सुबह का समय — हवा में धुंध, जंगल के पेड़ों के बीच से सूरज की किरणें छनकर आ रही हैं।
सिया और कबीर हाथों में मशाल लिए सावधानी से चलते हुए जंगल से बाहर निकल रहे हैं।
चारों तरफ़ पक्षियों की आवाज़ें हैं, पर माहौल में अब भी डर और रहस्य है।)
सिया (धीरे से, चलते हुए) बोली -
“कबीर जी… अब हम कहाँ जा रहे हैं?”
कबीर (गंभीर आवाज़ में) बोला -
“अब हमें पता लगाना है कि ये ज़ॉम्बी आए कहाँ से।
जब तक उनकी जड़ नहीं मिलेगी, तब तक ये खत्म नहीं होंगे।”
(सिया उसकी ओर देखती है — उसके चेहरे पर दृढ़ निश्चय साफ झलक रहा है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“मतलब… ये सब किसी ने किया है?”
कबीर (सिर हिलाते हुए) बोला -
“हाँ… किसी ने। ये सामान्य नहीं है सिया।
कोई बहुत ताक़तवर तांत्रिक या वैज्ञानिक… जो जीवन और मृत्यु से खेल रहा है।
हमारे शहर के पास जो पुरानी लैब थी — ‘Project Dark Rebirth’ — मुझे लगता है, सुराग वहीं मिलेगा।”
(सिया हैरान होकर उसकी ओर देखती है।)
सिया बोली -
“वो जगह तो सालों पहले बंद हो गई थी न?”
कबीर बोला -
“बंद नहीं… छिपाई गई थी।”
(दोनों जंगल से बाहर निकलते हैं — सामने दूर पहाड़ियों के पार एक जर्जर इमारत दिखाई देती है, जहाँ से हल्का धुआँ उठ रहा है।
वो जगह वीरान है, पर अंदर से कुछ हल्की हरकतें सुनाई देती हैं।)
‘Project Dark Rebirth’ लैब के बाहर
(टूटी दीवारों पर अजीब संकेत बने हैं — खून से लिखे कुछ मंत्र और वैज्ञानिक सूत्र।
चारों तरफ़ मृत शरीर पड़े हैं जो अधजले हैं, पर कुछ की आँखें अब भी खुली हैं।)
सिया (घबराते हुए) बोली -
“कबीर जी… ये तो भयानक जगह है… क्या यहीं से सब शुरू हुआ था?”
कबीर (धीरे से चारों ओर देखते हुए) बोला -
“हाँ… और अब हमें इसके अंदर जाना होगा।
यहीं वो जवाब मिलेगा — कि आखिर किसने इंसानों को राक्षस बनाया।”
(वो दोनों सावधानी से अंदर कदम रखते हैं। अंदर चारों तरफ़ टूटे टेस्ट ट्यूब, केमिकल्स और दीवारों पर टंगे मांस के टुकड़े हैं।
हवा में सड़ांध फैली है।)
सिया (नाक पर हाथ रखकर) बोली -
“ये तो किसी नरक से कम नहीं…”
कबीर (धीरे से) बोला -
“नरक नहीं… यही वो जगह है जहाँ नरक को बनाया गया।”
(वो एक कमरे में पहुँचते हैं — वहाँ एक पुराना कंप्यूटर जलता हुआ दिखाई देता है। स्क्रीन पर लाल अक्षरों में लिखा है —)
> “EXPERIMENT NO. 666: HUMAN TO ZOMBIE TRANSFORMATION SUCCESSFUL.”
(सिया के चेहरे से रंग उड़ जाता है।)
सिया (डरी हुई आवाज़ में) बोली -
“मतलब… किसी ने ये सब जानबूझकर किया?”
