सच्ची मोहब्बत चेहरे की खूबसूरती या खुशियों की मोहताज नहीं होती, वो तो मुश्किल वक्त में एक-दूसरे का हाथ थामे रहने की जिद का नाम है..."
कहानी (Story):
शाम के छह बज रहे थे। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। अर्णव बालकनी में बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था, तभी उसकी नज़र टेबल पर रखी रिया की पुरानी तस्वीर पर पड़ी। छह साल बीत चुके थे उनकी शादी को, लेकिन आज का दिन हर बार उस पुरानी और तकलीफदेह याद को ताज़ा कर देता था।
शादी के महज़ दो साल बाद, एक दिन अचानक रिया की तबियत बिगड़ने लगी। जब अस्पताल में जांच हुई, तो रिपोर्ट देखकर अर्णव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। रिया को एक दुर्लभ और गंभीर बीमारी थी। डॉक्टरों ने साफ शब्दों में कह दिया था—"इलाज बहुत लंबा और दर्दनाक चलेगा। इस बात की गारंटी भी कम है कि रिया कभी पूरी तरह से ठीक हो पाएगी।"
उस वक्त रिया अंदर से पूरी तरह टूट गई थी। खूबसूरत सपनों से भरी उसकी दुनिया पल भर में बिखर चुकी थी। एक रात जब अर्णव अस्पताल के कमरे में उसके पास बैठा था, तब रिया की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने कांपते हाथों से अर्णव का हाथ पकड़ा और रोते हुए कहा, "अर्णव, मेरी ज़िंदगी का कोई ठिकाना नहीं है। मैं तुम्हें किसी मुकाम पर अकेला या परेशान नहीं देखना चाहती। तुम मुझसे अलग हो जाओ, किसी और के साथ नई शुरुआत कर लो। मैं तुम्हारी ज़िंदगी पर बोझ बनकर नहीं रहना चाहती।"
अर्णव ने कुछ पल के लिए रिया का चेहरा देखा। फिर उसने धीमे से मुस्कुराते हुए रिया के हाथ में गर्म चाय का कप थमाया, उसके माथे पर एक गहरा बोसा लिया और बहुत प्यार से कहा—
"रिया, मोहब्बत सिर्फ हँसते-खिलखिलाते पलों में साथ चलने का नाम नहीं होती। जब तुम ठीक थी और खूबसूरत दिखती थी, तब तो कोई भी तुमसे प्यार कर लेता। लेकिन इस मुश्किल मोड़ पर अगर मैं तुम्हारा हाथ छोड़ दूँ, तो मेरी मोहब्बत झूठी कहलाएगी। तुम मेरी ज़िंदगी हो रिया, कोई बोझ नहीं। और जब तक मेरी साँसें चल रही हैं, मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।"
अर्णव के उन शब्दों ने रिया के अंदर जीने की एक नई उम्मीद जगा दी। अगले तीन सालों तक अर्णव की दिनचर्या पूरी तरह बदल गई। दफ़्तर का काम, अस्पताल के चक्कर, रात-रात भर जागकर रिया का ध्यान रखना और सबसे बढ़कर—रिया को हर पल यह अहसास कराना कि वो अकेली नहीं है। कई बार रिश्तेदारों और दोस्तों ने भी दबी ज़बान में अर्णव को अपने भविष्य के बारे में सोचने की सलाह दी, लेकिन अर्णव का फैसला अटल था।
और आज? तीन साल के लंबे और कठिन इलाज के बाद रिया पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी थी।
तभी किचन से इलायची वाली चाय की सोंधी खुशबू आने लगी। रिया मुस्कुराते हुए दो कप चाय लेकर बालकनी में आई और अर्णव के बगल में बैठ गई। उसने अर्णव के कंधे पर अपना सिर टिका दिया। दोनों की आँखों में बीते दिनों की नमी थी, लेकिन होठों पर एक गहरी तसल्ली और सुकून।
सच्चा प्यार वो नहीं जो सहूलियत में किया जाए, सच्चा प्यार वो है जो तूफानों में भी ढाल बनकर साथ खड़ा रहे।
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