Dhruv ki Tara in Hindi Love Stories by Anamika books and stories PDF | ध्रुव की तारा - भाग 30

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ध्रुव की तारा - भाग 30

ध्रुव की तारा
भाग - ३०
लेखिका: अनामिका
​ध्रुव के जाने का दिन देखते ही देखते आ पहुँचा।
​कॉलोनी के बाहर गाड़ी की डिग्गी में बिजय जी उसका सामान रख रहे थे। वहीं पास खड़े आनंद जी, सुधा जी और सुमन जी उसे लगातार हिदायतें दिए जा रहे थे—अपनी सेहत का ख्याल रखना, सही से रहना और शादी की तारीख तय होते ही छुट्टी लेकर तुरंत आ जाना।
​तारा एक कोने में खामोश खड़ी यह सब देख रही थी। ध्रुव भले ही कहने को सभी से बातें कर रहा था, लेकिन उसकी नज़रें लगातार तारा पर ही टिकी थीं। सुमन जी ने यह बात भांप ली और चुपके से इशारे से सुधा जी को भी दिखा दिया।
​सबकी मौजूदगी की वजह से ध्रुव और तारा बिछड़ने से पहले ठीक से एक-दूसरे से बात भी न कर सके। लेकिन उनकी आँखों में जुदाई का दर्द, आने वाली शादी के सपने और वो अनकही बातें साफ़ झलक रही थीं, जिन्हें वे सबके सामने ज़ुबाँ पर नहीं ला पा रहे थे।
​इसके बाद ध्रुव गाड़ी में बैठकर स्टेशन की तरफ निकल पड़ता है, और तारा दूर तक जाती हुई उसकी गाड़ी को निहारती रह जाती है।
ध्रुव जैसे ही अपने अपार्टमेंट पहुँचा, उसने सबसे पहले घर फोन करके माँ और पापा को अपने सही-सलामत पहुँचने की खबर दी। 
​ माँ से बात खत्म होते ही ध्रुव ने तुरंत तारा का नंबर मिलाया। तारा तो जैसे फोन पर ही हाथ रखे बैठी थी, एक ही रिंग में फोन उठ गया।
​"हाँ... पहुँच गए?" तारा ने उत्सुकता से पूछा।
​"हाँ बाबा, पहुँच गया," ध्रुव ने मुस्कुराते हुए कहा, और फिर शरारती लहजे में छेड़ा, "वैसे एक बात बताओ तारा, कॉल उठाने के लिए फोन हाथ में ही लेकर बैठी थी क्या? या फिर मेरी याद में इतनी बेचैन हो रही थी?"
​तारा झेंप गई, पर तुरंत खुद को संभालते हुए बोली, "ज्यादा अपने मन से बातें मत बनाओ, समझे? मैं तो बस वैसे ही फोन देख रही थी। और मुझे क्या पड़ी है तुम्हारी याद में बेचैन होने की!"
​"अच्छा? इतना झूठ? जब गाड़ी जा रही थी, तब दूर तक कौन एकटक मुझे ही ताक रहा था? माँ बता रही थीं कि तेरी आँखें भर आई थीं," ध्रुव ने हँसते हुए उसकी टांग खींची।
​"आंटी भी न... कुछ भी कहती हैं! और तुम ज्यादा उड़ो मत, मैंने बस ऐसे ही देखा था," तारा ने बनावटी गुस्से में कहा।
​"अच्छा बाबा, मान लिया! पर सच बताऊँ तारा... यहाँ आते ही यह अपार्टमेंट कितना खाली-खाली लग रहा है। दिल तो कर रहा है कि सब छोड़-छाड़कर अभी के अभी तेरे पास वापस भाग आऊँ," ध्रुव की आवाज़ में अचानक एक गहरा अपनापन और तड़प उतर आई।
​तारा का दिल ज़ोर से धड़क उठा। उसकी आवाज़ एकदम धीमी हो गई, "पागल मत बनो ध्रुव... बस जल्दी से अपनी छुट्टियां पक्की करो और शादी की तारीख निकलवाओ। फिर तो तुम्हें पूरी ज़िंदगी मुझे ही झेलना है।"
​"झेलना? इसे तो मैं अपनी खुशकिस्मती मानूँगा मैडम!" ध्रुव ने प्यार से कहा।
दोनों के बीच यूँ ही थोड़ा सा प्यार और ढेर सारी मीठी नोक-झोंक चलती रही, जिसने उनके बिछड़ने के सूनेपन को आने वाले कल की मिठास से भर दिया।