कबीर (गुस्से में, मुट्ठियाँ भींचते हुए) बोला -
“हाँ… और अब मैं उस इंसान को ढूँढकर खत्म कर दूँगा जिसने ये किया है।”
(कैमरा कबीर के लाल होते हुए चेहरे पर ज़ूम करता है — उसकी आँखों में आग और सिया की आँखों में डर दोनों दिखते हैं।
पीछे से दरवाज़ा अपने आप बंद हो जाता है… “ठक!” की आवाज़ के साथ।)
“सवाल अब साफ़ था — ये दानव कोई बीमारी नहीं थे… ये किसी की रचना थे।
और अब कबीर और सिया उस रचयिता की खोज में थे… जिसने इंसानियत को मौत से भी बदतर बना दिया।”
(“Project Dark Rebirth” लैब का सबसे अंदरूनी कमरा।
बाहर की हवा ठंडी है, लेकिन अंदर की दीवारों से गरम धुआँ निकल रहा है।
टूटी बोतलें, तारें और ज़मीन पर बिखरे खून के निशान सब कुछ बयान कर रहे हैं कि यहाँ कभी कुछ भयानक हुआ था।)
( दोनों टॉर्च लिए एक लंबे गलियारे में बढ़ रहे हैं।)
सिया (धीरे, काँपती आवाज़ में) बोली -
“कबीर जी… मुझे डर लग रहा है… ये जगह ठीक नहीं लग रही…”
कबीर (गंभीर स्वर में) बोला -
“डरना मत सिया… जो भी यहाँ छिपा है, अब वो बच नहीं पाएगा।”
(दोनों आगे बढ़ते हैं — तभी एक दरवाज़े के पीछे से “घूंऽऽऽ…” जैसी अजीब आवाज़ आती है।)
सिया (चौंककर) बोली -
“वो… आवाज़ सुनी आपने?”
कबीर (धीरे) बोला -
“हाँ… यहीं से आई है।”
(वो धीरे से दरवाज़ा खोलता है — अंदर जो दृश्य है, उसे देखकर सिया के मुँह से चीख निकल जाती है।)
(दीवारों से कई इंसान बाँधे हुए हैं। उनके शरीर पर पाइप्स और तारें लगी हैं, आँखें सफ़ेद हैं, मुँह से खून बह रहा है।
कुछ कराह रहे हैं, कुछ हिल नहीं पा रहे। सब के सब “ज़ॉम्बी” बन चुके हैं — पर आधे जिंदा हैं।)
सिया (भयभीत होकर, हाथ मुँह पर रखते हुए) बोली -
“हे भगवान… ये लोग तो ज़िंदा हैं… पर ये क्या बन गए…”
कबीर (दाँत भींचते हुए) बोला -
“इन पर किसी ने प्रयोग किया है… इंसान से दानव बनाने का प्रयोग।”
(तभी एक कोने से धीमी आवाज़ आती है — कोई हँस रहा है।
आवाज़ metallic और डरावनी है।)
आवाज़ (गूंजती हुई) बोली -
“स्वागत है… कबीर… या कहूँ करण?”
(दोनों मुड़कर पीछे देखते हैं — धुएँ में से एक आकृति उभरती है।
सफेद कोट पहने, पर आधा चेहरा सड़ चुका, आँखें लाल, और शरीर का आधा हिस्सा मशीनों से जुड़ा हुआ।)
कबीर (गुस्से से) बोला -
“तू कौन है?”
वैज्ञानिक (धीरे, डरावनी मुस्कान के साथ) बोला -
“नाम याद नहीं लोगों को… पर तूने मुझे कभी डॉक्टर रुद्रान्श कहा था।”
(कबीर का चेहरा सख्त हो जाता है — आँखों में पहचान की चमक।)
कबीर (आश्चर्य और गुस्से में) बोला -
“डॉ. रुद्रान्श… तू मरा नहीं था?”
रुद्रान्श (ठंडी हँसी के साथ) बोली -
“मरना विज्ञान की असफलता है, करण…
मैं तो बस अपने प्रयोग का हिस्सा बन गया हूँ।”
(वो धीरे-धीरे आगे बढ़ता है — उसकी चाल अजीब है, जैसे इंसान और मशीन दोनों मिलकर चल रहे हों।)
सिया (डर से पीछे हटते हुए) बोली -
“तुमने ये सब क्यों किया? ये लोग क्या कसूरवार थे?”
