Flute Tune - Part 8 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | बांसुरी की धुन - भाग 8

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बांसुरी की धुन - भाग 8


भाग : 08
सुबह की किरणें धीरे-धीरे धरती पर अपना उजास बिखेर रही थीं। रात का घना अंधकार अब छँट चुका था। पेड़ों की पत्तियों पर ठहरी ओस की बूँदें सूर्य की पहली किरणों में चमक रही थीं।
अंधकार और अज्ञानता एक-दूसरे के प्रतीक जैसे लगते हैं। दोनों ही अवस्थाओं में मनुष्य की दृष्टि के सामने सत्य होते हुए भी उसका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं हो पाता। प्रकाश बाहर हो या भीतर—दृष्टि तभी सार्थक होती है, जब उसे देखने का विवेक भी जागृत हो।
तापस दा के घर के मिट्टी के बरामदे में श्री रावण दा और लाल दा के चारों ओर कुछ लोग बैठे हुए थे। तापस दा ने बरामदे में बाँस की चटाइयाँ बिछाईं और विनम्रता से सभी से बैठने का आग्रह किया।
इतने में तापस दा की बेटी मिट्टी के कुल्हड़ों में नींबू की चाय लेकर आई। बरामदे के किनारे से आती हल्की धूप अब चटाई तक पहुँचने लगी थी।
ऐसा लग रहा था, जैसे उस धूप की प्रत्येक किरण के साथ आज कई लोगों के भीतर ज्ञान-चक्षु के उदय की प्रतीक्षा हो।
इसी बीच रामलाल अपने पूरे परिवार के साथ वहाँ पहुँचा।
उसके साथ उसकी पत्नी सलमा, बड़ी बेटी माही, छोटी बेटी आदोरी और बेटा सागुम थे।
रामलाल ने आते ही रावण दा के चरणों की ओर झुककर कहा—
रामलाल: “दादा, हम सब सत्-दीक्षा लेंगे।”
रावण हेंब्रम के चेहरे पर अचानक प्रसन्नता की चमक आ गई।
उन्होंने बच्चों की ओर देखा और पूछा—
रावण: “रामलाल, बच्चों में बारह वर्ष से अधिक उम्र का कोई है न?”
रामलाल: “जी दादा।”
तापस दा मुस्कुराए। फिर रामलाल के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले—
तापस: “देखो रामलाल, हम दोनों बचपन से साथ पढ़े हैं। नौकरी भी लगभग साथ ही शुरू की थी। तुम मेरे दोस्त कम और भाई अधिक हो। रावण दा जो भी विधि बताएँगे, उसे केवल आज के लिए मत अपनाना। यदि अपनाओ तो जीवन भर उसके पालन का प्रयास करना।”
रामलाल ने सिर झुकाकर कहा—
रामलाल: “ठीक है तापस।”
घर के भीतर ठाकुर आसन सजाया जा चुका था। वातावरण में एक शांत गंभीरता उतर आई थी। रावण दा अब उठने ही वाले थे कि अचानक बाहर से कई लोगों के आने की आवाज सुनाई दी।
संताल समाज के अध्यक्ष सिनाराम मुर्मू, गणेश हेंब्रम, अभय टुडू और उनके साथ लगभग पंद्रह लोग वहाँ आ पहुँचे।
उनके चेहरों पर असंतोष और क्रोध साफ दिखाई दे रहा था।
उन्हें खबर मिली थी कि देवघर से आए दो लोग संताल समाज के लोगों को बहला-फुसलाकर धर्म परिवर्तन करा रहे हैं और आज यहाँ कुछ लोगों को दीक्षा दी जाने वाली है।
सिनाराम ने चारों ओर देखा और तीखे स्वर में पूछा—
सिनाराम: “तापस! कौन है रावण हेंब्रम?”
रावण दा शांत भाव से उठे।
रावण: “जी, मैं हूँ। कहिए?”
गणेश हेंब्रम आगे बढ़ा।
गणेश: “एक संताल होकर आप लोगों को हिन्दू धर्म में परिवर्तन करवा रहे हैं? आपको थोड़ी भी शर्म नहीं आती?”
