Santosha in Hindi Motivational Stories by Wajid Husain books and stories PDF | संतोषा

Featured Books
Categories
Share

संतोषा

वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी

उन दिनों सरकारी स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं होते थे, वे समाज का आईना भी होते थे। वहां शिक्षा सिर्फ सर्टिफिकेट का ज्ञान नहीं थी, बल्कि आदमी बनने की तमीज़ भी सिखाई जाती थी। उनमें व्यवसायिकता की लाइलाज बीमारी नहीं घुसी हुई थी, जहां किताबें भी होती थी और अध्यापक पढ़ते- पढ़ाते भी थे, सो छठी से शुरू होने वाली अंग्रेज़ी पर भी पकड़ बना लेते थे। 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रिठौरा गांव के जूनियर हाई स्कूल में एक ऐसे ही मास्टर थे- अब्दुल रहमान, -शेरवानी- पायजामा पहनावा, छरहरे बदन के। आंखें चीते जैसी-दूर से ही शिकार पहचानना। उनके चमड़े के जूते की चर्र-चर्र गूंजती और सन्नाटा छा जाता था। उनके हाथ में एक बेंत रहता था, जिसे वे बड़े प्यार से "मनसुखा" कहते थे। मनसुखा स्कूल के उद्दंड विद्यार्थियों पर क़हर ढाता था।

एक दिन गांव का मोची अपने लड़के को स्कूल लेकर लाया। आवाज़ में लाचारी थी-"मास्टर साहब...खाल-खाल आपकी...हड्डी-पसली हमारी... बस इसे आदमी बना दो।"

संतोष उद्दंड था।-"स्कूल की छोटी दीवारें फांदना और बाहर की दुनिया में मटरगश्ती करना उसका नित्यकर्म था।"

मास्टर साहब ने उसे और उसके दो दोस्तों को कक्षा में रोकने की नियत से मुर्गा बना दिया और पढ़ाने लगे। संतोष ने अपने अगल-बगल के मुर्गो के कोहनी मारी। वे गिर पड़े। कक्षा में हंसी गूंजी।

 मास्टर का चेहरा कठोर हो गया वह उसे मारने को बढ़े। संतोष भाग गया। मास्टर चिल्लाया-"संतोषा रूक।" उसने अपने हाथ का डस्टर फेंक कर उसके मारा जो उसके माथे पर लगा। ख़ून बह निकला-वह गिर गया- बेहोश। क्षण भर में माहौल बदल गया।

मास्टर साहब दौड़े। उसे उठाया-जैसे अपना ही बच्चा हो।  घाव साफ किया, पट्टी बांधी, हल्दी वाला दूध पिलाया और उसके सिरहाने बैठ गए। 

उनकी आंखों में ग्लानी थी-जैसे किसी ने अंदर से झकझोर दिया हो।

 जब संतोष की आंख खुली, तो उसने पहली बार उस आदमी को देखा-जिससे वह डरता था, और उसी वक्त-उस आदमी ने बेटा संतोष कहकर उसके माथे को सहलाया।

शायद उसी छड़ कुछ बदल गया। 

अगले दिन वह सबसे पहले स्कूल पहुंचा। उसके अंदर एक अजीब सी खाली जगह थी। वह कक्षा में खड़ा था, जैसे अपनी जगह तलाश रहा हो।

कक्षा में एक लड़की थी- शोभा जाटव। उसने नर्म आवाज़ से कहा-"चोट लगी है, बैठता क्यों नहीं?" 

