superstitious belief in Hindi Magazine by Virendra Dewangan books and stories PDF | अंधविश्वासी धारणा

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अंधविश्वासी धारणा

खबर है कि छत्तीसगढ़ राज्य के जशपुर जिले के ग्राम दीवानपुर में अंधविश्वास और इलाज में देरी के चलते एक चार वर्षीय मासूम कार्तिक मांझी को 16 जुलाई 2026 को अपनी जान गंवानी पड़ गई।

घर के भीतर अपने बड़े भाई के साथ जमीन पर सो रहे कार्तिक को जहरीले करैंत सांप ने डस लिया। परिजन उसको अस्पताल ले जाने के बजाय भुदुपारा स्थित एक बैगा के पास झाड़-फूंक करवाने के लिए ले गए।

बैगा रात के 9 बजे तक झाड़-फूंक करता रहा। इस बीच जहर उसके पूरे शरीर में ऐसा फैला कि बैगा हाथ खड़े कर दिया। बच्चे को परिजन आननफानन में सिविल अस्पताल पत्थलगांव ले गए, जहां डॉक्टरों ने उसको मृत घोषित कर दिया।

छग के ही बिलासपुर जिले के पचपेड़ी क्षेत्र की ग्रामपंचायत सोन के निवासी बालचंद पटेल के दोनों बेटे कमलेश और बलेश 23 जून 2022 की रात जमीन पर सोए हुए थे।

24 जून की सुबह छोटा बेटा बलेश बड़े भाई कमलेश को उठाने लगा. तभी बिस्तर के नीचे छिपे एक सर्प ने बलेश की बांह में दंश मार दिया। बच्चों ने घटना की जानकारी तुरंत परिजनों को दी।

स्वजन बलेश को पास के गांव कुकुर्दीकला के बैगा के पास ले गए। वहां बैगा घर पर नहीं होने से वे उसे गोडाडीह गांव लेकर गए।

वहां मौजूद बैगा ने उन्हें बच्चे को अस्पताल ले जाने की सलाह दी। पर वे बच्चे को अस्पताल न ले जाकर घर ले आए, जहां बच्चे की मौत हो गई। कोटवार की सूचना पर पुलिस पहुंची और शव का पोस्टमार्टम करवाया।

छग के जशपुर जिले का फरसाबहार, पत्थलगांव, बगीचा, कांसाबेल एवं तपकरा का इलाका भुरभुरी मिट्टी, गर्म आबोहवा व दीगर हालात के चलते जहरीले सर्पों के लिए बेहद मुफीद जगह माना जाता है। इसलिए यह छग का "नागलोक" कहलाता है।

यहां पाए जाने वाले विषैले सांपों के दंश से हर साल मरने वालों की संख्या पचास से अधिक पहुंच जाया करती है।

साल 2005 से मई 2017 तक 425 लोग मौत के मुंह में समा चुके हैं। यानी औसतन हर साल 45-50 लोग सर्पदंश से मारे जाते हैं। इसमें भी स्नैकबाइट से जशपुर ब्लाक में मौतें सर्वाधिक होती हैं।

जशपुर जिले में 24 प्रजाति के सांप पाए जाते हैं। इसमें भी नाग के दो, करैत के दो और वाइपर के दो; इस तरह कुल 6 प्रजातियां जहरीली और जानलेवा होती हैं।

इनके अलावा बाकी 18 प्रजाति और हैं, जो बिना जहर वाले सांपों के नाम से जाने जाते हैं। ये हैं-अजगर, धामना, ढोंढ़िया, हुरहुरिया सहित कई अन्य प्रजातियां।

साथ में 14 सांप की जातियां और हैं, जिन्हें सामान्य तौर पर जहरीले सांपों में गिना जाता है। इसमें एक करैत का हमशक्ल चिंगराज (कामन वौल्फ) भी है, जो जहरीली प्रकृति का है।

दरअसल, देश-प्रदेश के वनीय क्षेत्रों में कुछ रंग-बिरंगे सर्प होते हैं, जिन्हें विषैला समझ लिया जाता है।

इनसे डाक्टर भी दिग्भ्रमित रहते हैं। जैसे-ताम्र अलंकृत सांप (कौपर हेड), कुकरी (कौमन कुकरी), इस तरह से और भी कुछ सांप हैं, जिन्हें जहरीले सांपों की श्रेणी में जानकारी के अभाव में गिन लिया जाता है।

जीडब्ल्यूएनएस संस्था के संस्थापक कैसर हुसैन का कहना है कि दरअसल एक जैसे दिखने वाले सांपों को विषयुक्त समझ लेने से ही लोग भ्रमित होते हैं।

यही कारण है कि विषहीन सर्प के काटे जाने के बाद जब झाड़-फूंक कराया जाता है, तब बगैर किसी दवा के पीड़ित ठीक हो जाता है।

विचारणीय मुद्दा यही कि यहीं से अंधविश्वासी धारणा फलने-फूलने लगता है कि फलां महिला, पुरुष या बच्चा तो बिना दवाई के झाड़-फूंक मात्र से ठीक हो गया। फिर हमारा बच्चा या युवा क्यों ठीक नहीं हो सकता?

ऐसे हालात देश के सभी वनक्षेत्रों में है. सर्पदंश से मप्र, झारखंड, असम, छग, ओड़िशा, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

लिहाजा, वन्यबहुल क्षेत्रों में ‘‘सर्प ज्ञान केंद्र’’ खोलने की सख्त जरूरत है, ताकि वनवासियों व रहवासियों को सही जानकारी मिले और वे सर्पदंश जैसे मामले में अंधविश्वासी धारणाओं से मुक्ति पाएं।

इसके विपरीत जहरीले सर्प के काटने से "एंटी स्नैक वेनम" लेने की जरूरत होती है, जो क्षेत्र के सिविल अस्पताल, प्राथमिक एवं मिनी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध होते हैं।

इसके बावजूद ज्यादातर लोग अंधविश्वास के चलते पीड़ित को समय पर अस्पताल ले जाने के बजाय उसे बैगा-गुनिया के पास ले जाते हैं।

दुखदायी स्थिति तो यही कि तुरंत इलाज के अभाव में पीड़ित के शरीर में विष फैल जाने से मौत हो जाती है।

इसका प्राथमिक उपचार यही कि सर्पदंश का शिकार होने पर घबराहट या डरने से बचना चाहिए। डरने से शरीर का रक्तदाब बढ़ जाता है और सर्प का विष तन में तेजी से फैलने लगता है।

वहीं, सर्पदंश के शिकार व्यक्ति से लगातार बात करते रहना चाहिए, ताकि वह सो न पाए।

सर्प के काटे स्थान से थोड़े ऊपर साफ कपड़ा या रस्सी से बांध देना चाहिए, जिससे सर्प का जहर शरीर में फैल न पाए।

पीड़ित को बगैर विलंब के नजदीकी चिकित्सा केंद्र में ले जाना जरूरी है।

ऐसे में कई बैगा व गुनिया तांबे के सिक्के और थाली-लोटे के जरिए मृतक की जान को वापस लाने का ढोंग करते रहते हैं, जो परिजनों व बैगा-गुनियाओं के लिए अंतत: मृग मरीचिका ही साबित होता है।
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