एडीआर (एशोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-मई 2026 में हुए चार बड़े राज्यों के विधानसभा चुनावों में 794 निर्वाचित नुमाइंदों में-से 451 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें भी 322 के खिलाफ गंभीर किस्म के अपराध जैसे हत्या, हत्या का प्रयास व बलात्कार जैसे मामले हैं।
ऐसे मामलों में केरलम राज्य के हालात बदतर हैं, जहां 140 में-से 114 दागी नुमाइंदे विधानसभा पहुंच चुके हैं। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जिस छोटे से राज्य में 80 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों पर आपराधिक रिकार्ड दर्ज हो, उस राज्य में कानून-व्यवस्था की हालत कितनी बेहतर हो सकती है?
इसके बाद नंबर आता है प. बंगाल का, जहां 294 में-से 190 दागी विधायक चुनकर माननीय बन बैठे हैं। तीसरे नंबर पर तमिलनाडु है, जहां के 234 में-से 126 और असम में 126 में-से 21 सियासतदान दागी प्रवृत्ति के हैं।
इसमें सर्वाधिक दुःखद तथ्य यह कि इस मामले में कोई राजनीतिक दल किसी से कम नहीं है। सब बराबर के भागीदार हैं। एक ही थैले के चट्टे-बट्टे सरीखे। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई नागनाथ है, तो कोई सांपनाथ।
असम विधानसभा के लिए राहतभरी खबर यही कि वहां पिछली विधानसभा में 34 विधायक दागदार थे, तो अबकी मात्र 21 पर ही आपराधिक मामले दर्ज हैं।
ज्वलंत सवाल यही कि बात-बात में सत्तारूढ़ गठबंधन की नुक्ताचीनी करनेवाले विपक्षी राजनीतिक दल इस गंभीर मुद्दे पर चुप क्यों हैं? इसके बावजूद क्या केंद्र सरकार को इस संबंध में सर्वदलीय बैठक बुलाकर लोकतंत्र के हित में कोई समाधानकारक हल नहीं निकालना चाहिए?
यदि सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर रही है, तो विपक्ष को इसकी पहल करनी चाहिए। लेकिन पक्ष-विपक्ष ऐसे मसलों में कुछ नहीं कहेंगे-करेंगे; क्योंकि इस हमाम में सभी नंगे हैं!
असल परेशानी यही कि सियासी दलों को केवल जीत की गारंटी चाहिए होती है। उनका आकलन है कि यह काम केवल रसूख, रुतबे व दौलतमंद प्रत्याशी ही कर सकते हैं, फिर चाहे उनकी छवि अपराधी व भ्रष्टाचारी पृष्ठभूमि की ही क्यों न हो?
निर्वाचन आयोग के द्वारा निर्धारित निर्वाचक नामावलियों में प्रत्याशियों को इस बात का जिक्र करना और उन्हें तीन-तीन समाचारपत्रों (एक राष्ट्रीय, एक प्रादेशिक व एक स्थानीय) के मार्फत सार्वजनिक करना आवश्यक रहता है कि उनपर कैसे-कैसे मामले विचाराधीन हैं, उनकी चल-अचल संपत्तियां कितनी हैं और वह किसके नाम से हैं, जिसे देख-पढ़ कर मतदाता अपनी राय बना सके?
लेकिन, घोर आश्चर्य यही कि इस नियम का पालन कहीं नहीं किया जाता। न जनता के समक्ष ऐसी राय समाचारपत्रों के माध्यम से सामने आती है।
लगता है, यहां भी लूप होल निकाल लिया गया है, जो कागजी खानापूर्ति के अलावा कुछ खास होता-जाता नहीं है। क्योंकि ऐसी खबरें कहीं पढ़ने व देखने को नहीं मिलती कि फलां प्रत्याशी के नाम से इतने मामले पुलिस थानों में दर्ज हैं। ऐसे में जनता उनके प्रति राय बनाए, तो बनाए कैसे?
