ध्रुव की तारा
भाग - २८
लेखिका "अनामिका"
ध्रुव का मैसेज पढ़ते ही तारा के दिल की धड़कनें अचानक तेज़ हो गईं। उसने अपने घबराते हुए हाथों से फ़ोन जेब में रखा और किसी तरह चेहरे पर सामान्य भाव लाते हुए बोली, "अंकल-आंटी, मेरी एक सहेली की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं लग रही, मैं बस पाँच मिनट में उससे मिलकर वापस आती हूँ।" बिना किसी को संभलने का मौका दिए, वह ध्रुव के घर से बाहर निकल गई।
उसके जाते ही विजय और सुमन चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दबाए एक-दूसरे को देखने लगे। तभी सुधा से अब और सब्र न हुआ, उसने बेसब्री से पूछा, "सुमन, शाम को तुमने जो कहा था... क्या वो सच है? मुझसे अब और रहा नहीं जा रहा, इसलिए मैं ही पूछ रही हूँ।"
सुमन का उत्साह छलक पड़ा, "हाँ सुधा! इन दोनों बाप-बेटों ने मुझे कसम दी थी कि तुम्हें कुछ न बताऊँ, पर अपनी सबसे अच्छी सहेली को समधिन बनाने की खुशी मैं कैसे छुपाती!"
विजय ने मुस्कुराते हुए आनंद के कंधे पर हाथ रखा, "देखा आनंद, मैंने कहा था न कि चिंता मत कर। दोनों बच्चे बहुत समझदार हैं। ध्रुव सुबह से इसलिए गायब है क्योंकि वह तारा के लिए एक सरप्राइज प्रपोज़ल प्लान कर रहा है।"
यह सुनते ही आनंद का दिल भर आया। उसने भावुक होकर कहा, "मुझे माफ़ कर दे विजय! समाज और लोगों की बातों के डर से मैं क्या-क्या सोच रहा था..."
विजय ने उसे गले लगाते हुए कहा, "अब यह सब भूल जा यार! हमारे कॉलेज के ज़माने की यह दोस्ती अब जीवन भर की रिश्तेदारी में बदलने जा रही है।"
चारों ओर खुशी की लहर दौड़ गई। तभी सुधा की आँखें हल्की सी नम हो गईं—एक माँ का दिल आखिरकार अपनी बेटी की विदाई की बात सुनकर भावुक हो ही जाता है। सुमन ने माहौल हल्का करते हुए उसका हाथ थामा, "अरे पगली, रो क्यों रही है? मायका और ससुराल तो आमने-सामने ही हैं! आधा दिन तू अपनी बेटी-दामाद को रख लेना, आधा दिन मैं अपने बेटे-बहू को रख लूंगी!" इस बात पर चारों खिलखिलाकर हँस पड़े और अपने इस नए रिश्ते का जश्न मनाने लगे।
दूसरी तरफ, तारा की धड़कनें स्विमिंग पूल की तरफ बढ़ते हर कदम के साथ तेज़ हो रही थीं। यूँ तो सोसाइटी का यह स्विमिंग पूल हमेशा रोशनी से जगमगाता था, पर आज रात का सन्नाटा और ध्रुव का इस तरह अचानक अकेले बुलाना उसे एक अनजाने डर और घबराहट से भर रहा था।
तारा के स्विमिंग पूल एरिया के पास पहुँचते ही उसकी धड़कनें अचानक थम सी गईं, क्योंकि आँखों के सामने बिखरा नज़ारा वक्त के किसी पुराने पन्ने जैसा लग रहा था। इतने बरसों में जहाँ सब कुछ बदल चुका था, वहीं आज एक ही रात में इस जगह का हर कोना बिल्कुल वैसा ही सज़ा था जैसा उनके स्कूल के दिनों में हुआ करता था।
पानी की वही जानी-पहचानी छनछन, हल्की नीली रोशनी, और वही शांति... तारा को लगा मानो वह वक्त में पीछे लौट आई हो। उसे वे दिन याद आने लगे जब ध्रुव घंटों स्विमिंग पूल में प्रैक्टिस करता था और वह किनारे पर बैठकर, अपने पाँव पानी में डुबोए, बिना पलक झपकाए बस उसे ही देखा करती थी। पुरानी यादों की इस मीठी धुंध में डूबी तारा अभी उन हसीन लम्हों को महसूस ही कर रही थी कि तभी उसके कानों में पीछे से एक बेहद धीमी और अपनों सी आवाज़ गूँजी, "काफ़ी बदल गया है न सब... या शायद कुछ भी नहीं?"
