आधुनिकता की अंधी दौड़ में जब शहर के कंक्रीट के मकान ऊंचे होते जा रहे थे, तब गाँव के मुहाने पर खड़ा वह पुराना घर दिन-ब-दिन और अकेला पड़ता जा रहा था। ईंटों की दरारों से झांकती घास और ज़ंग लगे लोहे का मुड़ा हुआ मुख्य द्वार जैसे बीते ज़माने की दास्तान बयां कर रहे थे।
राघव करीब पंद्रह साल बाद अपने उस पैतृक घर लौटा था। शहर में उसके पास एक शानदार फ्लैट था, गाड़ियों का काफ़िला था और हर तरह की आधुनिक सहूलियत थी। पर दिल के किसी कोने में एक अजीब सी बेचैनी थी, जो उसे खींचकर वापस उसकी जड़ों की ओर ले आई थी।
दरवाजे की भारी सांकल को जब राघव ने हिलाया, तो एक जानी-पहचानी चरमराहट हुई। ताला खोलने के बाद अंदर कदम रखते ही सीलन, पुरानी लकड़ी और सूखी नीम की पत्तियों की वह सोंधी खुशबू हवा में तैर उठी—वही खुशबू, जिसे राघव बचपन में अपनी सांसों में भरा करता था।
आंगन के बीचों-बीच पड़ा वो पुराना कुआँ अब सूख चुका था। पास ही रखी वह ढीली बुनावट वाली चारपाई आज खाली थी, जहाँ कभी दादी शाम को अपनी पुरानी कहानियों की गठरी खोला करती थीं। दीवार पर टंगी दादाजी की लकड़ी की गोल घड़ी अब बंद पड़ चुकी थी, पर उसकी टिक-टिक राघव के कानों में आज भी गूंज रही थी।
राघव धीरे-धीरे रसोई की तरफ बढ़ा। चूल्हे की राख कब की ठंडी हो चुकी थी, लेकिन माँ के हाथों की रोटियों की मिठास और उनकी ममता की गर्माहट आज भी उस कमरे की आबोहवा में मौजूद थी। हॉल की दीवार पर पेंसिल से खींची वो आड़ी-तिरछी लकीरें आज भी वैसी ही थीं। ये वही निशान थे, जिनसे हर जन्मदिन पर राघव की लंबाई मापी जाती थी। माँ हंसकर कहा करती थी, "मेरा बेटा बहुत तेज़ी से बड़ा हो रहा है, एक दिन बादलों को छू लेगा।"
राघव ने अपने कांपते हाथ उस कच्ची दीवार पर फेरे। स्पर्श इतना गहरा था कि लगा जैसे घर की नींव उससे फुसफुसाकर पूछ रही हो—"इतने साल कहाँ थे राघव? क्या शहर के उन एसी कमरों और बंद शीशों में तुम्हें वो सुकून मिला, जो इस मिट्टी की आगोश में था? क्या पैसों की चमक में तुम अपनों का स्पर्श भूल गए?"
यह सोचते ही राघव की आंखों से एक अनजाना आंसुओं का कतरा बह निकला और ज़मीन की सुखी मिट्टी में समा गया। उसे अहसास हुआ कि शहर के फ्लैट सिर्फ रहने की जगह थे, लेकिन यह पुराना घर उसकी आत्मा का हिस्सा था। यहाँ उसकी हँसी, उसके रोने, उसके सपने और उसकी पहचान का हर टुकड़ा बिखरा हुआ था।
शहर में उसने बिल्डर से इस घर को बेचकर यहाँ एक नया मॉल बनाने का सौदा लगभग पक्का कर लिया था। पर इस पल में, पुरानी दीवारों की खामोशी ने उसका इरादा बदल दिया। राघव ने तुरंत जेब से फोन निकाला और डीलर का नंबर मिटा दिया। उसने फैसला किया कि वह इस घर को बेचेगा नहीं, बल्कि इसकी मरम्मत करवाकर इसे फिर से वही पुराना जीवंत रूप देगा। वह अपनी आने वाली पीढ़ी को सीमेंट के ढाँचे नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की जड़ें सौंपेगा। क्योंकि मकान तो पैसों से चुटकी में बन जाते हैं, पर 'घर' सालों की यादों और अपनों के प्यार से सजता है।
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