Devil ki Daastaan in Hindi Love Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 65

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Devil की दास्तान - 65

बिजली की चमक हवेली की पुरानी दीवारों पर पड़ती है।
दरवाज़ा ज़ोर से खुलता है — करन अपनी बाँहों में सिमरन को लिए अंदर आता है। दोनों पूरी तरह भीगे हुए हैं। सिमरन के कपड़ों पर खून के हल्के निशान हैं।)

करन (थकी आवाज़ में) बोला - 
अब कोई तुम्हे छू नहीं सकेगा…अब तुम सुरक्षित हो…

(वो सिमरन को धीरे से पलंग पर लिटाता है। सिमरन काँपते हुए उसकी ओर देखती है। उसकी आँखों में डर नहीं, सिर्फ़ करन के लिए चिंता है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
करन… आप ठीक हो ना?

करन (साँस लेते हुए) बोला - 
ठीक… 

(रुककर) बोला - 
शायद नहीं।
कभी-कभी लगता है मेरे अंदर दो लोग रहते हैं —
एक जो तुमसे प्यार करता है… और एक जो तुम्हारा खून पी जाना चाहता है।

(सिमरन का दिल काँप जाता है। वो धीरे से उठती है और उसके चेहरे को अपने हाथों से थाम लेती है।)

सिमरन (गहरी आवाज़ में) बोली - 
तो उस दूसरे करन को जीतने मत दो। आप मेरे करन हो…वो करन… जो किसी को दर्द नहीं देता।

(करन की आँखें लाल हो जाती हैं, जैसे अंदर का दानव जाग रहा हो।
वो अपनी गर्दन पकड़ता है — दर्द से कराहता है।)

करन (गुस्से में) बोला - 
नहीं सिमरन! मैं खुद को रोक नहीं पाऊँगा!
वो ताबीज़… वो ही मुझे बाँधे रखता था… अब वो चला गया!

(वो दीवार पर मुक्का मारता है — दीवार पर खून के निशान बन जाते हैं। सिमरन दौड़कर उसके सामने आती है।)

सिमरन (आँखों में आँसू लिए ) बोली - 
आपको ताबीज़ नहीं चाहिए करन…आपको बस मैं चाहिए।

(वो उसके सीने पर हाथ रखती है। धीरे-धीरे उसके लाल आँखों का रंग हल्का पड़ने लगता है। वो काँपता है, साँसें भारी हो जाती हैं।)

करन (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोला - 
तुम… क्या कर रही हो सिमरन?

सिमरन (धीरे से, आँसू गिराते हुए) बोली - 
मैं आपको अपने प्यार से बाँध रही हूँ…जैसे वो ताबीज़ आपको रोकता था…अब मेरा प्यार ही आपको रोक लेगा…

(धीरे-धीरे करन की आँखें फिर से काली हो जाती हैं। वो गिर जाता है — सिमरन उसे थाम लेती है। कमरे में सन्नाटा छा जाता है। सिमरन उसके बालों को सहलाते हुए फुसफुसाती है —)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
सो जाओ करन… सब ठीक हो जाएगा…
मैं आपके साथ हूँ… हमेशा…

(पृष्ठभूमि संगीत बढ़ता है — “दिल के अंदर अंधेरा भी रोशनी से डरता है... " जैसी रहस्यमयी लाइनें बजती हैं।
बिजली की एक हल्की चमक कमरे में होती है, और करन के चेहरे पर पहली बार एक शांत मुस्कान दिखती है।)

“वो ताबीज़ समुद्र में खो गया… पर प्यार ने अपना रास्ता ढूंढ लिया।
अब करन को इंसान बनाने का समय आ चुका था —
पर क्या अंधकार इतनी आसानी से हार मानता है?”

