"बेटा, जब जेब में फूटी कौड़ी न हो और सामने अपनों की उम्मीदें खड़ी हों, तब या तो इंसान हमेशा के लिए टूट जाता है... या फिर अपनी तकदीर खुद लिख देता है!"
कहानी:
रात के 11 बज रहे थे। दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर बारिश की बूंदे तेज़ हो चुकी थीं। 22 साल का राहुल एक टूटी हुई बेंच पर बैठा अपनी भीगी हुई जेब टटोल रहा था। जेब में सिर्फ एक 500 रुपये का नोट निकला—वह भी बीच से पूरी तरह फटा हुआ।
राहुल अपने गाँव से शहर आया था एक बड़ा इंसान बनने का सपना लेकर। लेकिन पिछले छह महीनों से शहर ने उसे सिवाय नाकामियों और तानों के कुछ नहीं दिया था। आज सुबह ही मकान मालिक ने उसका सामान कमरे से बाहर फेंक दिया था और जिस कंपनी में उसने इंटरव्यू दिया था, वहाँ से भी रिजेक्शन की चिट्ठी मिल चुकी थी।
सामने गाँव जाने वाली आखिरी बस खड़ी थी। राहुल का मन पूरी तरह टूट चुका था। उसने सोचा कि इस फटे नोट को चिपकाकर गाँव का टिकट कटवा लेता है और सब कुछ छोड़-छाड़कर वापस लौट जाता है।
बस के कंडक्टर ने जब वह फटा हुआ नोट देखा, तो उसने भरी भीड़ में चिल्लाकर कहा, "ए लड़के! ये रद्दी का टुकड़ा यहाँ नहीं चलेगा। उतर नीचे, दिमाग मत खराब कर!"
पूरी बस के लोग राहुल पर हँस रहे थे। अपमान की आग में जलता राहुल बस से नीचे उतर आया। बारिश का पानी उसके चेहरे पर बह रहा था, लेकिन कोई नहीं देख सकता था कि उस पानी में उसके आँसू भी मिले हुए थे।
वह बस अड्डे के कोने में बैठकर रोने लगा। उसने अपना फोन निकाला और अपने पिता को कॉल किया।
"बाबूजी, मैं हार गया। यह शहर बहुत निर्दयी है। यहाँ मेहनत की कोई कीमत नहीं है। मुझसे अब और नहीं सहा जाता, मैं वापस आना चाहता हूँ।" राहुल की आवाज काँप रही थी।
फोन के दूसरी तरफ कुछ सेकंड की खामोशी छा गई। फिर उसके किसान पिता की शांत लेकिन भारी आवाज आई—
"बेटा, जब लोहे को आकार देना होता है ना, तो उसे आग में तपाकर हथौड़े से बार-बार पीटा जाता है। अगर लोहा डरकर टूट जाए, तो वो कचरा बन जाता है; और अगर सह जाए, तो वही तलवार बनता है। ये शहर तुझे हरा नहीं रहा है, ये बस तेरी परीक्षा ले रहा है कि तू कितना सह सकता है। गाँव वापस आ जाएगा तो पेट तो भर जाएगा, लेकिन जिंदगी भर अपनी ही नजरों में हार जाएगा। गिरना पाप नहीं है बेटा, गिरकर खड़े न होना असली हार है!"
पिता की इन बातों ने राहुल की रूह को झकझोर कर रख दिया। उसके अंदर सोया हुआ स्वाभिमान जाग उठा। उसने रोना बंद किया और उस 500 रुपये के फटे नोट को ध्यान से देखा।
उसने तय किया कि वह गाँव वापस नहीं जाएगा। उसने बस अड्डे के पास एक छोटी सी चाय की टपरी पर रात भर काम करने का फैसला किया। बदले में उसे दो वक्त की रोटी और रात को सोने की जगह मिली। दिन में वह अलग-अलग कंपनियों के चक्कर काटता, अपनी कमियों को सीखता और रात में काम करता। उसने उसी फटे नोट को अपनी डायरी के पहले पन्ने पर चिपका दिया—यह याद दिलाने के लिए कि उसकी शुरुआत कहाँ से हुई थी।
अगले 5 सालों तक राहुल ने न तो दिन देखा और न रात। उसने कोडिंग सीखी, अपने कौशल को निखारा और अपनी एक छोटी सी सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू की। शुरुआती दिन मुश्किल थे, लेकिन पिता का वह एक वाक्य उसके कानों में गूँजता रहता था—"गिरकर खड़े न होना असली हार है!"
आज 5 साल बाद, राहुल उसी दिल्ली शहर की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का युवा डायरेक्टर था। उसकी कंपनी का टर्नओवर करोड़ों में था। लेकिन आज भी, उसके आलीशान केबिन की कांच की मेज पर वही 500 रुपये का फटा हुआ नोट एक फ्रेम में जड़ा हुआ रखा था।
जब भी कोई उससे उसकी सफलता का राज पूछता, राहुल मुस्कुराकर उस नोट की तरफ इशारा करता और कहता—"मेरी सफलता इस नोट की कीमत से नहीं, बल्कि उस दिन लिए गए फैसले से तय हुई थी।"
कहानी की सीख:
परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों, आपकी इच्छाशक्ति से बड़ी नहीं हो सकतीं। जब तक आप खुद से हार नहीं मानते, दुनिया की कोई ताकत आपको हरा नहीं सकती!
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