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प्रेम समर्पण

शोभा रस्तोगी0965267277
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प्रेम विवाह या अरेंज्ड विवाह

जीवन में कुछ भी पूर्ण नहीं होता । कही कुछ कमी तो कही कुछ । मानव जीवन खुशबुओं का गुलदस्ता है तो बदबू के भी हज़ार रास्ते है । जिन्दगी का हर मोड़ दोराहे पर खुलता है । किसी एक बात का सौ प्रतिशत ठीक होना स्वप्न सा है । जीवन के अनेक अध्यायों में से विवाह भी एक अति महत्वपूर्ण और खूबसूरत पाठ है ।

विवाह प्रकारों में से एक है प्रेम या गन्धर्व विवाह । अब प्रेम तो हिन्दू, मुस्लिम, ,ईसाई , फलाना, ढिमका नहीं होता न । प्रेम तो प्रेम होता है । देह का, मन का । कच्ची या पक्की उम्र का । ताजगी, नयापन , गंध सा नया उगता है कुछ शरीर में । देह में इस नवेलेपन से मन में लहरे आलोड़ित होती है । आँखों की गलियाँ पकड़ सीधे ह्रदय की सुरंग खुल जाती है । पग जाती है नेह की मीठी जलेबी । फिर परिवार, धर्म, जाति ,समाज आ जाता है डराने, धमकाने , तोड़ने, मरोड़ने । खाप पंचायतें आ जाती है । प्रेम विवाह में बंधे अपनी बेटी दामाद को, बेटे बहू को फुसलाकर मार देते है । टुकड़े टुकड़े कर देते है कोई इधर नज़र भी न करे ।

प्रेम गली अति सांकरी, जामे दुई न समाए । जब दो मन एक प्राण हो जाते है तो प्रेम विवाह होता है । तन मन से बड़े हो रहे बच्चे बाहर की दुनिया में आते है तो चौंधिया जाते है । पीछे नज़र घुमाते है तो उदास घर में सिसकिया, शिकायतों के ढेर लगे होते है । भरपूर उदासी का जंगल बसा होता है वहाँ । अपने जिनमे प्रेम पतझड़ सा पीला, शुष्क और चरमराया सा होता है । बाहरी आनंद हेतु उनके डैने उड़ान भरते है । साथी पसंद आने पर विवाह करते है । और फिर शुरू होता है समस्याओं का फुटबाल मैच । किक पे किक । अनुभव का हाथ नहीं होता । जानकारी नहीं होती । बस आँखों का भरम जो न करा दे वाही ठीक ।

आजकल तो प्रेम विवाह हो या अरेंज्ड, दोनों में कोर्ट मैरिज आवश्यक है । यह एक जरूरी कदम है न्यायालय की तरफ से । घर के आशीर्वाद से प्रेम विवाह सफल होते है । शिक्षा, संस्कार अच्छे हो तो ऐसे विवाह की परिणति उम्दा रिजल्ट देती है । अधिकतर ऐसे विवाह में पृष्ठभूमि असमान होती है । धर्म, जाति ,परिवार की प्रतिष्ठा,पैसा, शिक्षा, नौकरी सब आड़े आता है । प्रेम महज आकर्षण का कार्य करता है । तत्पश्चात यह छद्म आवरण हट जाता है । और वस्तुस्थिति असहज हो उठती है । नंगी सच्चाई में जीना गरल हो जाता है । निरस्त हो जाते है ऐसे प्रेम विवाह या ढोए जाते है । वैसे ढोए जाने की बात तो अरेंज्ड विवाह पर भी बहुमत से जनहित में जारी होती है । परिवार, जाती,समाज, बच्चों की खातिर बस चल रहे है किनारों की भांति । बहुरुपिया समाज में बहुरुपिया बना स्वयं को ।

मेरी कामवाली की अभी अभी जवान होती बेटी पड़ोस के व्यस्क लडके के साथ भाग जाती है । बाद में संज्ञान में आता है लडके के पास न कोई काम है न घर है । लड़की घरों में काम करके जीविका चला रही है । लड़का शराबी है । ऐसे अनेक उदाहरण है । कही कही इस प्रेम को छलना भी कहते है । परिवार में काम के लिए लड़कियों को फांसा जाता है । शादी कर सदा के लिए नौकरानी मिल जाती है । प्रेम विवाह की सार्थकता या निरर्थकता कैसे निश्चित की जाए जब तक जड़ में शिक्षा न हो , ज्ञान न हो ।