वहीं, शीर्ष कोर्ट भी गाहे-बगाहे नसीहतें देता रहता है। पर, नेतागण उसकी नसीहतों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट समस्त कोर्टों को कई बार निर्देशित कर चुका है कि जनप्रतिनिधियों के आपराधिक मामलों का निपटाया त्वरित गति से किया जाए।
दागदार जनप्रतिनिधि--
भला हो सुप्रीमकोर्ट का, जिसने लोकतंत्र की उम्मीदों को बरकरार रखते हुए एर्नाकुलम एवं पटना हाईकोर्ट को निर्देशित किया है कि वे अपने प्राधिकार क्षेत्र के प्रत्येक जिले के सेशन कोर्ट में विशेष अदालतों का गठन कर वर्तमान एवं पूर्व सांसदों व विधायकों के खिलाफ बकाया आपराधिक मामलों की त्वरित सुनवाई करवाएं।
मुकदमों का अंबारः गौर-ए-काबिल यह भी कि देश के तमाम सांसदों के खिलाफ कुल 4,122 मामलों में-से 2,324 मामले अदालतों में लंबित पड़े हैं। 1,991 मामलों में तो कोई आरोपपत्र तक दाखिल नहीं किया गया है। जबकि अनेक मामले 30 साल से चल रहे हैं। देश में ऐसी न्यायिक शिथिलता है कि अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है।
वहीं अदालतें इधर जजों की कमी से जूझ रही हैं, उधर सफेदपोश नेताओं का अपराध बढ़ता चला जा रहा है। अनेक मामले इसलिए पेंडिंग रहते हैं, क्योंकि बड़ी अदालतों ने स्टे दे रखा है। मामलों का त्वरित निपटारा हो जाए, तो दोषियों को सजा व बेगुनाहों को राहत मिले। पर, यह इस देश में मृग मरीचिका ही है।
नेताओं के बकाया मामले लोकतंत्र पर इसलिए सवालिया निशान लगा रहे हैं; क्योंकि यही नेता चुनाव जीत कर संविधान की शपथ लेते हैं, फिर संविधान का मखौल उड़ाने लग जाते हैं।
राजनीति का अपराधीकरणः पार्टियां राजनीति का अपराधीकरण रोकने में विफल रही हैं। वे उम्मीदवार का चरित्र या आपराधिक प्रवृत्ति न देखकर सिर्फ जीतने की क्षमता का आकलन कर टिकट देती हैं।
पहलेपहल नेता चुनाव में अपराधी तत्वों की मदद लिया करते थे, लेकिन अब अपराधी व भ्रष्टाचारी खुद चुनाव लड़ रहे हैं और कानून की धज्जियां उड़ाते हुए लोकतंत्र को मखौलतंत्र में बदल दिए हैं।
बड़े-बड़ों के मामलेः यों तो ज्यादातर राज्यों में मामले हैं, किंतु यहां कुछ खास राज्यों के मामले में चर्चा कर लेना वाजिब रहेगा। कर्नाटक के पूर्व व वर्तमान सीएम के खिलाफ 18 मामले दर्ज हैं। इनमें 10 मामले ऐसे हैं, जिनमें आजन्म कारावास की सजा हो सकती है। पंजाब के पूर्व सीएम के खिलाफ भ्रष्टाचरण का मामला 11 वर्षों से लंबित है।
केरल के एक एमएलए के खिलाफ 1982 में हत्या का मामला दर्ज हुआ है, लेकिन 44 वर्ष बीत जाने पर भी ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ बीते साल 16 मई को पुलिस ने एफआईआर दाखिल की थी। इसमें उम्रकैद का मामला बनता है।
ये वे चंद दृष्टांत हैं, जो सुर्खियों में हैं। चूंकि कोयले की दलाली में सबके हाथ काले हैं, इसीलिए कोई किसी पर ऊंगली तक नहीं उठाता।
राज्यवार सांसदों-विधायकों पर बकाया मामलों में यूपी 992 के साथ अव्वल नंबर पर है। इसके बाद ओडिशा 331, केरल 312, बिहार 304, बंगाल 269, कर्नाटक 161, महाराष्ट्र 328, तमिलनाडु 303, झारखंड 167 मामले लंबित हैं।
यह सोचनीय बिंदु है कि ऐसे दागी और आपराधिक नेताओं से लोकतंत्र का कैसा भला होनेवाला है? जनता इनसे कौन-सा सीख व सबक ले सकती है?
यही कारण है कि चहुंओर निराशा, हताशा व आपाधापी का वातावरण बना हुआ है। इधर केंद्र में लोकपाल और कई राज्यों में लोकायुक्त का गठन काफी मान-मनौव्वल के उपरांत किया गया है, जबकि कई राज्यों में लोकायुक्त संगठन का अस्तित्व तक नहीं है।
ऊपर से जहां गठित है, वहां लोकपाल व लोकायुक्त सफेद हाथी साबित हो रहे हैं, क्योंकि वे शिकायतों पर ही सक्रिय होते हैं। जबकि उन्हें खुद भी सबपर पैनी नजर रखनी चाहिए कि किसकी चल-अचल संपति बढ़ रही है और कौन अपराधों में लिप्त है?
वहीं, तीनों अदालतों में न्यायाधीशों के सैकड़ों पद रिक्त पड़े हैं। कहा जाता है कि इन अदालतों में 3 लाख से अधिक केस पेंडिंग चल रहे हैं। आखिर क्यों न हो केस पेंडिंग, जब जज की कमी हो?
जहां न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त है, वहां भी मामले ढाक के वही तीन पात साबित होते रहते हैं। सारे मामले मंथर गति से चलायमान रहते हैं और दागदार जनप्रतिनिधि चुनाव-दर-चुनाव जीतकर लोकतंत्र का मखौल उड़ाते रहते हैं कि उनका क्या-कुछ उखाड़ लिया जाएगा?
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