ध्रुव की तारा
भाग - १०
लेखिका "अनामिका"
जीत के जश्न और तालियों की गूँज अभी ध्रुव और तारा के कानों में गूँज ही रही थी। हाथ में ट्रॉफी थामे और चेहरे पर खुशी समेटे दोनों जब अपनी कॉलोनी पहुँचे, तो हर तरफ़ एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। ध्रुव ने उत्साह में आकर अपने घर का दरवाज़ा खटखटाया, "मम्मी! पापा! देखिए मैं जीत गया!"
लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। ताला बाहर से लटका देख ध्रुव परेशान हो गया। दोनों तुरंत तारा के घर की तरफ़ भागे, पर वहाँ भी मुख्य दरवाज़े पर ताला जड़ा हुआ था। ढलती शाम के अंधेरे में दोनों के घरों का यूँ सूना पड़ा होना ध्रुव के मन में अनहोनी का डर भर गया।
ध्रुव की घबराहट धीरे-धीरे आँसुओं में बदलने लगी। वह अपना सिर पकड़ते हुए रुआँसा होकर बोला, "तारा... मम्मी मुझसे बहुत नाराज़ थीं न? मैंने उनकी बात न मानकर स्विमिंग कॉम्पिटिशन में हिस्सा लिया... ज़रूर वो मुझसे चिढ़कर कहीं चली गई हैं। सब मेरी गलती है तारा, मुझे कॉम्पिटिशन में जाना ही नहीं चाहिए था!"
तारा ने तुरंत उसके कंधों को थामकर उसे संभाला और ढांढस बँधाते हुए कहा, "ध्रुव, पागल मत बनो! आंटी तुमसे नाराज़ हो सकती हैं, लेकिन ऐसे घर छोड़कर नहीं जाएँगी। हो सकता है अंकल और आंटी हमारे घर वालों के साथ कहीं बाहर गए हों। तुम रुको, मैं अभी मम्मी को फोन करती हूँ।"
तारा ने काँपते हाथों से अपनी माँ का नंबर मिलाया। दो-तीन रिंग के बाद फोन उठते ही जैसे-जैसे बात आगे बढ़ी, तारा के चेहरे का रंग उड़ता चला गया। उसकी आँखें डर के मारे फैल गईं, हाथ काँपने लगा और मुँह से आवाज़ निकलना बंद हो गई।
तारा की यह हालत देखकर ध्रुव का दिल धक से रह गया। उसने झकझोरते हुए पूछा, "क्या हुआ तारा? मम्मी ने क्या कहा? बोल न!"
तारा ने रुँधे हुए गले से ध्रुव की तरफ देखा और हकलाते हुए बोली, "ध्रुव... आंटी अचानक से बेहोश हो गई थीं... अंकल उन्हें हॉस्पिटल लेकर गए हैं और मेरे मम्मी-पापा भी वहीं हैं।"
यह सुनते ही ध्रुव के पैर तले ज़मीन खिसक गई और हाथ से भारी-भरकम ट्रॉफी छूटकर ज़मीन पर जा गिरी। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। कॉम्पिटिशन जीतने की सारी खुशी पल भर में गायब हो चुकी थी। तारा ने तुरंत ध्रुव का हाथ कसकर पकड़ा और बोली, "ध्रुव, खुद को संभालो! चलो, जल्दी हॉस्पिटल चलते हैं।" दोनों बिना एक सेकंड गँवाए, बदहवास हालत में सड़क की तरफ़ भागे और ऑटो पकड़कर हॉस्पिटल के लिए निकल पड़े।
अस्पताल के प्राइवेट वार्ड के कमरे में अजीब सी उदासी और खामोशी छाई हुई थी। बेड पर ध्रुव की माँ (सुमन) लेटी हुई थीं, जिनके हाथ पर आईवी ड्रिप चढ़ रही थी। वह अभी पूरी तरह से होश में नहीं थीं, आँखें अधखुली थीं। पास रखी कुर्सी पर तारा की माँ (सुधा) बैठी थीं और उन्होंने सुमन का हाथ अपने हाथों में थाम रखा था। पास ही ध्रुव के पापा (विजय) बदहवास से खड़े थे, जिनके चेहरे पर गहरी चिंता की लकीरें थीं। तारा के पापा (आनंद) अपने कॉलेज के ज़माने के पक्के दोस्त विजय के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें ढांढस बँधा रहे थे।
"विजय, यार तू हिम्मत रख," आनंद ने धीमी आवाज़ में कहा, "reports आने में थोड़ा वक्त लग रहा है, लेकिन डॉक्टर कह रहे थे कि घबराने की कोई बात नहीं है। बस कुछ tests हुए हैं, बाकी सब normal है। देख, भाभी को धीरे-धीरे होश भी आ रहा है। अब तू ज़्यादा फ़िक्र मत कर।"
तभी सुमन की पलकें धीरे-धीरे पूरी तरह से खुलीं। उसने कमरा देखा और एक गहरी साँस ली।
"सुमन! तुम ठीक तो हो ना? कैसा लग रहा है अब?" विजय तुरंत आगे बढ़े और घबराते हुए पूछा।
सुधा ने भी उनका हाथ थोड़ा और कसते हुए पूछा, "हाँ सुमन, अब दर्द कैसा है?"
सुमन ने कमज़ोर आवाज़ में कहा, "मुझे पता था... यह एक न एक दिन होना ही था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। विजय ने परेशान होकर पूछा, "तुम यह क्या कह रही हो सुमन? क्या हुआ था तुम्हें? डॉक्टर से पहले क्या तुमने भी कुछ छुपाया था?"
