रक्षाबंधन

                                                  रक्षाबंधन

 

      मेरी इंदिरा नाम की एकमात्र बहन के स्वास्थ्य में अचानक गिरावट आने लगी थी और वह दिनोदिन कमजोर होती जा रही थी। चिकित्सकों के द्वारा भी सभी तरह से इलाज किया गया परंतु दुर्भाग्यवश उसके प्राण नही बच सके। उसकी मृत्यु के बाद मैंने भावावेश में राखी का पर्व मनाना बंद कर दिया। एक दिन मैं पान की दुकान पर खडा था तभी अचानक ही एक युवा व्यक्ति जो कि मोटर साईकिल पर सवार था, एक गाय को बचाने के प्रयास में संतुलन खो बैठा और रोड डिवाइडर से टकराकर जमीन पर गिर गया। यह दृश्य देखकर आसपास के सभी लोग उसकी ओर दौड पडे। वह अर्धमूर्छित हो चुका था और उसके शरीर से काफी खून बह रहा था। उस भीड में से किसी ने कहा कि उसने इस दुर्घटना की सूचना एंबुलेंस सर्विस नं. 108 पर दे दी है और शीघ्र ही एंबुलेंस आती होगी।

      हम सभी एंबुलेंस के आने इंतजार कर रहे थे परंतु जब दस मिनिट बीत गये और एंबुलेंस नही आई तो मैंने आगे बढकर उस घायल व्यक्ति को अन्य लोगों की सहायता से अपनी कार की पिछली सीट पर लिटा दिया और तुरंत गाडी लेकर मैं निकट के अस्पताल पहुँच गया। वहाँ पर उपस्थित चिकित्सकों ने भी तुरंत बिना समय गँवाए आपातकालीन कक्ष में ले जाकर उसका उपचार प्रारंभ कर दिया। मैं वहाँ पर आधे घंटे इंतजार करता रहा और तभी चिकित्सकों ने मुझे बाहर आकर बताया कि आप यदि 10 मिनिट और देर कर देते तो इस व्यक्ति का बचना बहुत मुश्किल हो जाता। अब वह खतरे से बाहर है और उसे पूर्ण रूप से स्वस्थ्य होने में समय लगेगा। अभी वह बेहोश है परंतु दो से तीन घंटे में उसे होश आ जाएगा। वहाँ के चिकित्सा अधिकारी ने उस व्यक्ति के परिजनों को सूचित करने के लिये वहाँ पर उपस्थित स्टाफ को आदेशित किया।

      इसके लगभग 20 मिनिट के बाद ही उसके माता पिता एवं एक नवविवाहिता महिला घबराये हुये, बदहवास से आँखो में आँसू लिये हुये आये। वहाँ पर उपस्थिति चिकित्सकों ने उसके परिवारजनों केा बताया की अब उनका बेटा खतरे से बाहर है और यदि ये सज्जन सही समय पर उसे यहाँ लेकर नही आते तो उसके प्राण बचाना मुश्किल हो जाता। यह जानने के बाद वे सभी मेरे प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे। मैंने उन्हें ढाँढस बँधाते हुये उस व्यक्ति की प्राण रक्षा के लिये ईश्वर को धन्यवाद करने के लिये कहा। उनसे बातचीत के दौरान मैं यह जानकर हतप्रभ रह गया कि यह उनका इकलौता लडका है जिसका पिछले माह ही विवाह संपन्न हुआ था। उनकी बहू जिसका नाम निशा था, मेरी सूनी कलाई देखकर बोल पडी कि आज राखी के दिन आपकी कलाई पर राखी क्यों नही है ? मैंने उसे बताया कि मेरी बहन की असामयिक मृत्यु के कारण मैं राखी का पर्व नही मनाता हूँ।

      यह सुनकर निशा बहुत विनम्रता से बोली कि मेरा भी कोई भाई नही है और यदि आज मैं आपको अपना भाई बनाना चाहूँ तो क्या आप इसे स्वीकार करेंगें ? मुझे उस समय कोई जवाब नही सूझ रहा था तभी उसने अचानक ही अपनी साडी के पल्लू को फाडकर उसे मेरी कलाई पर बाँध दिया और बोली कि भईया आज की इस दुर्घटना में आपके ऋण को मैं कभी नही चुका सकती। मैने उसे कहा कि मैं तुम्हें क्या उपहार दूँ तो वह बोली मेरे सुहाग को आपने बचा लिया इससे बडा उपहार और क्या हो सकता है ? मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे अनंत से मेरी बहन की आवाज आ रही हो कि मैं तो चली गई परंतु तुम्हारे लिए दूसरी बहन को भेज दिया है।

***

Rate & Review

Krishna Vaishnav 5 months ago

Yogendra prajapati 5 months ago

Reena pandya 5 months ago

Umakant 5 months ago

Shamji Ghetia 5 months ago