High voltage drama in Hindi Magazine by Virendra Dewangan books and stories PDF | हाई वोल्टेज ड्रामा

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हाई वोल्टेज ड्रामा

नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे कॉकरोच जनता पार्टी, सोनम वांगचुक, कतिपय छात्र और कांग्रेस सहित कुछेक विपक्षी पाटियों ने 20 जुलाई से आरंभ संसद के मानसून सत्र को 25 जुलाई तक ठप कर रखा था और संसद से सड़क तक हाई वोल्टेज ड्रामा चालू कर दिया था।

नवगठित कॉकरोच जनता पार्टी का दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर 4 जून से घरना-प्रदर्शन जारी था, जो 36 दिन चलने के बाद 37वें दिन सरकार के दो मंत्रियों के साथ हुए समझौते के बाद स्थगित कर दिया गया।

चिंता की बात यह कि इसकी चिंगारी पटना सहित कटिहार, रांची, चंडीगढ़, लखनऊ, रायपुर आदि शहरों में फैल रही थी और कांग्रेस व बीजेपी के कार्यकर्ताओं के आपसी झड़प, लाठीबाजी और हाथापाई के रूप में सामने आ रही थी।

एलओपी राहुल गांधी ने हाई सिक्योरिटी जोन में स्थापित प्रधानमंत्री आवास के सामने धरना तक दे दिया?

संसद में हो-हल्ला और सड़क पर धरना-प्रदर्शन का यह नाटकीय ड्रामा उस पेपर लीककांड पर हुआ, जिसके अधिकतर आरोपी गिरफ्त में हैं, कोर्ट में मामला चल रहा है और नीट की परीक्षा दोबारा सफलतापूर्वक आयोजित की जा चुकी है।

इस बीच तिलचट्टा पार्टी के मोहरा बने लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और नवाचारी सोनम वांगचुक का आमरण अनशन पहले जंतर-मंतर पर तकरीबन 20-22 दिनों तक चला, फिर उनकी बिगड़ती सेहत के मद्देनजर हाईकोर्ट दिल्ली के निर्देश पर उन्हें पहले सरकारी अस्पताल में भरती करवाया गया, फिर मेदांता जैसे निजी हास्पिटल में स्वास्थ्य लाभ के लिए एडमिट करवा दिया गया।

उनकी भी सर्वप्रमुख मांग थी-पेपर लीक मामले में शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होगा, तभी वे आमरण अनशन तोड़ेंगे।

आंदोलन के दौरान यह प्रचारित किया जा रहा था कि नीट पेपर लीक होने से करीब 20 छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। उनके परिवारों को एक-एक करोड़ का मुआवजा दिया जाना चाहिए।

उधर केंद्र सरकार इस मामले में चुप्पी साधी हुई थी। जबकि उसके किसी मंत्री को बहुत पहले ही जंतर-मंतर पहुंचकर आंदोलनकारियों से बात करनी चाहिए थी।

जब तूफान सिर पर आ गया, तब चेती सरकार और मामले में घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री को कहना पड़ गया,‘‘विद्याथियों की चिंता हमारी अपनी है। हम पेपर लीककांड के दोषियों को कड़ी-से-कड़ी सजा फॉस्ट ट्रेक का गठन कर दिलवाएंगे।’’

सवाल यह कि उन्होंने फॉस्ट ट्रेक कोर्ट का गठन पहले क्यों नहीं किया? जबकि यह देश के पढ़े-लिखे युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ का मुद्दा है, जो बार-बार सामने आ रहा है।

वहीं एलओपी ने प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया, ‘‘देश में अभी तक 152 पेपर लीक हुए हैं, लेकिन कंन्विक्शन रेट जीरो है। आज तक किसी दोषी को सही ढंग से सजा तक नहीं हुई है।’’

लेकिन, इन महाशय ने यूपीए शासनकाल में हुए पेपर लीककांड के बारे में नहीं बताया कि तब क्या होता था? बताते, तो सबको असलियत जानने में मजा आ जाता।

यह हास्यास्पद है कि पेपर लीक करनेवालों की सजा इतनी कम रखी गई थी कि मजाक लगता था। महज तीन साल की कैद और 10 लाख रुपया जुर्माना!

जबकि पेपर लीक करनेवाले शातिर लोग हर लीक में 50 लाख रुपये से अधिक कमा चुके होते हैं। ऐसे में, ऐसे लोगों के लिए 10 लाख जुर्माना अदा करना कौन-सी बड़ी राशि थी?

