Garibon ki Suchi me Naam! in Hindi Short Stories by Girish Pankaj books and stories PDF | गरीबों की सूची में नाम !

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गरीबों की सूची में नाम !

गरीबों की सूची में नाम !

'
गरीबों की सूची बन रही है'।

जैसे ही यह शुभ-समाचार मुझ तथाकथित किस्म के गरीब के कानों तक पहुंचा तो सच कहूँ मन 'ओले-ओले' कर उठा। जल्दी से दौड़े उस ओर, जहाँ सूची बन रही थी। जल्दी का काम शैतान का होता है लेकिन यह भी सच है कि जल्दी न करें, तो कोई शैतान पहले ही पहुँच जाए, क्या भरोसा। आजकल 'यही' हो रहा है। गरीबों को मिलने वाली सुविधाओं को लपकने में शैतान किस्म के अमीर ही बाजी मार लेते हैं। प्रधानमंत्री रोजगार योजना को हजम करने वाली प्रतिभाओं में ऐसे ही लोगों की संख्या ज्यादा है। इधर गरीबों के नाम से योजना शुरू हुई नहीं कि उधर पैसे वाले गरीब बन जाते हैं। सुविधा लेने के लिए गरीब क्या, कुछ लोग भिखमंगे तक बन जाते हैं। ज़रूरत पड़े तो नंगे तक बन जाते हैं।
तो जब गरीबों की सूची बन रही थी, तब हम भी पहुँच गए गरीब बन कर। लाइन लंबी थी। पहले पाओ की तर्ज पर नाम लिखे जा रहे थे। नाम लिखवाने वालों की कतार देखकर अचकचा गया। लग रहा था, पूरा शहर काम-धाम छोड़कर लाइन से लग गया है। मेरे सामने एक मोटे-ताजे सज्जन खड़े थे। मैंने पूछा- ''आप भी गरीब हैं ?'' वे बोले- ''हाँ जी, बहुत गरीब हूँ। सबके पास 'इंडिका' से लेकर 'सेंट्रो' और 'वैगनआर' तक है। और मैं बदनसीब अभी भी पुरानी मारुति-800 में चल रहा हूँ।''
कारवाला-गरीब पहली बार देखा मैंने। मुझे उससे बड़ी सहानुभूति हुई। मैंने कहा- ''वाकई आपकी गरीबी पर रोना आ रहा है। अपनी गरीबी का कुछ और खुलासा करो।'' कारवाला बोला- ''एक तो बताया कि पुरानीमारुति है मेरे पास। दूसरे, मेरे पास सिर्फ एक बंगला है। दूसरों के पास तो न जाने कितने बंगले और न जाने कितने स्क्वेयर फीट जमीन है। मेरे पास यह सब नहीं है। इसे गरीबी-बदनसीबी ही तो कहेंगे ना। मैं भी अपना नाम लिखवा कर सरकार से मांग करूँगा कि मुझे भी संपन्न बनाए। और हाँ, अब आप अपनी गरीबी का सचित्र वर्णन कीजिए।''
मैंने कहा- ''कार तो मेरे पास भी है। लेकिन वह साहित्य वाली कार है।'' सामनेवाला चौंका- ''ये कैसी कार है? कौन-सा मॉडल?'' मैंने हँसते हुए कहा- ''आप समझे नहीं। मैं साहित्यकार हूँ। साहित्य के साथ कार। वैसे कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो 'साहित्य' से शुरू होते हैं और 'कार' पर आकर जयहिंद हो जाते हैं। मतलब खत्म। कार मिली। मैं उतना बड़ा साहित्यकार नहीं बन पाया हूं। अपना नाम गरीबों की सूची में इसलिए भी दर्ज करवाना चाहता हूं कि ताकि मेरे पास भी अपना मकान हो सके, एक सुंदर गाड़ी मुझे भी मिल जाए।''
सामने वाला कारछाप गरीब गुर्राया- ''तुम्हें बंगला-गाड़ी क्यों चाहिए ? तुम तो साहित्यकार हो। साहित्यकारों को सुविधाएँ क्यों ? अभावों में रहोगे तभी तो कविताएँ लिखोगे। पैसे वाले बने तो काहे के साहित्यकार!'' मैं भड़का- ''मतलब यह कि जीवन का सारा सुख तुम लूटते रहो और साहित्यकार को आदर्श का पाठ पढ़ा कर भूखों मरने पर मजबूर करते रहो ?''
अगला सकपकाया। फिर सतर्क होकर बोला- ''अगर सभी सम्पन्न हो गए तो हमारा क्या होगा? गरीब-अमीर की खाई ही पट जाएगी। मेरी मानो तो आप लाइन से बाहर हो जाओ। यहाँ अधिकतर लोग खाते-पीते घर के हैं और गरीबों की सूची में नाम जुड़वाना चाहते हैं। हम लोग नाम लिखने वाले को घूस देंगे और वह नाम लिख लेगा। आपके पास घूस देने लायक पैसे हैं ?''

''नहीं तो!'' मेरी बात सुनकर अमीर हँसा, ''फिर तो लिख चुका आपका नाम गरीबों की सूची में।''