जहां तक इस लव मैरिज की बात है युवा पीढ़ी इसे अच्छा मानती है । इसमें कोई बाह्य आडम्बर नही होता । दहेज़ का रावण नही होता । लेन देन के नाम पर किसी का मान अपमान नही होता । सिर्फ एक अहसास होता है प्रेम का और सम्बन्धो का । अरेंज्ड मैरिज में सामाजिकता तो होती है पर दिखावा बहुत होता है । अपनी पद प्रतिष्ठा का बढ़चढ़कर शो ऑफ किया जाता है । बड़े बड़े बैंकवेट हॉल में, फार्म हॉउस में पूरी सज धज के साथ लाखो रूपए के पंडाल, लाखो का खाना जिसमे आधा तो वेस्ट जाता है । शराब के दौर, नाचने गाने के इंतजामात, दहेज़ का सामान, कैश, कीमती कपडे, जेवर आदि पर भारी रुपया जाया होता है । यह दिखावा ही होता है की एक बार ही पहनी जानी वाली दूल्हा दुल्हन की खर्चीली भारी पोशाक जो हजारो लाखो में तैयार होती है और मुड़कर कभी पहनी नहीं जाती । अन्य भी अनेक तामझाम जो हमें मन के सुकून से दूर ले जाते है । इतने आडम्बर के तहत दोनों पक्ष मोटे कर्ज के नीचे दब जाते है । फिर आरम्भ होता है घर में कलह का दौर, मांग का दौर, अविश्वास का दौर , अलगाव पे अंत ।
विवाह का अति आवश्यक तत्व प्रेम समर्पण सहयोग कहीं नहीं होता ।

प्रेम विवाह में ऐसे मौके न बराबर ही होते है । कोर्ट में,धार्मिक स्थान में या छोटे आयोजनों में विवाह होते है और जरूरी चीजों के साथ नई गृहस्थी बस जाती है । आधुनिक पीढ़ी यही पसंद करती है । सामान्य जीवन में दोनों वर वधु नौकरीपेशा होते है । दिखावे के स्थान पर मेहनत से कमाया पैसा घर बनाने, घूमने आदि पर खर्च करते है । किन्तु यहाँ परिवारीजन का मेल मिलना संशयभरा होता है । बेहतर तो ये हो कि प्रेम विवाह निश्चित कर लेने पर घरवालों की मर्जी और फिर छोटे आयोजनों में प्रेम को अरेंज्ड विवाह में तब्दील किया जाए । दिल मिले, प्रेम मिले, परिवार मिले फालतू तामझाम से ज़रा सा हटके । कोरे आदर्श को भी न ओढ़ा जाए । कुछ जरूरी सार्थक रस्म, कुछ मिलना जुलना, चहलपहल हो बस्स । इस सरल, निश्छल स्नेह को सबका आशीर्वाद मिले तो पुरानी परम्पराओ को यू टर्न देकर नई पौध लगे, खिले पुष्पित हो, पल्लवित हो । नई ताजगी आए । नई सुबह से, नई धूप से हट जाए बरसो से जमी सीलन , कोने में पड़े अँधेरे जो दिल के भीतर घात लगाए होते है और नई नवेली को ताने दिए जाते है ।

विवाह एक एग्रीमेंट है , कमिटमेंट है अपने आप से , एक दूसरे से कि उदासियो की पैरहन को खुशियों का रंग लगाएंगे और हमारे बुजुर्ग हमारे साथ भी ऐसे ही खुश रहेंगे न की वृद्धाश्रम में । शादी एक खूबसूरत रिश्ता है जोकि हमें नए रिश्तो का उपहार देता है । पहले के रिश्तों को हवा लगाए , कद्र करें और नए रिश्तों की जमीं को रौपे । बड़े भी बच्चों की भावना को समझे । उन्हें स्नेह दे , मान दे । इस तरह परिवार में प्रेम, सदभाव की लौ बलती रहेगी । प्रेम विवाह से होनेवाली समस्याऐं छूमंतर हो जाएगी । यदा कदा झांकेगी भी तो सबकी डांट खा कर इधर मुंह न करेंगी ।

लब्बोलुआब ये कि दोनों तरह के विवाह में दबाने की , दिखावे की, भावना को परिवार निकाला दे दिया जाए । इसके स्थान पर नेह, सहयोग की भावना को जगह दी जाए तो प्रेम या अरेंज्ड विवाह , कुछ भी सार्थक हो सकता है । .........................................................