संतोष ने रूंधे गले से कहा-"आगे कोई बैठाना नहीं चाहता, पीछे मैं बैठना नहीं चाहता।"

शोभा बिना कुछ कहे अपनी जगह से थोड़ा खिसक गई- "यहां बैठ जा।"

बस इतना ही। न सहानुभूति न उपदेश-सिर्फ जगह। 

उसी दिन से एक नई कहानी शुरू हुई।

  साथ बैठना, साथ खाना, साथ खेलना। कभी संतोष प्रथम आता, शोभा द्वितीय रह जाती। कभी इसका उल्टा होता। उनके बीच कोई मुक़ाबला नहीं था-सिर्फ एक साझा यात्रा थी। एक साझा कहानी थी। फिर मिडिल की परीक्षा के बाद दोनों दोस्त बिछुड़ गए।

 वर्षों बाद हेड मास्टर रिटायर हुए। आंखों की चमक अब थकान में बदल गई थी। वे पेंशन के लिए दफ्तरों के चक्कर लगा रहे थे -हर टेबल पर एक बाबू था-और हर बाबू के हाथ में अदृश्य "मनसुखा।" रिश्वत देने से मना करने का मतलब था-फाइल रुकना। आख़िरकार वे सचिवालय शिकायत के लिए गए।

उन्होंने एक स्लिप पर लिखा-"अब्दुल रहमान-रिटायर्ड हेड मास्टर रिठौरा... कार्य पेंशन संबंध। चपरासी ने स्लिप साहब को दी। उन्होंने तुरंत हेड मास्टर साहब को अंदर बुलाया। उनके पैर छूकर हाल-चाल पूछा। 

अब्दुल रहमान ने विस्मित होकर कहा-"मैं आपको पहचाना नहीं ...।"  

साहब ने अपने माथे की तरफ इशारा किया-पुराना निशान- "याद है...?"

हेड मास्टर की नज़र में जैसे समय लौट आया -"संतोष...!"

साहब ने श्रद्धा से कहा- "नहीं सर...संतोषा!"

साहब ने ऑफिस सुपरीटेंडेंट को बुलाकर तुरंत पेंशन की फाइल पास करने का आदेश दिया।

उन्होंने हेड मास्टर साहब से कहा- होली पर गांव आऊंगा तो आपसे मिलने आऊंगा।

संतोष साहब होली पर गांव पहुंचे। वह मास्टर से मिलने उनके घर गए। औपचारिक बातचीत के बाद उन्होंने आह भर कर कहा-" गांव वालों का तिरस्कार और अवेलहना झेलते झेलते में उद्दंड हो गया था। मुझे जीवन में पहली बार प्यार मिला था,"आपसे।" उस प्यार की बदौलत आज मैं इस कुर्सी पर बैठा हूं... नहीं तो मैं भी अपने पापा की तरह जूते गांठ रहा होता या इससे भी बुरे हाल में होता?"

 बातों- बातों में शोभा का ज़िक्र आया। "बहुत होनहार थी..." मास्टर साहब बोले। एम.बी.बी.एस में चयन गांव के लिए चमत्कार था। यह कुछ लोगों के लिए गर्व... कुछ के लिए जलन।" 

डॉक्टरी का कोर्स पूरा करने के बाद उसे सरकारी अस्पताल में हाउस जॉब मिला। कोरोना के एपिडेमिक के दौरान उसे मरीज़ों की सेवा करने का मौक़ा मिला। उसने दिन-रात काम किया। सैकड़ो की जान बचाई। सीनियर डॉक्टर  उसका काम देखकर हैरान थे। उसके बाद उसकी नौकरी लग गई परंतु वह उसकी स्थाई सेवा नहीं थी। आपात संकट टलते ही उसे छुट्टी दे दी गई और वह घर जा बैठी।

कुछ दिन बाद स्वास्थ्य मंत्री ने प्रदेश भर के जूनियर डॉक्टरों के रिकॉर्ड मंगवाए। कोरोना काल में विशिष्ट सेवा करने वाले वाले सफल डॉक्टर के लिए सरकारी अस्पताल में स्थाई भर्ती का शासन आदेश निकाला। 

जिन घरों में पत्र पहुंच रहे थे, वहां खुशियां पहुंच रही थी। परंतु शोभा को नियुक्ति पत्र नहीं पहुंचा। 

उधर मौके की घात लगाए बैठे गांव के दबंगों ने मंत्रणा की। "हां भाई, इव तो मौका आ गया, जूते गाठने वालों को औकात में लाने का? वरना पैरों की जूती सिर पर चढ़ेगी!"