रुद्रान्श (ठंडी, विकृत आवाज़ में) बोला -
“इंसान मरते हैं… कमजोर पड़ते हैं…
मैंने उन्हें अमर बना दिया…
ना मौत, ना बीमारी… बस अनंत जीवन…”
कबीर (गुस्से से चिल्लाकर) बोला -
“ये अमरता नहीं — ये शाप है!”
रुद्रान्श (धीरे से मुस्कुराकर) बोला -
“शाप? या वरदान?
क्योंकि तुझमें भी वही खून है, करण…
तू भी आधा इंसान, आधा शैतान…
और ये लड़की… ये तो मेरे प्रयोग का परफेक्ट विषय थी…”
(कबीर आगे बढ़कर उसका गला पकड़ लेता है, लेकिन रुद्रान्श की मशीन वाली बाजू कबीर की गर्दन पकड़ लेती है।
दोनों के बीच ज़बरदस्त टकराव होता है — बिजली की चिंगारियाँ उड़ती हैं।)
सिया (चिल्लाकर) बोली -
“कबीर जी!!”
(सिया भागकर पास रखी पाइप उठाती है और रुद्रान्श के कंधे पर मारती है।
रुद्रान्श पीछे हटता है, उसके तार टूटते हैं। उसकी मशीन से चिंगारी निकलती है।)
रुद्रान्श (गरजते हुए) बोला -
“तुम नहीं जानते सिया… तुम कौन हो…
तुम मेरी ही बनाई गई हो!!”
(सिया हक्की-बक्की रह जाती है।)
सिया (सदमे में) बोली -
“क्या…?? मैं… तुम्हारी बनाई गई…??”
(कबीर उसे पकड़कर पीछे खींचता है, चिल्लाकर कहता है —)
कबीर बोला -
“झूठ बोल रहा है! ये तुम्हारा मनोबल तोड़ना चाहता है!”
(रुद्रान्श दहाड़ मारकर हँसता है —)
रुद्रान्श बोला -
“सच और झूठ में फर्क अब खुद जान जाओगी… क्योंकि अगला चरण शुरू हो चुका है…”
(कमरे की दीवारें लाल चमकने लगती हैं।
ज़ॉम्बी बंधनों को तोड़ने लगते हैं।
कबीर सिया को पीछे धकेलता है — और स्क्रीन काले पर्दे में बदल जाती है।)
“रुद्रान्श की हँसी उस रात बहुत देर तक गूँजती रही…
क्योंकि अब खेल की अगली चाल सिया के अतीत से जुड़ी थी —
एक ऐसा सच, जो सबकुछ बदल देगा…”
वही भूमिगत लैब। चारों ओर आग और धुआँ फैला हुआ है।
मशीनें एक-एक कर फट रही हैं। ज़ॉम्बीज़ जलते हुए गिर रहे हैं।
बीच में कबीर उर्फ़ करण खड़ा है — आँखों में खून जैसा गुस्सा।
सिया एक कोने में है, सदमे और डर से भरी हुई।)
रुद्रान्श (हँसते हुए, आधा झुलसा हुआ) बोला -
“हा हा हा… अब सब जान ही ले सिया…
तू इंसान नहीं है… ‘अमृत प्रोजेक्ट’ की पहली सफलता है तू…
एक ऐसी रचना — जो मर नहीं सकती…”
(सिया के चेहरे का रंग उड़ जाता है। उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं।)
सिया (काँपती आवाज़ में) बोली -
“क्या? नहीं… ये झूठ है… मैं… मैं इंसान हूँ…”
रुद्रान्श (हिस्सी आवाज़ में) बोला -
“पूछ लो… अपने करण से…”
(कबीर की आँखें चौड़ी हो जाती हैं। सिया धीरे-धीरे उसकी तरफ़ मुड़ती है।)
सिया (टूटे स्वर में) बोली -
“कबीर जी… वो ‘करण’ कौन है?
