SCENE 4.
"रास्ते से हटो, रास्ते से हटकर खड़े हो जाओ।" तांगे के आगे की तरफ़ बैठा हुआ एक आदमी ज़ोर ज़ोर से लोगों को अगाही देते हुए आगे बढ़ने लगा। तांगा बिल्कुल राजसी ठाठ-बाट का था सा जिसकी छत चमकदार थी, और पहिये आम तांगे से ख़ासा बड़े। इसके पर्दे नर्म रेशम और ख़ूबसूरत मखमल से बने थे।
तांगे को रास्ता देकर सभी लोग सड़क से हटकर किनारे खड़े हो गए और तांगा दरगाह की दीवार से ध्यान से लगकर रुक गया। उसके पीछे 2, 4 सवारी और रुकी जिसे देख कर लोग समझ गए की किसी शाही घर से दरगाह के लिए सरो-समान आया है मगर कहां से ये पहचान न सके।
दरगाह में शाही घराने से सामान आना यहां के लोगों के लिए कोई ख़ास बात नही थी, ऊंचे घराने के लोग अक्सर दरगाह को समान भेंट दिया करते हैं ताकि वो ज़रूतमंदो तक ब आसानी पहुंच सके।
"मैं अंदर जा रही हुं तारा, तुम ये सभी समान नौकरों की मदद से अंदर पीछे की तरफ़ पहुंचवा देना।" मखमल का पर्दा हटाकर तांगे से उतरते हुए कुसुम ने साथ की ख़ादिमा से कहा और संभालकर उसने अम्मा साहब को भी नीचे उतरवा लिया।
अम्मा साहब इस वक़्त शाही लिबास और शाही आरस्तगी में नहीं थी मगर उनका हुलिया ऐसा था कि लोग उन्हें आला मर्तबा ही समझ रहे थे। कुसुम उनके साथ दरगाह चली गई।
उनके जाने के बाद पीछे वाली सवारी से 1 खादिम तारा की मदद को आ गया, दरगाह का भी एक नौकर फ़ौरन आकर उसकी मदद के लिए आगे बढ़ गया।
हवाएं और तूफ़ानी हो गई, दरगाह के अंदर बिछी चादरें झरोखें खाने लगीं, कई लोग इधर उधर बैठे नज़र आए और कुछ लोग इधर से उधर दौड़ते, काम करते नज़र आए। अम्मा साहब की नज़रें दरगाह के अंदर आते ही किसी को ढूंढने लगी।
दूसरी तरफ़ हाथ में अगरबत्ती और धागा लिए अम्हेल पीर बाबा को ढूंढने लगी, अचानक उसे एहसास हुआ कि किसी की निगाहें एकटक उसपर ही टिकी है, उसने चारो तरफ़ देखा और पाया कि आंगन में खड़ा वो नौजवान उसी तरफ़ निगाहे कीए हुए खड़ा है। उसपर नज़र जाते ही अम्हेल क़रीब लगे दरवाज़े की आड़ में छुप गई
"ये फिर आ गया हमें परेशान करने, आख़िर इसका मसला क्या है? या ख़ुदा कुछ तो करम हो, हम इसकी नज़र में न आएं।" उसने ख़ुद में सोचा
"बिलाल भाईजान वो तो छुप गई।" नौजवान की नन्ही बहन ने अम्हेल को छुपा हुआ देखकर कहा
"मुझे अंदाजा था वायला वो ऐसा ही कुछ करेंगी इसलिए मैने तुम्हे जो समझाया था वो करेंगी अब आप।" पहले से तय बातों को वो समझते हुए शरारती सी मुस्कान देकर अम्हेल की तरफ़ चली गई, दरवाज़े के पीछे से अम्हेल ने फिर से उसे देखा तबतक वायला इसके पास पहुचकर इससे मिन्नतें करने लगी
"सुनिए, मुझे यहां मन्नत मांगना है, उन्होंने कहा आप बताएंगी मुझे, मेरे साथ चलें मुझे समझ नहीं आ रहा की कैसे करूं।"
अभी तक अम्हेल को अंदाज़ा नही था कि वो उसकी बहन है इसलिए अम्हेल ख़ुदा का शुक्र करके उसके साथ जाने लगी "तुम्हे किसके लिए मन्नत मानना है?" अम्हेल ने पूछा
"भाई के लिए।"
"तुम पहली दफ़ा आई हो?"
