Ek maa ka apne bete ko patra books and stories free download online pdf in Hindi

एक माँ का अपने बेटे को पत्र

संपादक जी

मातृभारती के पत्र लेखन प्रतियोगिता में मेरा बेटे के नाम पत्र प्रेषित है |

सादर

शोभा रस्तोगी

09650267277

shobharastogishobha@gmail.com

मेरे दिल के पुरसुकूं मेरे बेटे

ढेर स्नेह व आशीर्वाद

कैसे हो ? नए माहौल में सेट हो गए होंगे | गौरवान्वित हूँ मैं कि तेरी माँ हूँ | तेरे संघर्षों की साक्षी रही हूँ सदा | किरच किरच बिखरे तेरे सपनों को अपनी आँखों में सँभाला मैंने पर जिंदगी तो उन्हें तू ही दे सकता था और दी तूने | आँखों में सूखेपन तदुपरांत उससे उपजी भीषण समस्याओं से लड़ते लड़ते अनेकानेक इलाज किए | ऊपरवाले के बदले नामों की तख्ती लगी हर चौखट पर नाक रगड़ी मैंने | अनगिन बार राई नून किए | खाने पीने के तब्दीला इंतज़ाम किए | राहु – केतु के दान दिए | किन्तु तेरा रोग तो अंगद का पाँव हो गया |

तेरी बीमारी और आकांक्षाओं के मध्य चौड़ी खाई जीवित खड़ी थी | जिसका नाप तू ले चुका था | तूने योग - ध्यान का सहारा लिया | तेरी हर संभव कोशिश रहती पढ़ाई में नं वन आने की | कहीं से भी, किसी से भी, किसी भी तरह की हार तुझे बर्दाश्त न थी | तेज सर दर्द और आँखों में जलन के वक़्त तू रात 11 बजे मेरे पास आ जाता | मुझसे लिपट जाता और कहानियाँ सुनाने की मनुहार करता | ‘ मुझसे बात करो , मम्मा | बच्चे - बड़े किसी की भी कहानी सुनाओ |’ रसोई से मुझे खींच लाता | कहता – ‘बात करो मुझसे | कहीं फ़िर काम ही करती रह जाओ | मैं मिलूं ही नहीं |’ सुबह जल्दी जल्दी काम निबटाते स्कूल की नौकरी पर जाने को होती कि तू आँखों में गहरी शिकायत लिए आ बैठता – मां, मत जाओ न |’ कितने हौल सीने पे धक धक करते | कितनी छुट्टियाँ लूँ ? समझ न आता | पत्थर दिल के साथ ड्यूटी पर चली भी जाती तो पल पल तेरा ही ख्याल रहता | दिल के कोने से वो मंजर झाँक झाँक जाता जो किसी सूरतेहाल में मुझे गवारा न होता | घर पहुँचते ही तुझे देख राहत की साँस लेती | तेरे लिए तेरी पसंद का स्वादिष्ट खाना बनाती | तू मेरे ओर पास रहता | बतकहियां और कहानी की जिद | कित्ती ही कहानियों की पुनरावृत्ति | ध्रुव, नचिकेता, प्रह्लाद, रामायण और महाभारत | हर कहानी पर चर्चा होती | तेरे प्रश्न मेरे जवाबों से नासंतुष्ट रहते | उनके लॉजिक मुझे बताता | मैं तेरे पांडित्य पर अभिभूत हो जाती | ‘ तू परम ज्ञानी है | सब पता है तुझे | फ़िर क्यों सुनता है कहानी और पूछता है सवाल ?’ ‘ मैं आपका टैस्ट लेता हूं |’ और उन्मुक्त खिलखिलाहट उलीच देता | तेरी निश्छल हँसी को मैं पूरी बांहों में भर आकाश समेट लेती | कोरों से पौंछ लेती टपके मोती कि किसी वैरी की नज़र न लग जाए मेरी इस दौलत पर | मुझे रोता देख कहता तू –रोनेवाली मम्मी’ | फ़िर हँसा देता | अपनी आंखें थकने के उपरांत कहता—बाँचो मेरी किताब | मैं सुन रहा हूं |’ अंग्रेजी की भारी भरकन्म पोथियां पढ़ती और तू उन्हें समझता, दोहराता | तेरे साथ की इस यात्रा में मुझे भी नाना ज्ञान अनुभव होते | अब तक तूने प्राणायाम को साध लिया था | तेरे उठने पर – 4 बजे, 5 बजे 6 बजे या 9 बजे प्राणायाम पक्का होता | यदि प्रात: 3 बजे कहीं जाना होता तो तू 2 बजे उठता और प्राणायाम अपने साधक पर मुस्कुरा रहा होता | कोई योग तूने न छोड़ा | आखिर इस साधना ने रंग दिखाया | राहों की गिरह खुलती गईं तेरी परेशानी को मात दे | कुछ दिक्कतें हालांकि दाएं बाएं निगाहबानी भी करती रहीं पर पस्त हौसलों के साथ | चैन्नैई में बी टेक की पढ़ाई करते हुए अनेक प्रौजेक्ट पर काम करता रहा | तेरी लगन और पक्की धुन को देख तेरे शिक्षक भी तुझसे जुड़ते गए | तेरे हौसलों में आवाज न थी पर उड़ान जबर्दस्त तरीके से ऊँची थी | तमाम बीमरियों से लड़कर जिन हस्तियों ने अपने ख्वाबों को स्थाइत्व दिया वे तेरे आदर्श बने | अल्फ़्रेड नाबेल, आइंस्टीन, मैडम क्यूरी आदि आदि | बी टेक की शिक्षा लेते हुए बढ़िया स्कोर और दमदार अध्ययन तो प्राप्त किया ही , कोचिंग भी ली एम टेक की | फ़िर पाई गेट परीक्षा में 38 वीं रैंक | और पटखनी दी समस्याओं को | विश्वास तो था तेरी बेहिसाब मेहनत पर किन्तु भरोसा अपने भाग्य से चार कदम सरका हुआ मालूम देता था | किस्मत जब जब लगी है मेरे गले, खुश्बू में फ़ांस लिपटे मिली है | हम दिल्ली में तुझसे बहुत दूर थे | तू अकेले ही संघर्षों में झूल रहा था और परास्त कर रहा था उन्हें | तय शुदा जीत अब तेरे हक़ में जिन्दा थी | विपरीत परिस्थितियां जीत की मानक होती हैं | देश के सभी आई आई टी तुझे ससम्मान बुला रहे थे | तूने कानपुर [ एयरोस्पेस ] चॉइस किया | सुदूर अंतरिक्ष में जाने का सपना, स्टीफ़न हॉकिंस को पढ़ना जैसी नाना बातों ने तेरे आकाश से सपनों का पता पहले ही दे दिया था | अब तेरे सपने तेरी ज़द में थे | तूने आकाश चुना | अपनी राह स्वयं प्रशस्त की |