उसने मुड़कर देखा तो ध्रुव आँखों में वही पुरानी चमक और होंठों पर वही मासूम मुस्कान लिए उसके ठीक पीछे खड़ा था।
ध्रुव को सामने देखते ही तारा के दिल में एक साथ कई अहसास उमड़ पड़े; इतने दिनों बाद उसे यूँ अपने सामने देखकर जहाँ एक तरफ खुशी महसूस हुई, वहीं अगले ही पल दिन भर न तो किसी कॉल का जवाब देने और न ही कोई मैसेज करने पर उसका मन भारी गुस्से और नाराजगी से भर गया।
उसने तुरंत अपने दोनों हाथ कमर पर टिकाए और तेज़ आवाज़ में अपनी नाराजगी जताते हुए बोली, "ध्रुव! तुम्हें ज़रा भी अंदाज़ा है कि मैं दिन भर कितनी परेशान रही हूँ? न कोई कॉल, न मैसेज... और अब अचानक मुझे यहाँ बुलाकर खड़े हो गए? और यह सब... स्विमिंग पूल का यह नज़ारा... यह सब क्या है और तुमने कैसे किया?"
"तुम न... आज भी बिल्कुल नहीं बदलीं," ध्रुव ने उसकी आँखों में झांकते हुए बहुत ही सहज लहजे में कहा, "एक सांस में इतने सारे सवाल? थोड़ा सांस तो ले लो बाबा! वैसे भी, आज तुम्हें सवाल पूछने के लिए नहीं, मुझे कुछ कहने के लिए यहाँ बुलाया है।"
तारा ने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला ही था कि ध्रुव ने उसकी उंगलियों को थोड़ा सहलाया और एक गहरी सांस ली। माहौल में एक अजीब सी खामोशी छा गई, सिर्फ स्विमिंग पूल के पानी की हल्की छनछन सुनाई दे रही थी।
"याद है स्कूल के वो दिन?" ध्रुव की आवाज़ में कोई बनावट नहीं थी, बस एक बीती हुई हकीकत का अहसास था। "जब सब मुझे बस आवारा समझते थे जो दिन-रात सिर्फ स्विमिंग पूल में पड़ा रहता है और पढ़ाई से भागता है... तब सिर्फ तुम थीं, जो मुझे डांटकर किनारे खींच लाती थीं। जबरदस्ती मेरी किताबें खोलती थीं और मुझे यकीन दिलाती थीं कि मैं खेल के साथ-साथ यह भी कर सकता हूँ।"
तारा खामोश होकर उसे सुनती रही। ध्रुव ने मुस्कुराते हुए उसके हाथों को थोड़ी और गर्माहट दी, "तारा, सच तो यह है कि आज मैं जिस मुकाम पर हूँ, अपने पैरों पर खड़ा हूँ... वो सिर्फ मेरी मेहनत नहीं है। वो तुम्हारी उस ज़िद का नतीजा है जो तुमने मुझ पर दिखाई थी। जब भी मैं थकने लगता या हार मानने लगता, तुमने मुझे संभाला है। हर मोड़ पर बिना किसी शर्त के मेरा साथ दिया है।"
ध्रुव की बातें सुनकर तारा के अंदर भावनाओं का बवंडर उठने लगा। पुरानी यादें एक-एक करके उसकी आँखों के सामने तैरने लगीं। उसकी आँखें हल्की सी नम होने लगी थीं, पर उसने तुरंत पलकें झपकाकर अपनी नमी को छुपाया और खुद को पूरी तरह टूटने से संभाल लिया। वह ध्रुव से अपनी नज़रें चुराकर स्विमिंग पूल के नीले पानी में उठती छोटी-छोटी लहरों को देखने लगी।
ध्रुव ने तारा का हाथ थोड़े और हक से थामा। उसकी आवाज़ में कोई नाटकीयता नहीं थी, बस एक ठहराव और सच्चाई थी।
"तारा, मैंने कभी खुद को परफेक्ट साबित करने की कोशिश नहीं की, और न ही आज कर रहा हूँ," ध्रुव ने उसकी ओर देखते हुए धीमी आवाज़ में कहा। "लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि ज़िंदगी के हर मोड़ पर अगर कोई इंसान मुझे बेहतर बना सकता है, तो वो सिर्फ तुम हो। लोग कहते हैं कि सही जीवनसाथी वो होता है जो आपकी खूबियों से प्यार करे, पर तुमने तो मेरी नाकामियों को भी संभाला है।"
ध्रुव थोड़ा सा मुस्कुराया और उसने तारा की आँखों में सीधे झाँका, "मैं कोई फिल्मी वादे नहीं करूँगा कि तुम्हारे लिए तारे तोड़ लाऊँगा या सब कुछ बदल दूँगा। बस इतना पूछना चाहता हूँ... क्या तुम आने वाली पूरी ज़िंदगी ऐसे ही मेरे साथ खड़े रहना पसंद करोगी? मेरी कमियों को सुधारते हुए, और मुझे सही राह दिखाते हुए... क्या मेरी हमसफ़र बनोगी?"
स्विमिंग पूल के किनारे अचानक एक गहरी खामोशी छा गई। पानी की छनछन के बीच ध्रुव बस तारा की आँखों में अपना जवाब तलाश रहा था।
अट्ठाईसवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....