"मन्नत पहली दफ़ा है।" चलते चलते ये दोनो आँगन से तीन सीढ़ी चढ़कर दरगाह के मज़ार के कमरे के बाहर खड़ी होकर अगरबत्ती जलाने लगीं। तेज़ हवा की वजह से बाहर जलती हुई अगरबत्तीयों के भंडार का धुआं हर तरफ़ उड़ रहा था और बुझी हुई राख़ भी हर तरफ़ फैली थी।
"आप पीर बाबा की जगह पर हैं क्या? मैने सुना है इसे पीर बाबा संभालते है।" वायला ने पूछा
"सही सुना है तुमने, लेकिन बाबा ने यहां की ज़िमेदारी फिलहाल हमें दिया है।"
"आप क्या यहीं रहतीं हैं? आप यहां की तो नहीं लगतीं।" उसने जुस्तुजू जारी रखा
"ह्म्म, हम यहां के नही हैं पर फिलहाल यही मेरा ठिकाना है।"
"तो आप यहां की नहीं है।" उसने कहा फ़िर पूछा "तो फ़िर आप कहां से हैं और यहां क्यों है?" उसकी बढ़ती जुस्तजू अम्हेल की अफ़सुर्दगी के लिए काफ़ी थी। उसने सी अफ़सुर्दगी में वायला से कहा
"कभी कभी हम रास्तों को नही चुनते है बल्कि रास्ते हमें चुन लेते हैं।" वायला ने उसकी बात ध्यान से सुना फ़िर कहा
"आपका अंदाज़ और आपकी बातें ज़ेबाई मालूम हो रहीं हैं। आप यक़ीनन आला मर्तबा ही हैं।"
उसकी बात सुनकर अम्हेल ने उसे ताज्जुबी से देखा। उसका अंदाज़ इतना गहरा और समझ से भरपूर था, अम्हेल ने उसकी उम्र के हिसाब से ये अंदाज़ा नही लगाया था।
"आपका अंदाज़ भी बेश क़ीमती मालूम होता है। क्या आप भी किसी बाला तरीन जगह से हैं?" उसने इस बार अंदाज़न ख़ासा एहतेराम अपनाया। वायला उसकी बात पर ठहर गई
"आप भी?" उसने सोचा फिर कहा "इस जगह पर तो सब बराबर हैं।" उसने कहा और मज़ार की तरफ़ बढ़ गई।
अंदर चारों तरफ़ भीड़ थी, एक तरफ़ औरतें अपने बच्चों के साथ दुआएं और मन्नतें बांधती रही दूसरी तरफ़ आदमियों का झुंड था। मज़ार के अंदर अम्हेल को पीर बाबा भी मिल गए जहां उन्होंने उसे भी मन्नत बांधना याद दिलाया। दोनों अपनी अपनी मन्नत बांध के बाहर निकल गए। वायला अम्हेल के साथ वहीं सीढ़ी के पास बैठ गई
"आपसे बातें करके हमें बहुत अच्छा लगा। आप वाक़ई ख़ूबसूरत बातें करतीं हैं।" कहकर उसने बिलाल की तरफ़ निगाह किया, वो आंगन में खड़ा इन दोनों की तरफ़ ही देख रहा था।
अम्मा साहब भी कुसुम को किसी की तलाश के लिए भेजकर मज़ार की तरफ़ बढ़कर आंगन में आ पहुंची, उनकी नज़र भी बिलाल पर पड़ी और वो अम्हेल की तरफ़ मुतवज्जे था।
इन्होंने उसके क़रीब पहुंचकर अपना ध्यान भी उधर कर लिया जिस तरफ़ इसका ध्यान था। अपनी समझ से अम्मा साहब पूरा माजरा समझ गई और फ़िर बिलाल का ध्यान अपनी तरफ़ कर लिया
"शहज़ादे।" उनकी आवाज़ सुनते ही बिलाल का ध्यान अब अम्मा साहब की तरफ़ हो गया
"बड़ीमां!" उन्हें देखकर उसके चेहरे पर ख़ुशी खिल उठी और वो उनके गले लग गया।
"मैं काफ़ी देर से आपकी तलाश में थी लेकिन शायद मुझे ख़त लिखकर आप कहीं और मश्ग़ूल हो गए हैं।" गले लगने के बाद उन्होंने कहा
"नही बड़ीमां मैं तो आपके ही इंतजार में था।"
