ध्रुव की तारा
भाग - ९
लेखिका "अनामिका"
बोर्ड एग्ज़ाम्स सिर पर आते ही तारा ने अपना ट्यूटर अवतार ऑन कर लिया था, क्योंकि अपनी स्विमिंग प्रैक्टिस में बिज़ी रहने की वजह से ध्रुव पढ़ाई पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे रहा था। अपनी 10th की तैयारी के साथ-साथ तारा रोज़ शाम को ध्रुव को 12th की किताबें खोलकर अपने सामने बिठा लेती। ध्रुव जब भी पेन उँगलियों में घुमाते हुए बोरियत से खिड़की के बाहर ताकने लगता, तो तारा ज़ोर से रजिस्टर मेज पर पटककर उसका ध्यान खींचती। ध्रुव चिढ़कर बड़बड़ाता, "अरे यार तारा! पास तो हो ही जाऊँगा, 12th बोर्ड ही तो है। वैसे भी मुझे स्विमर ही बनना है और आगे स्पोर्ट्स कोटा से एडमिशन मिल जाएगा, फिर इतनी चिकचिक क्यों?"
तारा गरमा-गरम चाय का कप उसकी तरफ खिसकाते हुए तुरंत टोकती, "अगर स्पोर्ट्स कोटा से भी नेशनल लेवल के अच्छे कॉलेज में जाना है न, तो कट-ऑफ क्लियर करने लायक बेस मार्क्स लाने ही पड़ेंगे। वरना कोई भी अच्छा कॉलेज तुम्हें एडमिशन नहीं देगा, समझे?"
ध्रुव मुंह बनाते हुए फिर से किताबों में सिर गड़ा लेता। पर देर रात पढ़ते-पढ़ते जब ध्रुव की आँखें भारी होने लगतीं और वह मेज़ पर ही झपकी लेने लगता, तो तारा का डाँटने वाला हाथ अचानक थम जाता। वह धीरे से अपनी उँगलियों से ध्रुव के माथे पर बिखरी लटों को पीछे करती और कुछ पलों के लिए बस उसे निहारती रह जाती। ध्रुव की थकी हुई आँखों और मासूम चेहरे को देखते हुए तारा के दिल में एक अजीब सी हलचल होती। वह खुद इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि ध्रुव की इतनी फ़िक्र करना और उसकी हर छोटी बात पर ध्यान देना महज़ दोस्ती नहीं, बल्कि उसके दिल के किसी अनछुए कोने में पनपता हुआ प्यार था—एक ऐसा अहसास जिससे वह अब तक बिल्कुल बेखबर थी। दोनों की यह तीखी नोक-झोंक, रात के सन्नाटे में एक-दूसरे का साथ, चाय की चुस्कियाँ और एग्ज़ाम्स के तनाव के बीच का यह खट्टा-मीठा सफ़र बोर्ड्स की आखिरी परीक्षा खत्म होने तक यूं ही चलता रहा।
बोर्ड्स खत्म होते ही ध्रुव ने सबसे पहले अपनी स्विमिंग प्रैक्टिस पर पूरा जोर लगा दिया। ढलती शाम में ध्रुव पूल की ठंडी लहरों को चीरते हुए लैप्स लगा रहा था, जबकि तारा पूल के किनारे बैठकर पानी में पैर डुबोए उसे देख रही थी। पानी से बाहर आकर तौलिए से बाल पोंछते हुए ध्रुव ने कहा, "अब बस अगले हफ्ते वाला स्टेट-लेवल स्विमिंग कॉम्पिटिशन क्लियर हो जाए तारा! अगर उसमें फर्स्ट आ गया न, तो मनपसंद कॉलेज में स्पोर्ट्स कोटा पक्का है। फिर बोर्ड्स में बस पासिंग मार्क्स भी आ जाएँ तो चलेगा।"
तारा ने उसकी तरफ पानी का छींटा मारते हुए मुस्कुराकर कहा, "सपने तो बड़े-बड़े देख रहे हो ध्रुव, लेकिन कॉम्पिटिशन में जाने के लिए आंटी को कौन मनाएगा? वो तो तुम्हें स्पोर्ट्स से ज़्यादा पढ़ाई पर ध्यान देने को कहती हैं।"
ध्रुव ने आँख मारते हुए धीरे से कहा, "अरे, उसकी चिंता मत कर! मम्मी को तो पापा चुपके से मना ही लेंगे, आखिर उनका फुल सपोर्ट जो है मेरे साथ।"
कॉम्पिटिशन का दिन आ ही गया। स्विमिंग कॉम्प्लेक्स में भारी भीड़ थी और ध्रुव का नाम पुकारा जाने वाला था। ध्रुव बार-बार एंट्री गेट की तरफ देख रहा था। तारा ने उसका हाथ थामकर आश्वस्त किया, "ध्रुव, तुम बस अपनी रेस पर ध्यान दो। अंकल ने वादा किया है कि वो आंटी को मनाकर ज़रूर लाएंगे, वो लोग रास्ते में ही होंगे।"
उधर दूसरी तरफ, ध्रुव के पापा मम्मी को बेमन से ही सही, तैयार करके घर से निकलने ही वाले थे कि अचानक आंटी ने अपना पेट पकड़ लिया और असहनीय दर्द से कराहते हुए ज़मीन पर गिरकर बेहोश हो गईं। घबराकर अंकल उन्हें तुरंत हॉस्पिटल लेकर भागे और एडमिट करवाया, जिसकी खबर ध्रुव तक नहीं पहुँच सकी।
इधर विसल बजते ही ध्रुव पानी में कूद पड़ा। तारा स्टैंड्स में खड़ी होकर ज़ोर-ज़ोर से उसका नाम चिल्ला रही थी। पूरे जोश और अपनी कड़ी मेहनत के दम पर ध्रुव ने आखिरी सेकंड में बाज़ी मार ली और कॉम्पिटिशन जीत गया!
पूरा स्टेडियम तालियों से गूँज उठा। जीत की खुशी में ध्रुव पानी से बाहर निकलते ही सब कुछ भूलकर सीधे तारा की तरफ भागा और उसने बिना कुछ सोचे तारा को कसकर गले लगा लिया। तारा भी उसकी इस जीत से बेहद खुश थी, दोनों की आँखों में एक-दूसरे के लिए बेइंतहा खुशी और वो अनकहा अहसास साफ़ दिख रहा था, जिसे वे प्यार का नाम देना अभी तक नहीं जानते थे।
तभी कुछ दूरी पर खड़ी सिया का चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था। उसे हमेशा से शक था कि ध्रुव और तारा के बीच कुछ चल रहा है, लेकिन आज उन्हें इस तरह गले मिलते देख उसका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। सिया मुट्ठियाँ भींचकर उन्हें घूरती रही, जबकि ध्रुव और तारा अपनी ही बेफिक्र दुनिया में जीत का जश्न मना रहे थे—इस बात से अनजान कि अस्पताल में एक भयानक संकट उनका इंतज़ार कर रहा था।
नौवा भाग समाप्त, कहानी जारी है....