वो नाम मुझे सपनों में सुनाई देता है…
रुद्रान्श ने अभी तुम्हें उसी नाम से पुकारा…”
(कबीर कुछ पल चुप रहता है। सन्नाटा गहरा जाता है।
पृष्ठभूमि में आग की चटक सुनाई देती है।)
कबीर (धीरे, ठंडी आवाज़ में) बोला -
“वो सब पुरानी बातें हैं सिया… उसका अब कोई मतलब नहीं…”
सिया (कठोर होकर) बोली -
“मतलब नहीं?
अगर मैं सच जानना चाहती हूँ तो आप चुप क्यों हो जाते हो?
आप क्या छिपा रहे हो मुझसे, कबीर जी?”
(कबीर नज़रें झुका लेता है। रुद्रान्श मुस्कुराता है, जैसे उसके झूठ ने काम कर दिया हो।)
रुद्रान्श (धीरे, ताने के साथ) बोला -
“देखा… सच्चाई कितना ज़हर होती है…
जिसे तुम प्यार कह रहे थे, वो तो एक प्रयोग था…”
(सिया का दिल काँप जाता है। उसकी आँखों में आँसू हैं।)
सिया (धीरे) बोली -
“तो… मैं एक प्रयोग हूँ?
मेरे भाव, मेरा प्यार… ये सब झूठ?”
(कबीर आगे बढ़ता है, उसकी आँखों में दर्द है।)
कबीर बोला -
नहीं सिया! मैं तुझसे प्यार करता हूँ…
तू इंसान है… तेरी रूह पवित्र है… वो बस तुझे तोड़ना चाहता है!
(रुद्रान्श हँसता है और अपनी मशीन वाली बाँह से कबीर पर हमला करता है। कबीर हवा में उछलकर उसकी गर्दन पकड़ लेता है।)
कबीर (गुस्से में) बोला -
बहुत झूठ बोला तूने!! अब बस!!
(उसके हाथ से लाल ऊर्जा निकलती है, जो रुद्रान्श के शरीर को जलाने लगती है। रुद्रान्श चीखता है, आग की लपटों में घिर जाता है।)
रुद्रान्श (चिल्लाते हुए) बोला -
तू नहीं जानता… सच्चाई अभी बाकी है… करण!!
(वो राख बन जाता है। उसकी मशीनें फट जाती हैं। लैब का आधा हिस्सा ढह जाता है।)
(रात का समय। चाँद बादलों में छिपा है। सिया दूर खड़ी है, हाथों में खून और आँखों में आँसू। कबीर उसके पास आता है।)
कबीर (धीरे) बोला -
“सिया… जो कुछ उसने कहा वो सब झूठ था…”
सिया (ठंडी आवाज़ में) बोली -
“तो सच क्या है, कबीर जी?
आप नाम करण क्यों लिया उसने?
क्यों मेरे सपनों में वही नाम आता है?
क्या आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”
(कबीर कुछ पल चुप रहता है, फिर नज़रें झुका लेता है।)
कबीर (धीरे) बोला -
“कभी-कभी सच्चाई बताने से रिश्ते टूट जाते हैं…”
सिया (आँसू रोकते हुए) बोली -
“तो रहने दो कबीर जी… शायद हमारा रिश्ता पहले ही टूट चुका है…”
(वो पलटकर चल देती है। कबीर बस खड़ा रह जाता है, उसके चेहरे पर एक गहरी पीड़ा है।)
“रुद्रान्श मर चुका था…
पर उसके छोड़े हुए झूठ ने कबीर और सिया के बीच एक दीवार खड़ी कर दी थी।
एक ऐसी दीवार… जिसे अब या तो सच्चाई गिराएगी —
या फिर वही दोनों को हमेशा के लिए अलग कर देगी…”