"आपने खत में मुझसे यहां आने का ख़ास तक़ाज़ा क्यूं किया था, आपके तक़ाज़े पर मैं काफ़ी मुतजस्सिस-तबीअत हो गई थी।" फिर उन्होंने अम्हेल की तरफ़ निगाह करके कहा "लेकिन अब शायद बात वाज़े हो गई है।"
"मेरी मुलाक़ात यहीं पर हुई उससे, मैं उससे ही आपको आशना करवाना चाहता हूं।"
"आप किसी के लिए इतने मोहतात हैं तो ज़रूर कोई बात होगी। लेकिन आप उसे मुश्ताक़ महल क्यों नहीं ले जाते?" अम्मा साहब ने उसकी बातों को अपने नज़रिए से समझते हुए उससे ये सवाल किया
"मैं चाहता हूं, मगर मन्नत दरगाह आपके महल से जुड़ा हुआ है, मीरास महल से जुड़ा हुआ है इसलिए मैंने आपको ही ख़त लिखना मुनासिब समझा क्योंकि वो आपकी आवाम का हिस्सा है, और अगर मैं उसे ले जाना भी चाहता तो यक़ीनन पीर बाबा इक़रार न करते।"
"ह्म्म्म, यक़ीनन।" उन्होंने कहा और एक बार फ़िर अम्हेल की तरफ़ नज़र कर लिया। वो अभी तक वायला के साथ बैठी बातें कर रही थी।
"मुझे उसकी हालत कुछ बेज़ार लगती है इसलिए मैंने आपको इत्तिला करना मुनासिब समझा।" बिलाल ने कहा
"आप ऐसा क्यों कह रहे है?" अम्मा साहब को माजरा कुछ ख़ास समझ में नही आया "बेज़ार से क्या मुराद है आपको?"
जिसपर बिलाल ने संजीदा लहजा अपना लिया
"एक रोज़ मैं यहां आया था, मैंने इसे अकेले दरगाह में बैठे देखा था वो बिल्कुल गुमसुम थी, उसे किसी के आने जाने का एहसास भी नही हो रहा था, उस वक़्त मेरा ध्यान उसपर गया मगर मैने उसे दर गुज़र कर दिया। उसके बाद 2-3 दफ़ा आया मैं और हर दफ़ा उसको उसी हाल में पाया, उस वक़्त मेरा ज़ेहन उसकी तरफ़ गया फिर मैंने यहां की ख़ादमा से पूछा सबने बताया जबसे आई है ऐसीही है।
किसी ने उससे ये भी कहा कि टूटे दिल के ज़ख्म पर मरहम न लगाकर उसे और कुरेदोगी तो ज़ख़्म और हरे होंगे।"
फ़िर इसके बारे मालूम किया, उन्होंने बताया कि वो उसे क़रीब से जानते हैं और किसी हालात के तहत वो उसे दरगाह लेकर आए थे तक़रिबन कुछ 60 - 65 दिन पहले, और उन्होंने बताया कि मामला कुछ संगीन है इसलिए वो ज़्यादा नही बता सकते।
इनकी ख़ादमा से मालूम हुआ कि गर्मी के आग़ाज़ से ये अपने लोगों से दूर है, उन्हें बहुत याद करती है इसी वजह से ये इतनी गुमसुम रहती है।"
अम्मा साहब ने उसकी सारी बातें ध्यान से सुना "ह्म्म्म, मामला काबिल-ए-ग़ौर है।" उन्होंने संजीदगी से कहा
"और बड़ीमां हालात के तहत मुझे माजरा कुछ और भी गहरा लगता है जिसके बारे में किसी ने कोई ज़िक्र नहीं किया या किसी को इल्म ही नही है।"
"कैसा माजरा?" उन्होंने हैरत से पूछा
"इस बात ने मुझे भी परेशान किया, मैंने चाहा की मैं उनसे मालूम करूं पर वो कभी मुझसे मुख़ातिब नहीं हुईं, और एक दिन यूंही गुस्से में भड़क गई थी, उसने बड़ी बे-ए'तिनाई से मुझसे कहा
"...वीरानी में हम अकेले रहना ज़्यादा पसंद करते हैं। अजनबी जब हमसे क़रीब होते हैं तो हमपर वहशत तारी होने लगती है। इसलिए अभी आप चले जाइए।...." उसने वो पल याद करते हुए बताया
