Ek Purush in Hindi Motivational Stories by Aloka Patel books and stories PDF | एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 10

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एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 10

भाग १० — किसके लिए जिऊँ?

मिहिर अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठा बहुत देर तक सोचता रहा।

उसके हाथ में मोबाइल था।

स्क्रीन पर कंपनी का मैसेज खुला हुआ था।

“Please confirm your joining date.”

एक नौकरी…

जिसकी उसे इस समय सबसे ज्यादा जरूरत थी।

लेकिन वही नौकरी उसे अपने परिवार से दूर ले जाने वाली थी।

मिहिर ने मोबाइल बंद कर दिया।

वह वापस पापा के कमरे में गया।

पापा सो रहे थे।

माँ उनके पास बैठी थीं।

निशा खिड़की के पास खड़ी थी।

मिहिर को देखते ही उसने पूछा—

“क्या फैसला किया?”

मिहिर ने धीमी आवाज में कहा—

“अभी नहीं पता।”

निशा उसके पास आई।

“तुम्हें क्या लगता है?”

मिहिर ने उसकी तरफ देखा।

“अगर मैं चला गया तो पापा की देखभाल कौन करेगा?”

निशा ने कहा—

“मैं हूँ।”

“माँ हैं।”

“हाँ।”

“लेकिन लोन?”

“हम देख लेंगे।”

“घर?”

“मैं संभाल लूँगी।”

मिहिर चुप हो गया।

निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तुम्हें हर चीज खुद करने की आदत है।”

“क्योंकि मुझे डर लगता है।”

“किस बात का?”

“कि अगर मैंने जिम्मेदारी किसी और को दे दी और कुछ गलत हो गया तो?”

निशा मुस्कुराई।

“और अगर तुम सारी जिम्मेदारी खुद लेकर टूट गए तो?”

मिहिर के पास कोई जवाब नहीं था।

उसी समय पापा की आँखें खुलीं।

उन्होंने दोनों की बातें सुन ली थीं।

“मिहिर…”

“जी पापा।”

“नौकरी वाली बात है?”

मिहिर उनके पास बैठ गया।

“हाँ।”

“दूसरे शहर वाली?”

मिहिर ने सिर हिलाया।

पापा ने कहा—

“जा।”

मिहिर चौंक गया।

“लेकिन पापा…”

“जा बेटा।”

“आपकी तबीयत…”

“मेरी चिंता मत कर।”

“मैं आपको अकेला छोड़कर कैसे जा सकता हूँ?”

पापा ने मुस्कुराते हुए कहा—

“जिस बेटे को मैंने जिंदगी भर अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कहा, आज वही बेटा मेरे कारण रुकना चाहता है?”

मिहिर की आँखें भर आईं।

पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“बेटा, माता-पिता बच्चों को अपने पास रखने के लिए नहीं पालते।”

मिहिर उनकी तरफ देखता रहा।

“हम चाहते हैं कि हमारा बच्चा हमसे आगे जाए।”

मिहिर ने कहा—

“लेकिन मैं परिवार छोड़ना नहीं चाहता।”

पापा ने जवाब दिया—

“दूर जाना और परिवार छोड़ देना… दोनों अलग बातें हैं।”

कमरे में खामोशी छा गई।

माँ ने भी कहा—

“जा बेटा।”

मिहिर ने माँ की तरफ देखा।

“माँ?”

“तू हमारे लिए बहुत कुछ कर चुका है।”

माँ की आँखों में आँसू थे।

“अब अपने लिए भी कुछ कर।”

मिहिर ने निशा की तरफ देखा।

निशा की आँखों में भी आँसू थे।

लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।

“मैंने तुमसे शादी सिर्फ इसलिए नहीं की थी कि तुम मेरे और बच्चों के लिए कमाते रहो।”

मिहिर चुप रहा।

“मैंने तुमसे इसलिए शादी की थी कि हम जिंदगी साथ जिएँ।”

वह कुछ पल रुकी।

“अगर जिंदगी ने तुम्हें आगे बढ़ने का मौका दिया है तो मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं।”

मिहिर ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उस पल मिहिर के भीतर कुछ बदल गया।

उसे पहली बार समझ आया कि—

परिवार का मतलब हमेशा पास रहना नहीं होता।

कभी-कभी परिवार के लिए दूर जाना भी पड़ता है।

लेकिन उसके मन में एक डर अभी भी था।

“अगर मैं वहाँ जाकर असफल हो गया तो?”

पापा मुस्कुराए।

“तो वापस आ जाना।”

मिहिर की आँखों से आँसू गिर पड़े।

“इतना आसान?”