(सूरज की हल्की किरणें पर्दों से छनकर कमरे में आ रही हैं।
टेबल पर लैपटॉप खुला है। सिमरन टेबल के पास बैठी कुछ काम कर रही है। कभी फाइलें देखती है, कभी लैपटॉप पर टाइप करती है।
कमरे में धीमी शांति है — बस उसकी साँसों की आवाज़।)

(सिमरन टेबल से उठती है, अपने फोन को चार्जिंग से निकालने लगती है तभी अचानक पीछे से किसी की मज़बूत बाँहें उसे घेर लेती हैं। उसके हाथ में पकड़ा फोन नीचे गिर जाता है। चूड़ियाँ ज़ोर से टकराती हैं और टूट जाती हैं। उसके कंधे पर एक गर्म साँस महसूस होती है — करन की।)

सिमरन (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोली - 
करन…

(वो जानती थी कि ये वही है। पर इस बार करन की पकड़ पहले से ज़्यादा मज़बूत थी —
जैसे उसके अंदर कोई तूफ़ान हो। सिमरन के हाथों में दर्द हुआ, पर उसने कोई आवाज़ नहीं की। उसने उल्टा अपने हाथों से करन की बाहों को थाम लिया —धीरे से आँखें बंद कर लीं।)

सिमरन (फुसफुसाते हुए) बोली - 
शांत हो जाओ करन… मैं यहीं हूँ…

(वो धीरे-धीरे मुड़ती है। उसका चेहरा करन के सीने से लग जाता है।
वो उसकी दिल की धड़कन महसूस कर सकती थी —
तेज़, बेचैन, और ग़ुस्से से भरी।)

सिमरन (धीरे से, टूटती आवाज़ में) बोली - 
मुझे पता है आप डर रहे हो…पर डर से नहीं, प्यार से जीतना सीखो करन…

(करन की साँसें भारी हैं। वो कुछ पल तक सिमरन के सिर पर नज़र डालता है। फिर धीरे से उसकी पकड़ ढीली करने लगता है।
सिमरन उसे कसकर पकड़ लेती है, मानो डर हो कि वो फिर दूर चला जाएगा।)

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
मत जाओ…अब और मत भागो मुझसे…

(करन एक पल के लिए ठहरता है। उसकी आँखों में लालिमा चमकती है, पर वो खुद को रोक लेता है। वो सिमरन के बालों को देखता है — उनमें फँसे टूटी चूड़ियों के टुकड़े चमक रहे हैं। वो एक टुकड़ा उठाकर अपनी हथेली में रखता है, और धीरे से कहता है —)

करन (भारी आवाज़ में) बोला - 
तुम्हें चोट लग जाएगी…मेरे पास मत आया करो सिमरन…

(वो उसकी पकड़ से खुद को छुड़ाता है। धीरे-धीरे उसकी ओर से पीछे हटता है। सिमरन वहीं खड़ी रह जाती है — टूटी चूड़ियाँ ज़मीन पर बिखरी हैं, और उसका दिल भी उन टुकड़ों की तरह बिखरा हुआ लगता है।)

(करन दरवाज़े तक जाता है, बिना पीछे देखे रुकता है। उसके होंठ काँपते हैं — जैसे कुछ कहना चाहता हो पर रुक जाता है। वो कमरे से बाहर चला जाता है।)

(सिमरन कमरे के बीचोंबीच खड़ी है। उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं।
वो टूटी चूड़ियाँ उठाती है, एक टुकड़ा अपने हाथ में दबाती है और फुसफुसाती है —)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
कभी तो रुक जाओगे…कभी तो फिर से वही करन बनोगे… जो मुझसे प्यार करते थे…

(कहते हुए वो धीरे से फर्श पर बैठ जाती है, कमरे की हवा भारी हो जाती है। दूर कहीं घंटी बजने की आवाज़ आती है शायद किसी नए मोड़ का संकेत।)

“प्यार और दर्द के बीच की ये लड़ाई अब अपने चरम पर थी।
सवाल ये नहीं था कि करन बचेगा या नहीं —
सवाल ये था कि सिमरन कितनी देर तक उसे खुद से बाँधे रख पाएगी…”