उस वक़्त मुझे उसका लहजा और उसकी आंखें दर्द में डूबी नज़र आई, उसने कहा कुछ था लेकिन उसकी ग़रज़ कुछ थी। उसके बाद ही मैंने आपको ख़त लिखने का फैसला किया।"
"अगर बात इतनी गहरी है तो मैं तफ्तीश जरूर करूंगी।" अब अम्मा साहब की पूरी तवज्जो अम्हेल की दास्तान पर हो गई क्योंकि वो अब ख़ुद ब ख़ुद उनकी आवाम का एक पहलू भी बन चुकी थी। वो अम्हेल से मुलाक़ात करने उसकी तरफ़ चली गई और बिलाल आंगन में ही खड़ा उनकी तरफ़ देखता रहा।
"सलाम बड़ीमां।" वायला उन्हें देखकर एहतरामन फौरन खड़ी हो गई। उसके साथ अम्हेल ने भी लिहाज़ में अपनी जगह छोड़ दिया।
जवाब के बाद अम्मा साहब कि नज़र अम्हेल पर पहुंच गई। अम्मा साहब को देख वायला समझदारी दिखाते हुए ख़ामोशी से बिलाल की तरफ़ चली गई। बिलाल के पीछे कुसुम भी काफ़ी देर से खड़ी थी।
"मैं तुम्हारे साथ बैठ सकती हूं?" उन्होंने शफ़कत से पूछा जिसपर अम्हेल ने हैरान होते हुए हड़बड़ा कर कहा
"आप लायक़-ए-ताज़ीम है। हमारे साथ यहां बैठना उसके बर-अक्स होगा।" उसने संभले अंदाज़ में जवाब दिया।
अम्मा साहब फ़िर भी बैठ गई। वो जगह रास्ते से हट कर दूर पर थी, इसलिए यहां लोगों का शोर कम पहुंच रहा था। ये जो हो रहा था अम्हेल को कुछ ग़ैर मामूल सा लग रहा था, उसे ये भी अंदाज़ा नही था कि ये कौन लोग है जिनके लिए वो अक्सर दरयाफ़्त मौज़ू बनी हुई है, इसलिए वो बैठी नहीं।
"तुम मुझे यहां की मालूम नही होती। तुम्हारा मयार इस कस्बे से जुदा मालूम होता है।" अम्मा साहब बैठते हुए अम्हेल से मुक़ातिब हो गईं, और आख़िर कार अपने साथ बिठा लिया "मुझे पता चला कि तुम बतौर हम-रिकाब मदद करती हो।" उन्होंने कहा
"आपका ख़्याल सही है, हमारा ताल्लुक़ यहां से नही है। ये मंज़िल तक पहुंचे का एक मुख़्तसर सी राहगुज़र है।
"तो तुम्हारी मंज़िल क्या है?"
"हमें अलग अलग लोगों को जानने की, हमारी उन्हें पढ़ने और समझ लेने की ख़्वाहिश। उसकी वजह से हमने यहां आना चुना।" उसने कुछ पल की ख़ामोशी के बाद जवाब बिना ढूँढे दिया
"इतनी कम उम्र में तुम्हे अपने लोगों से दूर होने में डर नहीं लगा? तुम्हारे लोगों ने तुम्हे मना नही किया?"
"हमारे हबाजान अपनी जिंदगी में हमें इजाज़त दे चुके थे, उनकी आख़िरी बात का मान रखते हुए सबने इक़रार कर लिया था।"
"मुझे तुम्हारा शौक़ आशना रु लगा, मुझे भी ऐसे शौक़ होते थे और मेरे बाबा भी उन्हें पूरा करते थे।"
"मेरे बबाजान हमेशा मुझसे कहते थे अलग अलग तरह के लोगों को जानो, पहचानो उन्हें समझो, उनके चेहरे पढ़ना सीखो तो तुम्हारी बहुत सी मुश्किलात आसान हो जाएंगी तुम्हारे लिए। मेरे बाबा हमेशा से ऐसाही चाहते थे।" अम्हेल की बातों से अम्मा साहब चौंक कर कहीं डूब गई और उनके कानों में उनकी पुरानी दुनिया की आवाजें गूंजने लगी
"...........मुझे लोगों के चेहरे पढ़ना बहुत पसंद है, मैं समझती हूं कि लोगों के चेहरे पढ़कर इंसान की बहुत सी मुश्किलात आसान हो जाया करती है.......