अब रिसर्च करना चाहता है न, तू बेटा | रोकूँगी नहीं , नौकरी के लिए नहीं कहूँगी | कमाई के लिए कहने से तेरा करीब आ रहा सपना रूक जाएगा | तू देश को वह ऊँचाई देना चाहता है जहाँ से सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्ताँ हमारा दिखता है | अबुल कलाम , कल्पना चावला के सपने भरपूर सांस ले रहे हैं तुझमें | इतिहास में दर्ज़ तेरी जीतों ने तेरी बहन को भी स्वर्णिम भविष्य दिया है | उसके ख्वाब भी अपने पूरे शबाब पर हैं | अपनी लाइन में वह भी आगे आगे है | इन सब बातों में लिपटी है तेरे सच्चे इंसान होने की सहज महक जो हर किसी को आकर्षित कर लेती है | तू फ़ोन पर भी मेड को नमस्ते कहता है | घर आने पर उसके पाँव छूता है | परिवार में सभी को तुझ पर नाज है | दादा – नाना के घर सभी तेरे जैसे सौम्य, सरल, कुशाग्र बच्चे चाहते हैं | तेरे सपनों की सौगंध, तू जो चाहता है तुझे मिले और तू इसी तरह परचम लहराता रहे | एक कविता के रूप में मेरा आशीर्वाद तेरे लिए-

अंधेरे घनघोर बारिश से टपकते रहे

पस्त करता रहा हौसलों का सूरज उन्हें |

क्षण क्षण के संघर्ष ने लिख दी नई इबारत

खुश्बुएँ झाँकती हैं जिस राह से चले आए

सपने उतरने लगे हैं हकीकत की सीढ़ियाँ

शिद्दत से उनको सँवारा है तुमने

रोम रोम से प्यार औ आशीर्वाद भरी दुआएं

तुझको मेरी उमर भी लग जाए |

परिस्थितियों को अपने हक़ में करने के तेरे प्रण और अधिकार को मेरा साथ सदा मिलेगा | तेरे पापा और बहन तुझे बहुत याद करते हैं | मेरी आँखों की कोर में तेरी याद खूब जगह समेटे बैठी है | समय मिले तो घर आना |

तेरी आगत के इंतज़ार में

तेरी खुशनसीब मां |

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