"ताऊ मैंने तो समझा, इव हम के करें?" चौधरी के बिगड़ैल भतीजे ने पूछा था। 

"करना कि है, पास गांव के डाकघर में डाकिया अजय पाल बैठा है, उसने मेने बताया है कि डॉक्टर शोभा जाटव की चिट्ठी आई हुई है, वह तो खुद ही शेड्यूल कास्ट से खार खाए रहता हैं। उसको ज़रा चढ़ाओ। फाड़-फूड़ कर चूल्हे में डाल देगा, चिट्ठी पत्री।"

डाकिया लिफाफा देखकर ही भांप गया था। दबंग की इच्छा पूर्ति करने का वचन याद आते ही वह ईर्ष्या की आग में जल उठा। लिफाफा खोला। पत्र अंग्रेज़ी में था। वह उसे लेकर  मुंशी रमज़ान अली के पास पहुंचा। मुंशी जी ने पढ़ा- "शोभा जाटव का सरकारी डॉक्टर के रूप में चयन...पंद्रह मार्च  तक ज्वाइन करना है-"तुमने यह पत्र अब तक दिया क्यों नहीं?"

डाकिया तैश में आ गया और और मुंशी जी के हाथ से पत्र झटक कर ले लिया‌।

जब संतोष को यह बात पता चली-उसमें पुराना "संतोषा" जाग उठा। 

वह सीधे डाकिए के घर पहुंचा। आवाज़ में पुरानी आग थी। परिचय दिया फिर सीधा सवाल दागा-"शोभा जाटव का नियुक्ति पत्र कहां है?"

डाकिया बोला-"मैं नहीं जानता यह किस शैतान की शैतानी है। मेरे डाकघर तक आते-आते डाक न जाने कितने डाकघर से गुज़र कर आती है।"

 उसने डाकिए का ग्रैवान पड़कर खींचा- "मैं तुझे सबक सिखाऊ या दलित एक्ट में बंद कराऊं? अक्ल ठिकाने आ जाएगी।"

डाकिया हकलाया। तभी उसकी पत्नी बाहर आई। उसके हाथ में मला हुआ लिफाफा था। उसने साहब को लिफाफा देते हुए कहा-"यह दोषी है। इसने मुझे यह लिफाफा आग के सुपुर्द करने को दिया था।"  फिर वह पति से बोली- "पांव पड़कर माफी मांग लो। साहब पढ़े लिखे बहुत ही सज्जन इंसान है, तुम्हें माफ कर देंगे। तुम सीधे जेल जाओगे और भुगतुंगी मैं। किया तुमने, भरेंगे मेरे बच्चे और मैं।"

डाकिए ने साहब के पैर पड़कर माफी मांगी।

संतोष ने लिफाफा खोला। तारीख देखते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया-"कल ज्वाइन करने का आख़िरी दिन है..."

शोभा को साथ लिया। दोनों दौड़े। बस, ट्रेन, सड़क-सब पार करते हुए लखनऊ पहुंचे। समय रहते शोभा ने ज्वाइन कर लिया।

गांव लौटकर दोनों ने मास्टर साहब के पैर छुए। मास्टर साहब ने दोनों को देखा उनकी आंखों में चमक आई। तुरंत उन्होंने आसमान की ओर नज़र घुमाई, धीरे से कहा-"समय बदल गया है... लोग भी बदल गए हैं... बस यह गांव है, जहां इंसान की औक़ात उसके काम से नहीं उसकी ज़ात से तय होती है।"

348 ए, फाइक एंक्लेव, फेस 2, पीलीभीत बायपास, बरेली (उ प्र) 243006 मो :9027982074 ईमेल wajidhusain963@gmail.com