Ye.. Lo, Phir Ghir Gaya.. in Hindi Short Stories by Girish Pankaj books and stories PDF | येल्लो, फिर गिर गया...

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येल्लो, फिर गिर गया...

येल्लो, फिर गिर गया..

येल्लो, फिर गिर गया रुपइया...।

ये क्या हो रहा है भइया? जो दस पैसे गिरता है, एक पैसे उठता है। इसी को कहते हैं भारतीय रुपइया। कभी कहा गया था, 'न बीवी न बच्चा, न बाप बड़ा न भैय्या, दा होल थिंग इज़ दैट कि भैया सबसे बड़ा रुपइया।' तो कभी सबसे बड़ा रुपइया जो था, वह अब सबसे गिरी हुई चीज हो गया है। दो-चार दिन की आड़ में यह ख़बर नज़र आ ही जाती है, कि रुपया फिर गिरा। डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले अनेक वर्षों से गिर रहा है। वैसे अब तो डालर भी गिरे जा रहा है, लेकिन रुपइये की तो और बुरी हालत है। कभी-कभार एक-दो पैसे उठता भी है बेचारा, लेकिन फिर गिर जाता है। बिल्कुल शेयर के भाव की तरह।
हमारे लिए रुपइया एक गिरी हुई या गिरती हुई चीज हो कर रह गया है। वित्त मंत्री गिरे हुए रुपए को इधर से उठाने की कोशिश करते हैं तो रुपइया उधर से लुढ़क जाता है। उधर से संभालने की कोशिश करते हैं, तो इधर से भरभरा जाता है। रुपया न हुआ क्रिकेट खिलाड़ी हो गया, गिरे जा रहा है सुसरा। एक को संभालो तो दूसरा गिर जाता है। बेचारा 'क' गिर रहा होता है, तो हम उसे संभालने की कोशिश करते हैं। 'महान-महान' कह कर उसे इतना ऊपर चढ़ा दिया गया कि अब उसका नीचे गिरना हमसे देखा नहीं जाता। तो पूरी कोशिश कर रहे हैं कि उसे बचा लिया जाए। एक को बचाने में भिड़ते हैं, तो पता चला उधर से 'ख' भइया गिरने को हैं। उनको संभालने दौड़ते हैं तो देखते हैं कि उधर 'स' लडख़ड़ा रहा है। कहने का मतलब यह कि जिस तेजी के साथ हमारे क्रिकेट खिलाड़ी गिर रहे हैं, उस तेजी के साथ अपना रुपइया भी गिर रहा है। पता नहीं कब तक गिरता रहेगा। बीसवीं सदी में गिर रहा था, अब इस इक्कीसवीं सदी में भी पतन इसकी तकदीर बन गया है।
हमने बार-बार गिरने वाले रुपए को उठने की कोशिश की। वह कराहते हुए बोला- ''भाई साहब, कोई फायदा नहीं। मुझे मत उठाओ। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।''
मैंने कहा - ''यह कैसे संभव है। गिरते हुए को उठाना हमारा राष्ट्रीय धर्म है।''