लिहाजा, पेपर लीक-पर-लीक होता रहता था। लीक करनेवाले पैसा बनाते रहते थे; छात्र आत्महत्याएं करते रहते थे; अभिभावक परेशान रहते थे और सरकारें है कि बेखटके चलती रहती थी।

जबकि लीककांड के दोषियों का जुर्माना 1 करोड़ रुपया से कम नहीं होना चाहिए, ताकि दोषियों के घर-द्वार, खेत-खलिहान व दुकान बिक जाए और वे रोड पे आ जाएं। अर्थात कानून से डर लगे, तो बात बने।

ऐसी बात नहीं कि यूपीए शासित राज्यों में पेपर लीक नहीं होते थे। उनके समय में भी खूब हुए हैं। पर, कांग्रेस है कि वह गैर-कांग्रेस शासित केंद्र व राज्यों के आग में घी डालकर उसमें अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना चाहती है।

राजस्थान में पेपर लीककांड को लेकर कांग्रेसी सचिन पायलट ने अशोक गेहलोत की सरकार को लंबे समय तक घेर रखा था। पर, एलओपी को इतिहास याद नहीं रहता शायद।

दरअसल, एलओपी को अपनी लगातार हार के मद्देनजर उसको कोई ठोस मुद्दा सूझ नहीं रहा था। वह छात्रों, सोनम वांगचुक और सीजेपी की आढ़ में अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने की जुगत जमा रहा था।

पर, सरकार ने एंटी पेपर लीक संशोधन बिल-2026 लाकर व तीन दिनों में पारित करके उससे यह मुद्दा छीन लिया। वहीं, आधार के रचयिता नंदन नीलेकणि की अगुआई में हाई पावर टॉक्स फोर्स कमेटी का गठन कर दिया।

यही हाल केजरीवाल एंड पार्टी और समाजवादियों का है। केजरीवाल एंड पार्टी को दिल्ली की जनता ने न केवल नकार दिया है, अपितु उसको कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था कि अपना स्पेस बढ़ाए और राजनीति फिर से चमकाए।

इसीलिए, इसने छात्रों के इस आंदोलन को हाईजैक कर लिया, ताकि दिल्ली व पंजाब में खोया हुआ जनाधार वापस पा सके। विदित हो अगले साल पंजाब में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं, जहां उसकी पार्टी की हालत मुख्यमंत्री भगवंत मान के ‘‘बेअदबी मामले’’ को लेकर बेहद पतली हो चुकी है।

ऐसा ही हाल समाजवादियों का है। जंतर-मंतर पर धरने पर बैठनेवालों में-से बहुतेरे लोग यूपी के हैं, जिसका समर्थन लेने के लिए समाजवादी उतावले थे, ताकि 2027 में होनेवाले विधानसभा चुनाव में अपना जनाधार बढ़ा सके।

गौरतलब यह भी कि इस हाई वोल्टेज ड्रामाई आंदोलन में छात्रों के साथ वे अराजक व गुंडा तत्व भी शामिल हो गए थे, जो अर्बन नक्सल, शाहिन बागकांड के जनक, अनुच्छेद 370 के विरोधी, उग्र वामपंथी, राष्ट्र-विरोधी व मोदी-विरोधी हैं।

ऐसे लोग इस आंदोलन में शामिल होकर मोदी तेरी कब्र खुदेगी, भारत तेरे टुकड़े होंगे, असम को भारत से काट देंगे, आरएसएस मुर्दाबाद, हिंदूत्व बर्बाद हो, अल्लाह हो अकबर जैसे नारे पर्दे के पीछे लगा रहे थे।

झारखंड मुक्ति मोर्चा की एक नेत्री का तो इंडिया टीवी के चेनल में आकर यह भी दावा है कि केंद्रीय शिक्षामंत्री के इस्तीफा लेने के बाद ये लोग यहीं नहीं रुकेंगे। इसके आगे भी जाएंगे।

इशारा समझा जा सकता है कि इरादे कितने खतरनाक थे? देश को अराजकता की अग्नि में नेपाल व श्रीलंका की तरह झोंक देना और अच्छी-खासी चल रही सरकार से इस्तीफा मांगना या देशभर में इस कदर चिंगारी फूंक देना कि केंद्र सरकार में बैठे हुए लोग गद्दी छोड़ दें।
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