(खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही है। दीवार पर टंगे दर्पण में करन अपनी परछाई देखता है।)
करन (धीरे से) बोला –
ये... ये मेरी आँखें लाल क्यों हैं...?
(घबरा कर पीछे हटता है) (वो अपने चेहरे को बार-बार छूता है। उसके चेहरे पर डर और मासूमियत दोनों झलकते हैं।)
सिमरन (पीछे से आती है, मुस्कुराकर )बोली –
क्या हुआ करन? सुबह-सुबह आईने से डर गए क्या?
करन (घबराया हुआ)बोला –
नहीं... बस... मेरी आँखें ऐसी क्यों हैं, परी? बाकी सबकी तो काली होती हैं... तुम्हारी भी काली हैं...मेरी लाल क्यों?
(सिमरन एक पल के लिए चुप हो जाती है। उसके चेहरे का रंग उड़ जाता है।)
सिमरन (धीरे से)बोली –
शायद... शायद इसलिए कि आप बहुत ख़ास हो करन। भगवान ने आपको अलग बनाया है।
करन (भोलेपन से)बोला –
तो क्या तुम भी अलग हो? तुम्हारी आँखें तो मेरी जैसी नहीं हैं...
(सिमरन उसकी बात सुनकर पल भर को ठहर जाती है। उसके होंठ काँपते हैं। वो अपने आँसू छिपाकर मुस्कुराने की कोशिश करती है।)
सिमरन (धीरे से) बोली–
मैं अलग नहीं हूँ करन... पर अगर मेरी आँखें आपकी जैसी होतीं, तो शायद मैं आपकी परी नहीं कहलाती।
(करन मासूमियत से मुस्कुराता है और फिर सिमरन की गोद में सिर रख देता है।)
करन (धीरे से) बोला —
परी... मुझे तुम्हारे पास रहना बहुत अच्छा लगता है। जब तुम पास होती हो तो डर नहीं लगता।
(सिमरन उसके बालों में हाथ फेरती है, आँखों से आँसू गिरते हैं, पर आवाज़ में कोमलता है।)
सिमरन (मन ही मन) बोली–
“काश करन जी...आपको ये पता न चले कि तेरी ये लाल आँखें किसी वरदान नहीं, बल्कि उस श्राप की निशानी हैं... जो आपके साथ-साथ मुझे भी निगल रहा है।”
(धीरे-धीरे दिन बीतता है।)
(शाम को रसोई में सिमरन काम कर रही है। करन पास में खड़ा है। वो प्याला उठा कर देती है।)
करन (मुस्कुराते हुए) बोला–
परी, तुम थक गई होंगी... लो, मैं मदद कर दूँ।
(वो छोटी-छोटी चीज़ें उठाता है, पानी लाता है, बर्तन धोने की कोशिश करता है। सिमरन उसे रोकना चाहती है, पर उसकी मासूम कोशिश देखकर कुछ नहीं कह पाती।)
सिमरन (धीरे से) बोली –
करन...आपको कुछ करने की ज़रूरत नहीं, बस बैठ जाओ।
करन (हँसते हुए) – नहीं! जब मैं मदद करता हूँ तो अच्छा लगता है। लगता है मैं कुछ सही कर रहा हूँ।
(वो सिमरन के पास आता है और हल्के से उसकी कमर के पीछे हाथ रखता है। उसकी आँखों में मासूमियत है, कोई गलत भावना नहीं। बस अपनापन।)
करन (धीरे से) बोला–
अब तुम थक जाओ तो मैं तुम्हें सुला दूँगा... जैसे तुम मुझे सुलाती हो।
(सिमरन एक पल को ठहर जाती है। उसकी आँखें भीग जाती हैं। वो करन को गले लगाती है।)
सिमरन (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोली –
आप मेरा सबसे बड़ा सुकून हो करन... पर डर भी... क्योंकि जब आपको सच पता चलेगा, शायद आप ये परी पहचान ही नहीं पाओगे।
(करन मुस्कुराते हुए सिमरन के सीने से लग जाता है और आँखें बंद कर लेता है। वो मासूमियत से गहरी नींद में चला जाता है।) (सिमरन उसके बालों को सहलाती है और धीरे से फुसफुसाती है)
सिमरन (धीरे से)बोली –
“सो जाओ करन... जब तक जागो, मैं आपकी वही परी रहूँ जो आप देखना चाहते हो...”
( सिमरन के आँसू करन के बालों पर गिरते हैं। पृष्ठभूमि में हल्की संगीत धुन बजती है — एक अनकहा डर और अपार प्रेम का मिश्रण।)
(चाँदनी खिड़की से अंदर आ रही है। बाहर जंगल के बीच हल्की सी हवा चल रही है। कमरे में सिमरन लैपटॉप पर कुछ काम कर रही है, तभी अचानक बाहर से किसी के कदमों की आवाज़ आती है।)
सिमरन (धीरे से, चौक कर)बोली –
ये... कौन है वहाँ...?