लेकिन उठ-उठ कर गिरना तो मेरा वैश्विक धर्म बन चुका है। इधर आप उठाएंगे और उधर मैं दन्न से गिर जाऊंगा इसलिए आप अपनी ऊर्जा कहीं और जाया करें। गिरे हुए क्रिकेट खिलाडिय़ों को उठाएं; राजनीति के पतित नेताओं का उद्धार कीजिए, विश्वसुंदरी बनने के लिए रह-रह कर गिर रही लड़कियों को उठाने पर ध्यान दीजिए। मुझे उठाने से कोई फायदा नहीं है। इन लोगों को उठाइए तो देश का चरित्र ऊँ चा होगा, चित्त ऊँ चा उठेगा।''
मैंने कहा- ''मैं देश के चित्त के साथ देश के वित्त की भी चिंता कर रहा हूं। और असली चीज है वित्त, जिसके अभाव में फैलता है कुंठा का पित्त। इसे उठाना जरूरी है। आखिर ये नेता, ये अभिनेता, ये खिलाड़ी, ये सुंदरियाँ वित्त के लिए ही तो गिर रहे हैं। तो फिर चरित्र से ज्यादा महत्व वित्त का हुआ कि नहीं। मुझे तुम जैसे गिरे हुओं को उठाने का पुन्य कमाने दो।''
लेकिन ये तो कहो, कि तुम मुझे उठाओगे कैसे ? तुम तो ख़ुद गिरे हुए हो।'' रुपए ने कहा। ''
क्या बकते हो! मैं और गिरा हुआ ?''
मुझे भड़कते हुए देख कर रुपइया कंपकपा कर बोला, ''मेरे कहने का तात्पर्य यह है, कि तुम आर्थिक दृष्टि से ख़ुद गिरे हुए हो, मुझे क्या उठाओगे ? नैतिक दृष्टिï से ऊ ँचे हो तो अपनी बला से। नैतिकता नहीं, आज अर्थ का महत्व है। तुम घोर नीच हो, लेकिन पैसा पास है तो परम पूजनीय हो। मान लो खूब बड़े नैतिक हो और जेब से कड़के हो, तो तुम कहीं भी जाओ, कोई नहीं पूछेगा। तो भइये, तुम कड़के हो इसलिए मुझे उठाने की कोशिश मत करो। मुझे उठाने के लिए टाटा, बिड़ला या अंबानी आदि इसी गोत्र के लोग आते ही होंगे। तुम तो मित्र, गिरते हुए चरित्र को उठाओ। और वैसे भी मुझे गिरना है। रह-रह कर गिरना है। बड़े-बड़े उद्योगपति मुझे बचा नहीं पाए तो तुम किस खेत की मूली हो।''
रुपइया ठीक बोल रहा था। मैं जबरन उसे उठाने की कोशिश में था। मैं आगे बढ़ गया, लेकिन रह-रह कर यही सोच रहा था कि आखिर रुपइया का गिरना कब थमेगा ? क्या चित्त और वित्त का पतन साथ-साथ चलेगा, या फिर कभी कोई आगे-पीछे भी होगा। मैं अपने और दूसरों के गिरे हुए चरित्र को ऊपर उठाने में भिड़ा हुआ हूं लेकिन बार-बार असफलता हाथ लग रही है ।
अभी-अभी खबर मिली है कि भारतीय रुपइया डॉलर के सामने पहले तो उछला, मगर बहुत जल्दी गिर गया। यह भी खबर है कि डॉलर की कॉलर पकड़ कर पौंड उसकी छुट्टी करने पर तुला है। पीछे से यूरो जोर लगा के हइया कर रहा है। अंतरराष्टïरीय मैदान में डॉलर तो फिर भी उठ खड़ा होता है, लेकिन रुपया अब तक औंधे मुँह पड़ा हुआ है। उसे उठाने के लिए कोई नहीं आता है। कारण, सबके सब किसी न किसी फिसलन के कारण खु़द गिर-पड़ रहे हैं। अब खु़द को संभालें कि फिसड्डी रुपइए को!

