालिग थी, जिसके न्याय का निर्धारण पॉस्को एक्ट के तहत ही किया जा सकता है।
यही वजह है कि देश के हितैषियों व हितसाधकों के द्वारा यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता की मांग लगातार की जा रही है, जिससे कि एक देश एक कानून रहे और सभी धर्मावलंबियों पर समान रूप से लागू हो।
इसका भी विरोध मुस्लिमपरस्त पार्टियां व पंथगुरु गाहे-बगाहे करते रहते हैं और देश की शांत फिजा में कैरोसिन डालने का काम करते रहते हैं।
उत्तराखंड व गोवा जैसे राज्यों ने यूसीसी लागू कर दिया है। मप्र में तत्संबंधी बिल पास हो चुका है। लेकिन, समान नागरिक संहिता का मामला देशहित में देश के लिए है; इसीलिए इसे केंद्रीय स्तर पर देशभर में एक साथ लागू किया जाना चाहिए।
सुप्रीमकोर्ट भी यूसीसी लागू करने का निर्देश केंद्र सरकार को कई मर्तबा दे चुकी है। क्या केंद्र सरकार इस गहन-गंभीर मसले पर विधेयक लाएगी और उसे कानूनी अमलीजामा पहनाकर देशवासियों को एक कानून के दायरे में लाएगी? फिर चाहे किसी का पंथ, मजहब कोई हो; सब पहले भारतीय हैं और एक संविधान के तहत देश में जीवनयापन कर रहे हैं।
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