दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा! मीलार्ड!! न्यायमूर्ति व न्यायाधीश!!! धन्य है यह न्यायविद, जो पैसे ले-ले कर लोगों को न्याय बांटने के काम में लगा हुआ था, तभी तो इसके सरकारी आवास में नोटों का अंबार मिला, वो भी जले व अधजले हालात में!
कैशकांड में तीन सदस्यीय जांच समिति ने इनके खिलाफ लगे तीनों आरोप सही पाए हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से गठित समिति ने 12 अगस्त 2026 को अपनी रिपोर्ट लोकसभा व राज्यसभा में पेश कर दी है।
जांच कमेटी ने कानून के अनुसार, इन मीलार्ड के खिलाफ आगे की कार्रवाई करने की सिफारिश कर डाली है। अब, पूर्व जस्टिस वर्मा के विरूद्ध संसद के शीतकालीन सत्र में महाभियोग का प्रस्ताव लाया जा सकता है।
अपने तकरीबन एक वर्ष के कार्यकाल में समिति ने 9 बैठकें की। उन्हें 11 से अधिक आवेदन मिले, जिसमें 9 गवाह थे। 9 गवाहों के बयान 84 पेज में दर्ज किए गए। फिर जो फाइनल रिपोर्ट बनी, वह 1089 पेज की निकली।
तीन सदस्यीय जांच समिति में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, बांम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस चंद्र शेखर और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य सम्मिलित थे।
समिति ने अपनी अहम रिपोर्ट में लिखा है,‘‘जस्टिस वर्मा के घर में बने स्टोररूम में काफी मात्रा में जले हुए 500 रुपये के नोट मिले थे। पूछताछ में पूर्व जस्टिस वर्मा (वे अप्रैल 26 में अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं) नकदी के स्त्रोत के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।"
गवाहों ने जले, अधजले व बिनाजले नोटों का अपने बयान में उल्लेख किया, पर वे सटीक आंकड़ा नहीं बता सके कि रुपया कितने मूल्य का रहा होगा? लिहाजा, समिति कुल रकम का आंकड़ा नहीं दे सकी।
हालांकि एसएचओ ने फर्श पर पड़े एक ढेर और पट्टी पर रखे दूसरे ढेर को करीब डेढ़-डेढ़ फीट ऊंचा बताया, लेकिन इससे भी सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सका। गवाहों का यही कहना हुआ कि नोटों के बंडल फर्श पर बिखरे पड़े थे।
मामला है क्या-
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस वर्मा के निवासस्थान पर 14 मार्च 2025 की रात आग लग गई थी। तब, जस्टिस वर्मा घर पर नहीं थे। आग बुझाने गई फायर ब्रिगेड की टीम को उनके सरकारी आवास से 500-500 रुपये के जले, अधजले व बिनाजले नोटों के भरे बोरे मिले थे।
आरोप पाए गए सही-
1. नई दिल्ली के 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित पॉश कालोनी के सरकारी आवास के स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में 500 रुपये के नोट मिले थे। इन नोटों के स्त्रोत या स्वामित्व के बारे में पूर्व जस्टिस वर्मा संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
सवाल यही कि कैसे जवाब दें बेचारे वर्माजी? जो मुवक्किलों से जवाब ले-ले कर उल्टा-सीधा न्याय करते फिर रहे थे, वे कहां से दें बेचारे सीधा जवाब? जवाब देते हैं, तो बुरी तरह फंस सकते थे। इसीलिए, चुप्पी साधना उचित समझे होंगे।
2. आग लगने के उपरांत स्टोररूम को विधिसम्मत तरीके से सील और जांचने के पहले स्थिति में हेरफेर किया गया। अहम साक्ष्य सुरक्षित नहीं रखे गए और बाद में करेंसी नोट भी उपलब्ध नहीं रहे। समिति ने माना कि परिसर से जुड़े कर्मचारियों के माध्यम से हेरफेर में मौन सहमति से साक्ष्य का नुकसान हुआ।
ऐसी बदमाशी मकान मालिक की अनुमति के बिना नौकर-चाकर या कर्मचारी या मुलाजिम कतई नहीं कर सकते। निश्चय ही, इसकी सहमति वर्मा या उसके ईमानदार परिवार की रही होगी।
3. समिति ने वर्मा के द्वारा 22 मार्च 2025 के जवाब और बाद के स्पष्टीकरणों को परखा। गवाहों व अन्य सामग्री के सामने उनका जवाब टालमटोल करनेवाला और असंतोषजनक रहा।
अरे भई! जवाब टालमटोल करनेवाला और असंतोषजनक नहीं रहेगा, तो क्या रहेगा? यदि वे टालमटोली नहीं करते हैं और स्वीकार करते हैं कि उनके आवास में नोटों के बंडल थे, वो भी जले, अधजले व बिनाजले; तो उन्हें इनके स्त्रोत बताने की मजबूरी हो जाएगी कि इतना रकम उनके क्वार्टर में आया, तो आया कहां से? क्या यह वैध था आदि।
इस देश में जजों को ईश्वर का दर्जा प्राप्त है। वह जो फैसला देगा, नीर-क्षीर व विवेक के अनुसार सौ प्रतिशत सही होगा। लेकिन क्या ऐसे जजों से न्यायपालिका की छवि धूमिल नहीं हुई? ऊपर से इस जज में इतनी नैतिकता शेष न थी कि तुरंत इस्तीफा दे देते। चोरी पकड़े जाने के एक साल बाद इनकी आत्मा जागी और इस्तीफा दिया। वो भी तमाम दबावों के बाद।
यह भी उतना ही सही है कि जो पकड़ा जाता है, वो चोर कहलाता है और जो बिना पकड़ाए चोरी करता रहता है, वो मूंछें ऐंठकर चलता रहता है। वस्तुतः, चोरी का यह महारोग सबको लग चुका है। कुछ को छोड़कर प्रायः सभी इसी एक सूत्रीय कार्य में लगे हुए हैं। तभी तो कहा जाता है कि हर शाख में उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्ता क्या होगा?
क्या इस प्रकरण से यह साबित नहीं होता कि कार्यपालिका व विधायिका की तरह न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचरण का घुन पूरी तरह से लग चुका है, जो लोगों की जेबें काट रहा है और अपनी तिजोरियां भर रहा है। न्याय में विलंब का यह भी एक बड़ा कारण है।
लिहाजा, देश को बहुत बड़े न्यायिक सुधार की आवश्यकता है, जो न्याय-व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाए और तारीख-दर-तारीख की प्रवृति को बदलकर त्वरित न्याय मुहैया करवाए।
कथन की सच्चाई का आंकलन करना हो, तो आप आज की स्थिति में अपने जिले के किसी भी सेशन कोर्टों, तहसील कोर्टों, एसडीएम कोर्टों, डीएम कोर्टों में चले जाइए। वहां गवाहों की खरीद-फरोख्त का नजारा और मुजरिमों को बचाने का खुला खेल पैसे के दम पर खुलेआम चलता रहता है।
यहां तक कि इन तथाकथित मजिस्ट्रेटों के सामने ही बैठा हुआ कार्यालय सहायक सरेआम पैसे लेता रहता है और न्यायाधीश महाशय उसके खेल को नजरअदाज करते हुए सुनवाई करते रहते हैं। इसी से आभास होता है कि न्यायालयों में कैसे-कैसे षठकर्म नहीं होते होंगे?
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