Prashno ki Potli in Hindi Short Stories by Rewa Tibrewal books and stories PDF | Prashno ki Potli

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Prashno ki Potli

Name – Rewa Tibrewal

Email I’d - rewatibrewal@yahoo.co.in

प्रश्नों की पोटली

1. राखी (लघु कथा )

आज राखी है मुन्नी ने बोला " भइया इस बार गुड़िया लूँगी ......पिछली बार भी आपने बहला फुसला कर कुछ न दिया था मुझे " गणेश बोला इस बार पक्का और मुस्कुरा दिया , उसने फूल बेच कर रुपये जो जोड़ रखे थे।

लेकिन दोपहर को मुन्नी को बुखार आ गया ,डॉक्टर और दवा के चक्कर मे सारे पैसे चले गए....... फिर भी उसने हार न मानी फिर से फूल बेचने निकल पड़ा , उसे विश्वाश था शाम के समय उसके सारे फूल बिक जाएंगे। और वो मुन्नी को प्यारी सी गुड़िया देगा।

पर अचानक शहर मे अफरा तफरी मच गयी .......दंगा हो गया था .......फिर वहीँ सरकार के किसी बात का विरोध करने… अब न फूल बिके न ही वो मुन्नी की इच्छा पूरी कर पाया .... रो पड़ा आखिरकार…

" जाने क्या मिलता है इन दंगाइयों को सोचने लगा "

2. ठेका (लघु कथा )

रोज़ की तरह आज भी राम बैलून बेचने निकल पड़ा समुन्दर किनारे....... आज उसे जल्दी घर भी जाना था ,माँ बीमार थी बैलून खत्म कर दवा लेना था…उसने मन ही मन बोला वाह ! अब बस २ - ४ ही बचे हैं ….... तभी उसे एक साहब दो बच्चों के साथ दिखे , आँखों मे चमक आ गयी….... उसने बोला " साहब बच्चों के लिए ले लो…एक बार बोला फिर दुबारा बोला "……तबतक साहब को गुस्सा आ गया ,"मुझे नहीं चाहिये समझ नहीं आता के " ....... राम ने फिर बोला " साहब माँ बीमार है , आप ये ले लोगे तो बच्चे खेल लेंगे और मेरे दवा के पैसे पुरे हो जाएंगे "....... साहब गुस्से मे लाल पीले होते हुए बोले "मैंने ठेका ले रखा है क्या ? जा यहाँ से "

विधि का विधान देखो ,घर लौटते समय एक्सीडेंट हो गया ……दोनों बच्चे बुरी तरह जख्मी हो गए और icu मे भर्ती हुए ,उसे अपने बॉस के पास जाना पड़ा पैसे लेने , बोला "बॉस कुछ एडवांस दे दीजिये , बच्चे हॉस्पिटल मे हैं …… बॉस ने टका का सा जवाब दिया "मैंने तुम्हारे परिवार का ठेका ले रखा है क्या ,और एडवांस नहीं दे सकता "

3. पापा की नाराज़गी (लघु कथा )

निशा ने जब पापा से कहा की वो डांस सीखना चाहती है और उसे ही अपना कर्रिएर बनाएगी ,तो गुस्से से आग बबूला हो गए मोहन लाल……असल मे सोनल को एक बड़ा अफसर बनाने का सपना था उनका।

माँ के बहुत समझने पर कुछ बोला तो नहीं , न ही निशा को रोक , लेकिन बेटी से बात करना बंद कर दिया।

पुरे दो साल तक ये सिलसिला चलता रहा , फिर एक दिन जब वो टीवी देख रहे थे तो निशा को उन्होंने एक डांस प्रतियोगिता मे नाचते देखा जिसमे उसे प्रथम पुरस्कार भी मिला ,सारे लोग उसकी वाह वाही कर रहे थे।

ये सब देख कर उनका गुस्सा रफूचक्कर हो गया ,बेटी तो पास नहीं थी तो उन्होंने उसकी मुस्कुराहट से भरी चंचल तस्वीर को गले से लगा लिया।

4.पुरानी तस्वीर (लघु कथा )

सोनल आज अलमारी साफ़ कर रही थी , ऑफिस की छुट्टी थी …तभी उसकी नज़र एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी ,

वो तस्वीर जब वो ४ महीने की थी तब की थी।

उस तस्वीर मे उसकी बड़ी दीदी रीता उसे बड़े प्यार से निहार रही थी , उस समय से लेकर आज तक रीता दीदी उसकी ढाल बनी रही , चाहे घर हो बहार हो स्कूल हो या मम्मी पापा की डांट , हर जगह दीदी उसी का साइड लेती थी.... इतना ज्यादा स्नेह करती थी सोनल से।

पर दिल का दौरा पड़ने से अचानक चल बसी कुछ महीनो पहले ,अपनी १० साल की बेटी को छोड़ कर …

अब रीता की बारी बारी थी वो अपनी भांजी की ढाल बनेगी और उसे हर तकलीफ से दूर रखेगी

5. क्या सच मे कामकाजी महिलाएं आज़ाद होती हैं ??

हमारे पड़ोस मे रहने आई नीना पढ़ी लिखी और जॉब भी करती थी.. मुझे बहुत जलन होती थी उससे....शादी शुदा होते हुए भी आज़ाद....सुबह ऑफिस और शाम ढले घर....पुरे दिन उसे घर पर पीसना नहीं पड़ता था ....और एक मैं पढ़ी लिखी होते हुए भी घर पर....बच्चे सास ससुर पति बस यही तक दुनिया थी ....पैसे भी पति से मांगने पड़ते थे....न घूमना न फिरना....और नीना के मज़े ही मज़े ....खुद के पैसे ...कहीं भी घुमो कुछ भी खरीदो.....रोज़ सोचती नीना सी बनाना चाहिए पर .....

एक दिन नीना मेरे घर आई बहुत परेशान दिख रही थी तो बैठा लिया उसे....उसने जो बताया उससे मेरी आँखें खुल गयी ।
नीना ने कहा भाभी "क्या बताऊ पीस गयी हूँ घर और ऑफिस के बीच...सुबह घर का सारा काम खाना टिफ़िन ....भागते भागते ऑफिस और शाम को थक कर घर और फिर वही घर के काम....फिर भी बात सुनती रहती हूँ सास से .....रात तक इतना थक जाती हूँ की बस बिस्तर ही नज़र आता है ...पति के साथ बात करने का भी समय नहीं....रविवार एक छुट्टी का दिन उस दिन हफ्ते भर के काम पेंडिंग वो करने मे सारा समय चला जाता है....अपने पैसे पर भी अपना हक़ नहीं ....न घूमने का समय न आराम का....जीवन चक्कर घिन्नी बन गयी है कभी सोचती हूँ जॉब छोड़ दूँ " और उसकी आँखें भर आई |

ये सुन कर बार बार एक सवाल मन मे आता है क्या सच मे कामकाजी महिलाएं आज़ाद होती हैं ??

रेवा