शादी की तारीख पक्की होते ही दोनों घरों में जैसे खुशियों का सैलाब आ गया था। एक तरफ आनंद जी और बिजय जी कार्ड छपवाने से लेकर वेन्यू की बुकिंग में दिन-रात एक कर रहे थे, तो दूसरी तरफ सुमन जी और सुधा जी तारा के साथ गहनों और कपड़ों की खरीदारी में व्यस्त हो गई थीं। पूरे घर में शादी की चहल-पहल और उत्साह का माहौल था।
​लेकिन दूसरी ओर, ध्रुव एक अलग ही जंग लड़ रहा था। शादी के लिए लंबी छुट्टी पाना इतना आसान नहीं था। बॉस की तरफ से साफ हिदायत थी—जाने से पहले पेंडिंग प्रोजेक्ट्स खत्म करने होंगे। ध्रुव सुबह से देर रात तक फाइलों और लैपटॉप की स्क्रीन में उलझा रहता। उसे घर पहुँचने की बेताबी भी थी, शादी की खुशी भी, लेकिन काम का भारी बोझ उसकी रातों की नींद उड़ा रहा था।
​देर रात दफ़्तर से लौटकर जब ध्रुव थका-हारा अपने बिस्तर पर गिरता, तब तारा का वीडियो कॉल आता। स्क्रीन पर आते ही तारा कभी लहंगे के मैचिंग की शेरवानी का रंग पूछती, तो कभी हल्दी के कपड़ों के विकल्प दिखाकर उसकी राय मांगती। ध्रुव चेहरे पर जबरदस्ती मुस्कान लाकर उसकी हर बात का जवाब देता और हलकी नोक-झोंक भी करता।
​पर तारा से उसकी यह थकान छुप न सकी। ध्रुव भले मुस्कुरा रहा था, लेकिन उसकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे और बिखरे हुए बाल उसकी कड़ी मेहनत की गवाही दे रहे थे।
​"ध्रुव..." तारा ने अचानक बीच में ही बात काटते हुए बड़े प्यार से पुकारा।
​"क्या हुआ? यह वाला कलर पसंद नहीं आया क्या?" ध्रुव ने झेंपते हुए पूछा।
​"तुमने खाना खाया? और आज कितनी देर सोए?" तारा की आवाज़ अचानक भारी हो गई।
​ध्रुव पल भर के लिए चुप हो गया, फिर बात टालते हुए बोला, "अरे बाबा, काम थोड़ा ज़्यादा है बस, सब ठीक है।"
​तारा ने स्क्रीन पर दिख रहे उसके चेहरे को निहारते हुए कहा, "मुझे सब दिख रहा है ध्रुव। तुम हमारे आने वाले कल के लिए, मेरे लिए कितनी मेहनत कर रहे हो... पर प्लीज अपनी सेहत का भी ध्यान रखो। अगर तुम बीमार पड़ गए, तो मेरी खुशियों का क्या होगा?"
​तारा की आँखों में छिपी चिंता और अपनापन देखकर ध्रुव का सारा तनाव जैसे पल भर में गायब हो गया। उसके चेहरे पर एक सच्ची और सुकून भरी मुस्कान आ गई। दोनों के बीच की यह खामोश समझ और भावनात्मक जुड़ाव उनके रिश्ते को और खूबसूरत बना रहा था।
तारा के इस आत्मीय प्यार ने ध्रुव की सारी थकान मिटा दी थी। स्क्रीन के उस पार से दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में झांका—जहाँ शब्दों से ज़्यादा उनके वादे बोल रहे थे।
​"बस कुछ दिनों की बात है तारा... फिर कोई दूरी नहीं होगी," ध्रुव ने फुसफुसाते हुए कहा।
​तारा ने मुस्कुराकर हाँ में सिर हिलाया और फोन कट गया। ध्रुव को अब काम का बोझ भारी नहीं लग रहा था, क्योंकि उसे पता था कि इस मेहनत की मंज़िल कितनी खूबसूरत है। और फिर देखते ही देखते, इंतज़ार की वो घड़ियाँ बीत गईं और आ पहुँचा वो खास दिन... जिसका दोनों को बरसों से इंतज़ार था।
तीसवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....