अभय टुडू ने भी कठोर स्वर में कहा—
अभय: “यदि अपनी खैर चाहते हो तो तुरंत यहाँ से चलते बनो।”
रामलाल से रहा नहीं गया।
वह आगे बढ़कर बोला—
रामलाल: “श्रीमान, ये हमारे अतिथि हैं। आप लोग इनसे इस तरह बात नहीं कर सकते।”
सिनाराम ने उसे घूरकर देखा।
सिनाराम: “अब तुम हमें ज्ञान दोगे? जिसे अपनी हालत का होश नहीं, जिसके मुँह पर कुत्ते पेशाब करते हैं, जो गोबर में गिरे पशुओं तक का मुँह चाटते देखता है—वह हमें ज्ञान देगा? तुम्हें जरा भी शर्म है? तुम मास्टर नहीं, समाज पर कलंक हो!”
वातावरण अचानक भारी हो गया।
तापस दा ने हाथ जोड़कर कहा—
तापस: “सिनाराम दा, हम सब बैठकर आराम से बात कर सकते हैं। क्रोध से किसी प्रश्न का समाधान नहीं होगा।”
सिनाराम ने उनकी बात काट दी।
सिनाराम: “हम यहाँ बैठने नहीं आए हैं, तापस। एक भी संताल को यहाँ दीक्षा नहीं होनी चाहिए। वरना बहुत बुरा होगा।”
कुछ क्षण के लिए पूर्ण निस्तब्धता छा गई।
रामलाल का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा। उसने होंठ भींच लिए। फिर मन ही मन उसने एक संकल्प किया—
“एक दिन पूरा संताल समाज मेरा अनुसरण करेगा।”
अब तक रावण हेंब्रम बिल्कुल शांत बैठे सब सुन रहे थे। उनके चेहरे पर न क्रोध था, न भय। उन्होंने धीरे से सबकी ओर देखा और कहा—
रावण: “ठीक है... मैं चला जाऊँगा।”
यह सुनकर वहाँ खड़े लोग कुछ क्षण के लिए शांत हो गए।
रावण दा ने आगे कहा—
रावण: “लेकिन जाने से पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे दीजिए।”
अभय टुडू ने कठोर स्वर में कहा—
अभय: “बोलो। और फिर चलते बनो।”
रावण दा ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा—
रावण: “यदि आपका उत्तर तर्कसंगत हुआ और मेरे मन को संतुष्ट कर सका, तो मैं बिना किसी विवाद के यहाँ से चला जाऊँगा। लेकिन यदि मेरे प्रश्न का उत्तर केवल क्रोध, परंपरा या आरोप होगा और उसमें तर्क नहीं होगा... तो फिर मैं अपना कार्य अवश्य करूँगा।”
बरामदे में बैठे सभी लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
कुछ क्षण पहले तक जो वातावरण क्रोध से भरा था, उसमें अब एक अलग प्रकार की शांति उतर आई थी।
सबकी निगाहें रावण दा पर टिक गईं।
अभय टुडू ने भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा—
अभय: “क्या प्रश्न है तुम्हारा?”
रावण दा ने कुछ क्षण मौन रहकर ठाकुर आसन की ओर देखा।
फिर धीरे से बोले—
रावण: “मेरा प्रश्न बहुत सरल है...”
वह रुक गए।
बरामदे में बैठे लोगों की साँसें जैसे थम गईं।
रावण: “यदि किसी मनुष्य को सत्य की खोज करने का अधिकार है, तो क्या उसे यह अधिकार भी नहीं होना चाहिए कि वह अपने विवेक से यह तय करे कि सत्य उसे कहाँ दिखाई देता है?”
",भगवान क्या एक के लिए होते हैं या सबके लिए ?
",क्या भगवान हरेक जाति  संप्रदाय के लिए अलग अलग होते हैं ?
प्रश्न सुनने में जितने सरल थे उतर उतना ही कठिन था जवाब से खुद ही प्रश्नों में फंसने का डर था ।
तभी सिनाराम जवाब देने के लिए सामने गया ।
एक बार फिर सन्नाटा छा गया।
सुबह की धूप अब पूरे बरामदे में फैल चुकी थी।
लेकिन इस बार प्रश्न यह नहीं था कि सूरज का प्रकाश किस दिशा से आया है।
प्रश्न यह था कि जिसके भीतर प्रकाश की खोज जाग गई हो, उसे अंधकार में लौटने का आदेश कौन दे सकता है?