Pole Star - Part 15 in Hindi Love Stories by Anamika books and stories PDF | ध्रुव की तारा - भाग 15

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ध्रुव की तारा - भाग 15

ध्रुव की तारा
भाग - १५
लेखिका "अनामिका" 
ध्रुव अपनी माँ को ढूँढते हुए उनके कमरे में आया था। उसकी नज़र अलमारी के आधे खुले ड्रॉर पर पड़ी, जिसमें दवाइयां और मेडिकल स्टोर के बिल बिखरे पड़े थे। जैसे ही वह ड्रॉर बंद करने आगे बढ़ा, उसमें रखे कुछ और कागज़ों को देखकर उसे अजीब सा अहसास हुआ और उसने ड्रॉर को पूरा खोल दिया।
​जैसे-जैसे वह एक-एक करके अस्पताल की डिस्चार्ज समरी और ऑपरेशन के पेपर्स पढ़ रहा था, उसके पैरों तले ज़मीन खिसकती जा रही थी। 'सुमन शर्मा - ट्यूमर सर्जरी'... इन शब्दों को देखकर ध्रुव का दिमाग सन्न रह गया।
​"ध्रुव... तू यहाँ क्या कर रहा है?" इतने में सुमन जी कमरे में दाखिल हुईं।
​ध्रुव ने काँपते हाथों से वह पेपर्स माँ के सामने कर दिए। उसकी आँखों में बेपनाह दर्द और रोष था, "यह सब क्या है माँ? आपका ऑपरेशन हुआ? इतना बड़ा हादसा हो गया और मुझे किसी ने बताना भी ज़रूरी नहीं समझा? क्या मैं इस परिवार का हिस्सा नहीं हूँ?"
​आवाज़ सुनकर विजय जी भी दौड़ते हुए कमरे में आ गए। ध्रुव का गुस्सा और दुख बेकाबू हो चुका था। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े, "आप लोगों ने मुझसे इतना बड़ा सच छुपाया! और... और तारा? क्या तारा को भी यह पता था? उसने भी मुझसे झूठ बोला? उसने भी मुझे कुछ नहीं बताया!"
​अपने बेटे को यूँ रोते और टूटते देख सुमन जी और विजय जी का दिल भर आया। विजय जी ने आगे बढ़कर ध्रुव के कंधों को कसकर थामा, "ध्रुव, मेरी बात सुन बेटा! इसमें तारा या तेरी माँ की कोई गलती नहीं है। यह फैसला मेरा था।"
​सुमन जी ने ध्रुव के आँसू पोंछते हुए बेहद प्यार से समझाया, "बेटा, तू अपनी पढ़ाई और अपने सपनों के लिए पहली बार हमसे दूर गया था। हम नहीं चाहते थे कि तू अपनी पढ़ाई छोड़कर यहाँ परेशान हो। और तारा... तारा ने तो दिन-रात मेरी ऐसी सेवा की है ध्रुव, जैसी शायद कोई सगी बेटी भी न करती। तेरे पापा के ऑफिस जाने के बाद, स्कूल से आते ही उसने मुझे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा। हमने ही उसे कसम देकर रोका था कि वह तुझे कुछ न बताए।"
​माँ-पापा की बातें सुनकर ध्रुव का गुस्सा धीरे-धीरे शांत होने लगा, लेकिन उसका दिल एक अजीब सी ग्लानि और गहराई से भर गया। तारा ने उसकी गैर-मौजूदगी में उसके माता-पिता को जिस तरह सँभाला था, उसने ध्रुव के दिल में तारा के लिए इज्ज़त और अहसास को कई गुना बढ़ा दिया। उसे समझ आ रहा था कि तारा का यह समर्पण सिर्फ एक आम बचपन की दोस्ती नहीं, बल्कि उससे कहीं बढ़कर था... एक ऐसा रिश्ता जिसे अब नाम मिलना बाकी था।
​माँ-पापा से पूरा सच सुनते ही ध्रुव का दिल भर आया। उसके कदम खुद-ब-खुद तारा के घर की तरफ दौड़ पड़े। जैसे ही उसने दरवाज़े की घंटी बजाई, तारा की मम्मी (सुधा जी) ने दरवाज़ा खोला। सामने ध्रुव को खड़ा देख वे हैरान रह गईं।
​"ध्रुव! अरे बेटा तू? कब आया?" सुधा जी की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए। उन्होंने तुरंत ध्रुव का हाथ थाम लिया और उसे अंदर खींचते हुए बोलीं, "कितने दिनों बाद देखा है तुझे! कैसा है बेटा तू? तूने तो जैसे घर में रौनक ही ला दी।"
​ध्रुव भी थोड़ा भावुक हो गया। उसने सुधा जी के चेहरे पर झुर्रियों और थकान के बीच भी वही पुराना दुलार देखा। उसने उनके हाथ जोड़े और कहा, "मैं बिल्कुल ठीक हूँ आंटी। और आप कैसी हैं? मुझे माँ ने अभी सब बताया... आपने और तारा ने जिस तरह माँ की देखभाल की है, मैं शब्दों में आपका शुक्रिया भी अदा नहीं कर सकता। अगर आप लोग न होते, तो पता नहीं क्या होता।"
​"अरे पागल, अपनों का शुक्रिया कैसा?" सुधा जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "सुमन मेरी बहन जैसी है, उसका ध्यान रखना तो मेरा फर्ज था।"
​थोड़ी औपचारिकता भरी प्यारी बातों के बाद ध्रुव की नज़रें आसपास किसी को ढूँढने लगीं। उसने उत्सुकता से पूछा, "आंटी... तारा कहाँ है? दिख नहीं रही?"