वैसे हमरी सरकार जो कहती है, सो करती है.

उसने कहा था, कीमतें घटाएंगे, सो घटा दिया। जो बढ़ा दिख रहा है, उसको हम घटा हुआ ही माने । इसी में कल्याण है. चीजों और रुपए की कीमत भी घट रही है वादा तो पूरा हो गया घटाने का. घोषणा पत्र पर अमल हो रहा है। अच्छे दिन आने वाले हैं, क्योंकि सरकार के घर देर है, अंधेर नही. वरना कितनी सरकारें हैं जो घोषणा पत्र पर अमल करती हैं ? ये सरकार कर रही है। पूत के पाँव तो पालने में ही दीख रहे हैं। सरकार धन्य है। इसकी वंदना होनी चाहिए, ''जय-जय सरकारा, स्वामी जय सरकारा। तुम्हरे कारण रुपया रोता बेचारा''.

कल सड़क पर मुड़ा-तुड़ा कई जगहों से कटा-फटा, रुपए जैसा दीखने वाला कागज पड़ा हुआ नजर आया। मुझे ऐसा लगा, वह कराह रहा है।

मैंने उसे उठा लिया। सचमुच वह दर्द के मारे छटपटा रहा था। मैंने उसे प्यार से सहलाया। वह शांत हो गया। मैंने पूछा- ''हे कागज-पुत्र, कहीं आप भारत के एक रुपए तो नहीं ?''

- ''हां मेरे भाई, मैं एक रुपया ही हूं। पहले कागज चलता था, अब मेरा सिक्का चलता है. ''

उसने आह भरते हुए कहा, ''इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं कि तुम मुझे ठीक से पहचान नहीं पाए। कोई भी होता, मुझे पहचान नहीं पाता। कल तक मैं सजा-संवरा, कड़कदार नोट था और आज ? इस सरकार ने मुझे बदरंग कर दिया है। भिखारी को भी मिलता है तो बिदक जाता है. इतना बदहाल हो गया हूँ डर लगता है, न जाने अभी कितनी दुर्गति और बाकी है।''

- ''नहीं, अब नहीं होगी। वर्षों की कमी एक साथ पूरी कर दी गई है।'' मैंने उसको सांत्वना दी।

- ''लेकिन मुझे तो यही लगता है कि अवमूल्यन मेरा अभिशप्त हिस्सा है।''

रुपए ने कहा, ''समय-समय पर मेरी कीमत घटा दी जाती है। यही रफ्तार रही तो भविष्य में बहुत बुरी हालत हो जाएगी। दो कौड़ी की कीमत भी नहीं रहेगी मेरी। जब से मेरा जन्म हुआ है, मेरा कद जो है वह घटता ही गया। अब तो जैसे, मेरा अंतिम समय निकट आ गया है। रामनाम सत्य हो जाएगा। रुपया बेटा मस्त हो जाएगा, है कि नहीं ?''

रुपया काफी 'नर्वस' था। मैंने कहा, ''इस कदर हताश नहीं होते पगले। सरकार पर यकीन रख, तू बहुत 'ऊंचे' तक जाएगा।''

- ''क्या खाक ऊंचा जाऊंगा। मुझे तो लगता है 'ऊपर' ही चला जाऊंगा। कुछ दिनों बाद लोग मुझ 'रुपया' नहीं, 'पैसा' कहा करेंगे।' रुपये ने आंसू बहाते हुए कहा।

रुपया कई जगह से कटा-फटा था। लगता था, चूहे ने कुतर लिया है। बात भी दरअसल यही थी। उसे एक मोटे चूहे ने कुतर लिया था। रुपए ने कहा- ''हां, मुझे उस कलमुंहे चूहे ने कुतर डाला। मैंने जब मना किया, तो वो कहने लगा, भाई मेरे मुझे क्यों रोकते हो। तुम्हारी हालत तो आम सड़े कागजों की तरह हो गई है। तुममें अब बचा ही क्या है। इतना बोलकर चूहे ने मुझे कुतरना शुरू कर दिया। ये तो अच्छा हुआ कि तभी एक बिल्ली आ टपकी तो चूहे राजा दुम दबाकर भाग गए, वरना मैं तो गया था काम से।''

रुपया अपने अवमूल्यन पर आंसू बहा रहा था।

मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा, ''अरे बंधु, भारत में भले ही तुम्हारी इज्जत न हो, नेपाल में तो तुम्हारे जलवे हैं। एक रुपया दो तो लगभग एक सौ सत्तर (नेपाली) रुपए हाथ लगते हैं। हर भारतीय का सीना गर्व से तन जाता है।''

- ''हां, दिल बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है।'' रुपया बड़बड़ाया ।

बहरहाल, रुपया हीनभावना से ग्रस्त है।

डॉलर, पौण्ड और येन जैसी मुद्राओं को देख-देखकर उसका दिल जल रहा है। कब होगी मेरी भी हैसियत इनके जैसी ? घायल रुपए की गति, वही जान सकता है, जो अवमूल्यन का दर्द झेल रहा हो। नैतिकता, रुपए के दर्द को महसूस रही है। वह तो दो कौड़ी की होकर रह गई है।