Pole Star - Part 19 in Hindi Love Stories by Anamika books and stories PDF | ध्रुव की तारा - भाग 19

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ध्रुव की तारा - भाग 19

ध्रुव की तारा
भाग - १९
लेखिका "अनामिका"
​ट्रेन के लंबे सफर के बाद जैसे ही ध्रुव और तारा अपनी कॉलोनी में पहुँचे, दोनों के चेहरों पर अपने घर लौटने की खुशी साफ झलक रही थी। दोनों अपने-अपने घर की तरफ बढ़ गए।
​तारा ने जैसे ही अपने घर का दरवाज़ा खटखटाया, उसकी माँ ने दरवाज़ा खोला और तारा को सामने देखकर खुशी से गले लगा लिया।
​"तारा! मेरी बच्ची, आ गई तू!" माँ ने उसके माथे को चूमते हुए कहा, फिर बाहर झाँककर झिझकते हुए पूछा, "तू अकेली ही आई है क्या इतनी दूर से?"
​तारा ने अपनी वही जानी-पहचानी शरारती मुस्कान के साथ कहा, "अरे नहीं माँ! मैं अकेली कैसे आ सकती हूँ? ध्रुव था न मेरे साथ! उसने पूरे रास्ते मेरा ख्याल रखा है, आप तो बस चिंता करना शुरू कर देती हो।" माँ के चेहरे पर तसल्ली की एक प्यारी सी मुस्कान तैर गई।
​दूसरी तरफ, ध्रुव के घर में भी कुछ ऐसा ही माहौल था। ध्रुव के कदम रखते ही उसकी माँ रसोई से भागती हुई आईं।
​"अरे ध्रुव! आ गया मेरा बेटा!" माँ ने उसका बैग उतारते हुए पूछा, और फिर तुरंत मुस्कुराते हुए सवाल दागा, "तारा को सही-सलामत उसके घर पहुँचा दिया न तुमने? रास्ते भर उसे परेशान तो नहीं किया? उसका ध्यान रखा था न ठीक से?"
​ध्रुव ने हँसते हुए माँ के गले में हाथ डाला और कहा, "हाँ माँ! आपकी लाडली तारा एकदम सही-सलामत अपने घर पहुँच चुकी है। आपकी हिदायतें मुझे पूरे रास्ते याद थीं।"
​दोनों के घरों में वही पुरानी रौनक लौट आई थी। लेकिन अपने-अपने कमरों की खिड़कियों से बाहर देखते हुए ध्रुव और तारा, दोनों के दिलों में सिर्फ एक-दूसरे का ख्याल घूम रहा था।
शाम ढलते ही ध्रुव का मन अपने घर में नहीं लगा, तो वह आदत के मुताबिक सामने तारा के घर चला गया। जैसे ही उसने दरवाज़ा खटखटाया, तारा की माँ ने दरवाज़ा खोला और ध्रुव को सामने देखते ही उनका चेहरा खिल उठा।
​"अरे ध्रुव बेटा! आओ-आओ, अंदर आओ!" माँ ने बड़े प्यार से उसका हाथ थामा और खिंचकर सीधे डायनिंग टेबल की तरफ ले गईं। "अच्छा हुआ तुम आ गए, मैंने अभी-अभी तुम्हारी पसंद की गरमा-गरम कचौड़ियाँ बनाई हैं। बैठो, मैं तुरंत लगाती हूँ।"
​ध्रुव ने मुस्कुराते हुए कहा, "आंटी, आप भी न... मुझे देखते ही बस खाने पर लगा देती हैं!"
​"तो और क्या! रास्ते भर थक गए होगे," आंटी ने प्लेट में कचौड़ियाँ परोसते हुए बड़े दुलार से कहा, "वैसे ध्रुव, सच कहूँ तो तुम्हारे रहते मुझे तारा की ज़रा भी चिंता नहीं होती। कॉलेज में भी तुम उसका इतना ख्याल रखते हो, उसे हर चीज़ से सेफ रखते हो... तू है तो हमें एकदम तसल्ली रहती है बेटा।"
​ध्रुव थोड़ा झेंप गया और मुस्कुराकर बोला, "अरे नहीं आंटी, आप भी कैसी बातें कर रही हैं! तारा मेरी इतनी अच्छी दोस्त है, उसका ध्यान रखना तो मेरा फर्ज है ना।"
​इतने में तारा के पापा भी कमरे से बाहर आ गए। ध्रुव को देखकर उनके चेहरे पर भी एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। "अरे ध्रुव! कब आए बेटा? सफर कैसा रहा?" कहते हुए वे भी ध्रुव के पास ही बैठ गए और दोनों में पुरानी बातें होने लगीं।
​थोड़ी देर कचौड़ी खाते-खाते ध्रुव ने आसपास नज़र दौड़ाई, लेकिन तारा कहीं दिखाई नहीं दी। उसने आखिरकार पूछ ही लिया, "वैसे आंटी... यह तारा कहाँ है? जब से हम वापस आए हैं, नज़र ही नहीं आ रही। इतनी थक गई क्या जो अभी तक सो रही है?"