..........एक नया मसला, मगर हर बार की तरह मैं ये वाली बात भी नहीं समझ पाया तुम्हारी.........
.............एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब सब समझ जाओगे तुम........ हाहाहा"
"बड़ीमां ......बड़ीमां " अम्हेल की आवाज ने उन्हें उस ख़्वाब से बेदार कर दिया, उनकी आंखें नम हो चुकी थी और उन्होंने एक बेहाली सी अपनाकर संभले लहजे में बिना देर लगाए अम्हेल से पूछा
"तुमने बताया तुम्हारा ताल्लुक़ यहां से नहीं, मुझे बताओ कहां से है तुम्हारा ताल्लुक़?"
"जी?" उनके सवाल पर अम्हेल ने थोड़ी हैरानी जताई
"मुझे तुम मामूली नही लगती। यक़ीनन किसी आली दर्जा घराने से हो। मुझे बताओ किस हवेली से है तुम्हारा ताल्लुक़?"
"आलीपुर की बे लोस हवेली से।" वो किसी को नही बताना चाहती थी ये बात, लेकिन वो ये छुपा कर रख भी नही सकती उसे अंदाज़ा था इसलिए ख़ुद को हमेशा से तैयार रखा था।
"बे लोस हवेली!" अम्मासाब के मुंह से इतनी हैरानी से बे लोस हवेली निकला जैसे उन्होंने कोई नाक़ाबिले यक़ीन बात सुन ली हो, वो अम्हेल के चेहरे को ग़ौर से देखती रही और उनके कानों में फिर से रोती हुई आवाज़ गूंजने लगी
".........नही कर सकते!? क्या मतलब इस बात का? मैं आबजान के साथ तुम्हारी हवेली चली आऊंगी.........
...........नहीं....नही आरज़ू ऐसा मत करना, क्या तुम अपने बाबा के इज्ज़त के लिए ऐसा न करती जो मैने किया, क्या मैने उनके लिए ग़लत किया? मैं अपने बाबा को हरगिज़ रुसवा नही कर सकता। मुझसे वादा करो तुम मेरी इज्ज़त का ख़्याल हमेशा करोगी और मेरे लिए कभी भी बे लोस हवेली नही आओगी। वादा करो मुझसे आरज़ू.... मेरी ख़ातिर..........
........... हां, तुम्हारे लिए मैं वादा करती हूं, हमेशा ख़्याल रखूंगी......."
अम्मा साहब की आंखों से आंसू टपकने लगे, वो हैरानी से आसमान की जानिब देखते हुए खड़ी होकर ख़ुद से बातें करने लगी
"क्या वो वादा इस वक़्त के लिए था? क्या किया हुआ वादा मुझे आज भी निभाना होगा? क्या तुम मुझे आज भी इस क़ाबिल समझते हो वजाहत की मैं पुराने वादे आज भी निभाऊं?" अपने आंसू पोछते हुए वो सोचने लगी "क्या तुम अपनी इज़्ज़त मेरे हवाले कर के चले गए हो? अगर वाक़ई ऐसा है तो मैं निभाऊंगी, मैं कैसे हट जाऊं उन वादों से पीछे? ये भी तुम्हारी इज्ज़त है जिसका मैं ख़्याल रखूंगी तुम्हारा वादा समझकर।"
उनके दिल में दर्द का सैलाब उठ चुका था। अम्मा साहब ने अपने बहते आंसू पोंछ लिए और अम्हेल की तरफ़ मुड़ गई, अम्हेल उन्हें ध्यान से देख रही थी पर उसे कुछ समझ नहीं आया, अम्मा साहब उसे लेकर मज़ार पर चली गई। दूर दर पर बैठे बिलाल, कुसुम और वायला उन्हें साथ जाते हुए देख रहे थे।