(दरवाजे की आहट होती है। अचानक कुछ परछाइयाँ कमरे में घुसती हैं। वो वही वैंपायर बिरादरी के लोग हैं जो पहले करन को खत्म करना चाहते थे। उनके चेहरे पर डरावनी हँसी और आँखों में खून उतर आया है।)
वैंपायर लीडर (तेज़ आवाज़ में) बोला–
अब वो करन तो पागल बन चुका है... अब कोई नहीं रोक सकता हमें!
दूसरा वैंपायर (हँसते हुए) बोला–
और उसकी ये प्यारी परी... अब हमारी होगी!
(सिमरन धीरे-धीरे पीछे हटती है, डर उसकी आँखों में साफ झलकता है।)
सिमरन (धीरे से) बोली–
नहीं... करन...!
(कमरे के कोने में छोटा सा करन बैठा है। वो अपनी खिलौना कार को पकड़कर खेल रहा है। अचानक आवाज़ सुनकर उसकी आँखों में हलचल होती है। वो डर से सिमरन की तरफ देखता है।)
करन (डरते हुए) बोला —
परी... ये कौन लोग हैं...?
(वैंपायर उसके पास आते हैं। )
सिमरन चिल्लाती है — “पीछे हटो!”
(पर वो बेबस है। करन अपनी लाल आँखों से उन्हें देखता है। फिर अचानक उसका चेहरा बदलने लगता है — आँखों की लाल चमक और तेज़ होती है, चेहरे पर गुस्से की लकीरें उभर आती हैं। उसकी नाड़ी तेज़ चलने लगती है।)
(करन के अंदर छिपा असली रूप जाग उठता है।)
उसकी पीठ से हल्की धुंध जैसी काली लपटें निकलती हैं। हवा काँप उठती है।
करन (गहरी, भारी आवाज़ में)बोला –
किसने कहा... कि मैं पागल हूँ...?
(वैंपायर पीछे हटते हैं। करन अब हवा में उठ जाता है। उसकी आँखें आग जैसी जल रही हैं।)
सिमरन (आश्चर्य और डर में)बोली –
करन...?
करन (अपने असली रूप में)बोला –
मेरी परी को कोई छू भी नहीं सकता!
(वो बिजली जैसी गति से आगे बढ़ता है। उसकी हर हरकत से हवा की लहरें उठती हैं। वैंपायर उस पर झपटते हैं, लेकिन करन उन्हें एक-एक कर पीछे फेंक देता है। उसकी शक्ति असीम है। वह सिमरन को अपनी बाहों में लेकर उड़ जाता है और हवाओं में लड़ाई जारी रहती है।)
(कुछ देर बाद सब शांत हो जाता है। सारे वैंपायर धूल में मिल चुके हैं। चाँदनी कमरे में फिर से फैल जाती है। करन धीरे-धीरे जमीन पर उतरता है। उसकी आँखें धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं। वो सिमरन को अपने सीने से लगाए रहता है।)
सिमरन (धीरे से, काँपती आवाज़ में)बोली –
करन... आप... आप ठीक तो हो...?
(करन कुछ नहीं बोलता। बस हल्के से मुस्कुराता है। उसकी आँखों में अब फिर वही मासूमियत लौट आती है। वो सिमरन को उठाकर बिस्तर तक लाता है।)
(वो धीरे से सिमरन को बिस्तर पर लिटाता है, और खुद उसके पास आकर लेट जाता है।)
करन (धीरे से, नींद भरी आवाज़ में)बोला –
परी... अब डरो मत... मैं हूँ ना...
(सिमरन उसे देखती है। आँसू उसकी आँखों से गिरते हैं। करन उसका हाथ पकड़ कर उसकी गोद में सिर रख देता है और सो जाता है। उसकी साँसें फिर से मासूम बच्चे जैसी हो जाती हैं।)
सिमरन (धीरे से, खुद से)बोली –
ये कौन सा वरदान है, करन... या फिर कोई श्राप...? जो हर बार आपको मुझसे दूर कर देता है...
अगले दिन सुबह।
(सूरज की रोशनी कमरे में फैलती है। सिमरन उठती है और देखती है — करन फिर पहले जैसा 8 साल का बच्चा बन चुका है। वो उसकी तरफ मुस्कुराते हुए कहता है।)
करन (मासूमियत से)बोला –
परी... देखो, मैंने तुम्हारे लिए फूल तोड़ा है...
(सिमरन की आँखें भर आती हैं।)
वो मुस्कुरा कर कहती है —
“धन्यवाद, करन।”
(और उसे गले लगा लेती है।)
( सिमरन की बाँहों में करन की मासूम मुस्कान है — पर पीछे दीवार पर उसकी परछाई अब भी लाल आँखों वाली है।)