​माँ ने हंसते हुए सिर हिलाया, "अरे नहीं बेटा! सो कहाँ रही है, वो तो घर पर ही नहीं है। आते ही हाथ-मुँह धोकर बोली कि बाहर किसी काम से जा रही है। पता नहीं इतनी शाम को कहाँ चली गई!"
​यह सुनते ही ध्रुव के माथे पर हल्की सी शिकन आ गई। उसने सोचा, 'अभी तो हम सफर से लौटे हैं, फिर यह बिना बताए शाम को कहाँ निकल गई?' उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी और उत्सुकता दौड़ गई।
​ध्रुव के हाथ में पकड़ा कचौड़ी का टुकड़ा वहीं थम गया। उसने प्लेट झट से मेज़ पर रखी और घबराकर आंटी से पूछा, "आंटी! इतनी शाम हो गई है, तारा कहाँ गई है? मैं ज़रा बाहर देख कर आता हूँ।"
​तारा की माँ ने उसे रोकते हुए कहा, "अरे ध्रुव बेटा! तुम पहले अपनी कचौड़ी तो खत्म कर लो, आ जाएगी वो..." लेकिन ध्रुव ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, "नहीं आंटी, मैं अभी देखकर आता हूँ!" और वह हड़बड़ाहट में बिना अपनी कचौड़ी पूरी किए सीधे घर से बाहर निकल गया।
​ध्रुव पैदल ही कॉलोनी की गलियों में तेज़ी से आगे बढ़ा। उसने पार्क और पास की छोटी-मोटी दुकानों पर नज़र दौड़ाई, लेकिन तारा कहीं दिखाई नहीं दी। शाम का अँधेरा धीरे-धीरे गहरा रहा था और ध्रुव के दिल की धड़कनें उतनी ही तेज़ हो रही थीं।
​कॉलोनी की सीमा पार कर थोड़ा आगे बढ़ते ही उसकी नज़र सड़क किनारे बनी 'बेकरी एंड केक शॉप' के रंग-बिरंगे कांच पर पड़ी। अंदर काउंटर के पास तारा खड़ी थी। ध्रुव के जान में जान आई, वह दौड़ते हुए बेकरी के अंदर पहुँचा और हाँफते हुए आवाज़ लगाई, "तारा!"
​तारा ने मुड़कर देखा और हैरान होते हुए बोली, "ध्रुव? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
​ध्रुव का पारा चढ़ गया, उसने हाँफते हुए चिढ़कर कहा, "मुझसे पूछ रही हो? तुम बताओ, तुम यहाँ क्या कर रही हो? दिमाग खराब है तुम्हारा? इतनी शाम को बिना किसी को बताए चुपचाप यहाँ क्यों आ गई? घर पर सब परेशान हो रहे हैं!"
​तारा ने ध्रुव के गुस्से को देखकर कोई बहस नहीं की। उसने अपने हाथ में थमा एक छोटा-सा सुंदर सा डिब्बा आगे बढ़ा दिया और बहुत ही मासूमियत से मुस्कुराकर बोली, "अरे ध्रुव, तुम पहले शांत तो हो जाओ... यह देखो, मैंने तुम्हारी फेवरेट पेस्ट्री ली है।"
​ध्रुव ने पेस्ट्री के डिब्बे को देखा और फिर तारा के चेहरे को, उसका गुस्सा और बढ़ गया, "तुम्हारा सच में दिमाग ठिकाने पर नहीं है तारा! इस वक्त, बिना किसी को बताए, सिर्फ पेस्ट्री लेने इतनी दूर आई हो?"
​तारा की मुस्कान थोड़ी मद्धम पड़ी, उसने एक गहरी साँस ली और ध्रुव की आँखों में देखते हुए धीरे से कहा, "मुझे पता था ध्रुव... मुझे अच्छे से पता था कि किसी को याद नहीं रहेगा। इसलिए मुझे खुद ही आना पड़ा।"
​ध्रुव स्तब्ध रह गया। 'किसी को याद नहीं रहेगा?' तारा किस बात का ज़िक्र कर रही थी? वह इस डिब्बे में सिर्फ पेस्ट्री लेकर आई थी या कोई ऐसा राज़ छुपा था जिसे सिर्फ तारा जानती थी?
उन्नीसवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....