सुमन ने सबकी तरफ़ देखा और रुँधे गले से बोली, "आप लोग पहले मुझसे वादा कीजिए... यह बात ध्रुव और तारा तक नहीं पहुँचनी चाहिए। वे दोनों अभी बच्चे हैं, बेकार में घबरा जाएँगे और पढ़ाई से ध्यान हट जाएगा।"
"लेकिन हुआ क्या है सुमन? तुम साफ़-साफ़ बताओ ना!" सुधा ने डरते हुए पूछा।
सुमन ने अपनी आँखें बंद कीं और बोलीं, "कुछ हफ़्तों से मेरे पेट में तेज़ दर्द रह रहा था। मैंने आप लोगों को बिना बताए अस्पताल जाकर जाँच करवाई थी। डॉक्टर्स ने कहा है कि पेट में एक बहुत छोटा सा ट्यूमर है..."
यह सुनते ही विजय के पैर तले ज़मीन खिसक गई। आनंद और सुधा भी सन्न रह गए।
सुमन ने बात संभालते हुए आगे कहा, "घबराइए मत, डॉक्टर ने कहा है कि बिल्कुल शुरुआती स्टेज में है। दवाइयों से भी ठीक हो सकता है और अगर छोटा सा ऑपरेशन करवा लें, तो हमेशा के लिए निकल जाएगा। चिंता की कोई बात नहीं है।"
विजय वहीं सुमन के पास घुटनों के बल बैठ गए और उनका हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उनकी आँखों में आँसू आ गए। वह भरे गले से बोले, "तुमने इतनी बड़ी बात मुझसे छुपाकर रखी सुमन? तुम अकेले यह सब सहती रहीं और मुझे भनक तक नहीं लगने दी? अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता?"
"मुझे कुछ नहीं होगा," सुमन ने उनके हाथ पर अपना दूसरा हाथ रखते हुए कहा, "बस ध्रुव को इस बारे में..."
अभी सुमन अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि बाहर दरवाज़े पर आहट हुई।
कमरे के ठीक बाहर ध्रुव और तारा बदहवास हालत में पहुँचे ही थे। ध्रुव के हाथ काँप रहे थे। जैसे ही ध्रुव ने दरवाज़ा थोड़ा सा ढकेला, अंदर से सुधा की आवाज़ आई— "बच्चों से यह बात छुपानी पड़ेगी, उन्हें पता चला तो टूट जाएँगे..."
ध्रुव और तारा ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा, लेकिन ध्रुव का दिमाग़ इस वक्त अपनी माँ को देखने के अलावा कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। उसने बिना ज़्यादा ध्यान दिए पूरा दरवाज़ा खोल दिया।
जैसे ही दरवाज़ा खुला, कमरे में मौजूद चारों बड़े अचानक चुप हो गए और अपने चेहरे के डर को छुपाने की कोशिश करने लगे।
ध्रुव भागकर माँ के पास गया, "मम्मी! आप ठीक तो हैं ना? यह सब क्या हो गया? आपको अचानक क्या हुआ?"
तारा भी घबराते हुए आगे बढ़ी, "आंटी, अब आपकी तबियत कैसी है?"
विजय ने खुद को सँभाला और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लाते हुए ध्रुव के कंधे पर हाथ रखा, "अरे ध्रुव, कुछ नहीं हुआ है बेटा। तुम बेकार में घबरा गए। बस एक छोटा सा gas attack था... पेट में ज़्यादा दर्द हुआ तो आंटी बेहोश हो गईं। डॉक्टर ने drip लगा दी है, अब सब normal है। घबराने की कोई बात नहीं है।"
आनंद ने भी अपने दोस्त की बात का समर्थन करते हुए कहा, "हाँ ध्रुव, reports एकदम safe हैं। बस gas की वजह से थोड़ा दर्द बढ़ गया था। तुम लोग बेवजह डर गए।"
तारा और ध्रुव ने राहत की साँस ली। ध्रुव ने माँ का हाथ थामते हुए कहा, "मम्मी, आप अपना ध्यान क्यों नहीं रखतीं? मुझे तो लगा था कि आप मुझसे नाराज़ होकर..."
सुमन ने ध्रुव के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे बीच में ही रोक दिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी सख़्ती और चिंता थी, "मैं अपना ध्यान रख लूँगी ध्रुव... लेकिन तुम यह सब खेलकूद, स्विमिंग और competition छोड़ दो। तुम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी पढ़ाई पर होना चाहिए। समझ गए?"
उस वक्त ध्रुव ने सिर्फ़ अपनी माँ को शांत करने के लिए धीरे से सिर हिला दिया, "जी मम्मी... ठीक है।"
बाहर से ध्रुव बिल्कुल शांत और आश्वस्त दिख रहा था, लेकिन उसके अंदर एक बहुत बड़ा तूफ़ान जन्म ले चुका था। दरवाज़े के बाहर सुनी वह आधी-अधूरी बात— "बच्चों से यह बात छुपानी पड़ेगी..." —अब उसके दिमाग़ में बार-बार गूँज रही थी। उसे अहसास हो चुका था कि बड़े उससे कुछ बहुत बड़ा छुपा रहे हैं, और इस अनजाने डर ने ध्रुव की दुनिया को अंदर ही अंदर झकझोर कर रख दिया था।
दशवाँ भाग समाप्त, कहानी जारी है....