​सुधा जी मुस्कुराईं, "अरे पूछ मत! बेचारी अभी अपने कमरे में सो रही है। सुबह से कह रही थी कि सर में बहुत तेज़ दर्द है। दवा खाकर सोई है, ज़रा देखकर आ।"
​यह सुनते ही ध्रुव दबे पाँव तारा के कमरे की तरफ बढ़ा। धीरे से दरवाज़ा खोलकर अंदर गया तो देखा तारा बेखबर सो रही थी। उसने ध्यान दिया कि वह चश्मा लगाए-लगाए ही सो गई थी। ध्रुव कुछ पल के लिए वहीं ठिठक गया। सोते हुए तारा का मासूम चेहरा देखकर उसका दिल अजीब से सुकून और प्यार से भर गया। उसने धीरे से आगे बढ़कर उसका चश्मा उतारा, साइड टेबल पर रखा और फिर उसकी चादर खींचते हुए अचानक बेड पर ऐसा छलांग लगाया कि तारा सीधा फर्श पर जा गिरी!
​"उठ जा चश्मिश! और कितना सोएगी?" ध्रुव तेज़ आवाज़ में हँसते हुए बोला।
​अचानक नीचे गिरने से तारा हड़बड़ा कर उठ बैठी। आँखों में नींद और चेहरे पर गुस्सा लिए वह बुदबुदाई, "किसकी शामत आई है..."
​लेकिन जैसे ही उसकी धुंधली नज़रों के सामने ध्रुव का हँसता हुआ चेहरा साफ हुआ, उसका सारा गुस्सा हवा में उड़ गया। खुशी का ठिकाना न रहा! वह कुछ सोच भी न सकी और बिना कुछ समझे सीधा बेड पर चढ़कर ध्रुव के ऊपर कूद पड़ी। ध्रुव इस अचानक हमले के लिए तैयार नहीं था और दोनों एक साथ बेड पर पीछे की तरफ गिर पड़े। तारा उसकी छाती से चिपकी हुई थी और उसकी आँखों से खुशी के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। ध्रुव ने भी कसकर उसे अपनी बाहों में भींच लिया, उसकी अपनी आँखें भी नम हो चुकी थीं।
​"तू आ गया... तू सच में आ गया?" तारा रोते और हँसते हुए बोली।
​फिर अचानक उसे होश आया, तो उसने ध्रुव के कंधे पर एक मुक्का मारा, "पर तू इतना बड़ा गधा है! मुझे बताया क्यों नहीं कि तू आज आ रहा है? मैं किस हाल में हूँ, सर दर्द से फटा जा रहा है और तू सीधे आकर मुझे बेड से गिरा रहा है? कोई ऐसे सरप्राइज़ देता है क्या?"
​ध्रुव ने उसका रोता-हँसता चेहरा हाथों में लिया और प्यार से मुस्कुराते हुए बोला, "अगर बता देता, तो तेरी यह ड्रामा क्वीन वाली एंट्री और यह कसकर गले लगाना कैसे महसूस कर पाता? और वैसे भी, चश्मिश... शुक्रिया, माँ का इतना ध्यान रखने के लिए।"
​तारा ने आँखें पोंछीं और धीरे से बोली, "शुक्रिया मत बोल ध्रुव... वो मेरी भी माँ हैं।" दोनों एक-दूसरे को देखते रहे, जहाँ बिना कहे भी ढेरों बातें हो चुकी थीं।
पंद्रहवाँ भाग समाप्त, कहानी जारी है....