पापा बोले—

“बेटे के लिए घर का दरवाजा कभी बंद नहीं होता।”

दो दिन बाद मिहिर ने नौकरी स्वीकार कर ली।

उसे एक महीने बाद दूसरे शहर में जॉइन करना था।

इस एक महीने में उसने घर की सारी जरूरी व्यवस्थाएँ करने की कोशिश की।

पापा के इलाज का इंतजाम किया।

लोन की किश्तों का नया हिसाब बनाया।

बच्चों की फीस अलग रखी।

माँ के खर्च के लिए पैसे दिए।

और निशा के साथ बैठकर घर का बजट बनाया।

निशा ने भी कुछ खर्च कम करने का फैसला किया।

एक शाम मिहिर ने उससे कहा—

“तुम्हें मेरी वजह से बहुत कुछ बदलना पड़ रहा है।”

निशा ने मुस्कुराकर कहा—

“तुम्हारी वजह से नहीं।”

“फिर?”

“हमारी जिंदगी की वजह से।”

मिहिर ने पूछा—

“तुम्हें मेरे जाने का दुख नहीं होगा?”

निशा की आँखें नम हो गईं।

“बहुत होगा।”

“फिर?”

“दुख और गलत फैसला एक ही चीज नहीं होते।”

मिहिर ने पहली बार महसूस किया कि उसकी पत्नी उससे ज्यादा मजबूत थी।

जाने का दिन भी आ गया।

सुबह घर में अजीब-सी खामोशी थी।

बच्चे मिहिर से लिपट गए।

माँ ने उसके लिए खाना बनाया।

पापा कमरे से बाहर आकर उसे गले लगाने लगे।

“अपना ध्यान रखना।”

मिहिर ने कहा—

“आप भी।”

निशा दरवाजे के पास खड़ी थी।

मिहिर उसके पास गया।

“मैं जल्दी वापस आऊँगा।”

निशा ने मुस्कुराकर कहा—

“मुझे पता है।”

“और अगर बहुत देर हो गई?”

“तो मैं तुम्हारे पास आ जाऊँगी।”

मिहिर हँस पड़ा।

उसने निशा को गले लगा लिया।

कुछ पल बाद वह अपना बैग लेकर घर से बाहर निकल गया।

गाड़ी चल पड़ी।

मिहिर ने पीछे मुड़कर देखा।

पूरा परिवार दरवाजे पर खड़ा था।

उसकी आँखें भर आईं।

लेकिन इस बार वह अकेला नहीं जा रहा था।

उसके साथ उसके परिवार का विश्वास था।

दूसरे शहर पहुँचकर मिहिर ने नया जीवन शुरू किया।

नई कंपनी।

नई जगह।

नए लोग।

नई जिम्मेदारियाँ।

शुरुआत आसान नहीं थी।

दिन भर काम।

शाम को छोटा-सा कमरा।

रात को परिवार से वीडियो कॉल।

बच्चे पूछते—

“पापा, कब आओगे?”

मिहिर हर बार मुस्कुराकर कहता—

“बहुत जल्दी।”

लेकिन कॉल खत्म होने के बाद वही कमरा अचानक बहुत खाली लगने लगता।

एक रात निशा से फोन पर बात करते हुए मिहिर ने कहा—

“तुम सही कहती थीं।”

“क्या?”

“दूर जाना आसान नहीं है।”

निशा बोली—

“लेकिन जरूरी था।”

“हाँ।”

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर निशा ने पूछा—

“एक बात पूछूँ?”

“पूछो।”

“अब बताओ… तुम किसके लिए जी रहे हो?”

मिहिर मुस्कुराया।

पहले इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं था।

लेकिन अब था।

“तुम सबके लिए…”

वह रुका।

“और थोड़ा-सा अपने लिए भी।”

निशा मुस्कुरा दी।

“बस… यही तो चाहिए था।”

फोन कट गया।

मिहिर ने कमरे की खिड़की खोली।

बाहर एक अनजान शहर चमक रहा था।

वह शहर उसके लिए नया था।

लेकिन उसके भीतर पहली बार एक नई उम्मीद जन्म ले चुकी थी।

उसे नहीं पता था कि यह नई नौकरी उसे कहाँ ले जाएगी।

लेकिन अब वह सिर्फ परिवार की जिम्मेदारियाँ उठाने वाला आदमी नहीं था।

वह अपनी जिंदगी को भी समझने लगा था।

और शायद…

यही उसकी असली शुरुआत थी।