दास्तान-ए-अश्क -17


कोई अपना सा होता जो मेरे मन को छुता..
कोई सपना सा था जो सारी रात न रुठा

कहा से सिमट आई बरखा आंखो तले

जमकर  उसने मन के बोझ को है लूंटा

                     17

जैसे बरसों से बंजर उस घर की जमीन को पंख लग गए!
परिवार के सारे सदस्य कोई अनछुए श्राप से मुक्त हो गए थे!
कई सालों तक काले घने अंधेरे बादलों के नीचे दबी हुई जिंदगी तेजपूंज की किरनो से तरोताजा होकर खिल उठी!
कुछ हद तक बोझ कम हुवा था!
जैसे जीने का सहारा उसे मिल गया था..!
अब वो एक एक दिन बेताबी के साथ गुजर रहा था!  उसे ईन्तजार था उस दिन का जब अपने होने का पुख्ता सुबूत नजरो के सामने होगा!
जब से उसके पति ने ये बात जानी थी की वो गर्भवती है!  तब से वो उस से दुरी बना ने लगा था!
उसको पहेले लगता था की अपने अंश को ईस दुनिया में आता देखकर सबसे बडी खुशी उसी को होगी..!  पर वो गलत थी!  बिलकुल गलत..!
वो ना उसमे दिलचस्पी ले रहा था, ना वो उसकी केर करता था..,ना कभी वो उसकी सेहत को लेकर फिक्रमंद था!
रात को खाना खाकर घर से निकल जाना..! आधी रात को शराब मे धुत्त होकर वापस लोटना और चुपचाप सो जाना!
पापा जी मम्मी कोई भी उससे कुछ नहीं पूछता था! और ना ही उनसे कोई कुछ कहता!
उसके मन में रोज यह सवाल उठता था, कि वह आखिर इतनी देर रात सें क्यों आते हैं और कहां जाते हैं.?
पता नहीं क्यों पर वह अब उसकी फिकर करने लगी थी! क्या बात थी जो वह उससे दूर दूर रहनेे लगा था!
वैशी दरिंदा की तरह उसकी बोटी बोटी नॉंचने वाला भेड़िया जैसे पेट भर जाने के बाद अपने शिकार को सूंघने की भी जरुरत नही समजता था! 
उसे अब उसकी बीवी होने का एहसास होने लगा था! क्या वजह थी जो वह इतनी रात तक बाहर रहता था? सोच कर वह काफी परेशान रहने लगी थी!
वह जब भी उसे बतियाने की कोशिश करती धिक्कार भरी निगाहों से देख कर वो बाहर निकल जाता!
उसका यह बर्ताव उसे बिल्कुल रास नहीं आ रहा था जान बूझकर वो  दूर-दूर रहने लगा था जैसे उस से पीछा छुड़ाना चाहता हो
शायद यह रिश्ता इस तरह का था जो बेमन से ही क्यों ना बांधा गया हो फिर भी एक औरत अपने पति पर पूरा हक समझने लगती है  हर एक औरत यही चाहते हैं कि जिस के साथ उसको जीवन बिताना है वह पूरी तरह उसका हो कर रहे!
वो चाहे अपनी मर्जी के मुताबिक उससे बात करें मगर वो चाहती थी की अब अपनी छोटी छोटी हर बात पति से बांटे..!
ये जो खुशनुमा एहसास था जो रोज उसको नया जीवन दे रहा था, उस छोटे-छोटे बदलाव को वह उससे बांटना चाहती थी!
आने वाली संतान के लिए वो एसा माहोल तैयार करना चाहती थी की अपने बच्चे को जिंदगी में कभी कोई समझौता ना करना पड़े! कभी किसी बात की कमी ना रहे ! पूरा घर उसे एक गुलशन की तरह महकता नजर आए, और उसका बचपन सुकून भरा गुजरे! अपने बचपन के एक-एक लमहे को वह जी भर के जिये!
अच्छी किताबें सुनना ! अपनी मनपसंद हर एक बात वो सुनने लगी थी!
हर एक वो काम करना चाहती थी जो जीवन में उसे नही मिला था! 
वो उसे भरपूर प्रेम और सन्मान देना चाहती थी फिर चाहे वो बेटी हो या बेटा
बस उसे अपनाने का जज्बा लिए जी रही थी!
वो चाहती थी की आनेवाले बच्चे को लेकर कुछ पति की भी उम्मिदे हो ! अपने बच्चे को लेकर फिक्रमंद हो..! 
पर ईश्वर जाने किस मिट्टी से बना था वो
कभी उसकी भावना समज ही नही पाया!
वो भी तो उसके केरेक्टर को समज नही पा रही थी! आखिर क्या वजह थी जो वो उससे दुर दुर रहने लगा था?
ऐसी क्या बात थी जीसको लेकर ससूरजी भी उसकी माफी मांगने तैयार हो गए थे?
क्या अभी भी कोई वज्रघात उसकी जिंदगी में बाकी था?  कहना मुश्किल था!
लेकिन आज उसने एक फैसला किया की कुछ भी हो जाए वह उनसे पूछ कर रहेगी ऐसा क्या है  जो उनका रवैया उसके प्रति इतना उदासीन हो गया ?
आखिर क्यो वो इस बच्चे के आने से खुश नहीं है ?
ऐसी कौन सी बात है जो वह उससे छुपा रहे हैं..?"
रात सारे कामों से निवृत्त होकर वह उनका इंतजार करने लगती है ! सासुमां के बुलाने पर भी वह अंदर नहीं जाती! बहुत रात बीतने पर दरवाजे पर आहट सुनाई देती है !
वह चौक कर देखती है उसके पति चोरों की तरह घर के भीतर आ रहे हैं! उनके साथ उनका कोई दोस्त भी था जो शायद उन्हें छोड़ने आया था !
अरे यह तो किसी आदमी के साथ हैं मैं यूं ही इन पर शक कर रही थी !
वह कौन सा किसी औरत के साथ घूम रहे थे?
वह मुस्कुरा देती है !
आज वह भी बीवियों की तरह सोचने लगी! वो अपने पति के पीछे पीछे अपने रूम में चली जाती है !
उसे देखकर वो कहते हैं "तु यहां क्या करने आई है ? चलो मां के कमरे में जाकर सो जाओ..!!"
नहीं मुझे आज यही सोना है और आप से बात भी करनी है!
आप इतना देर से क्यों आते हो ?ना मुझसे बातें करते हो ना मेरा हाल जानने की कोशिश..? ये बच्चा हम दोनों का है और आप ही तो चाहते थे कि  बच्चा जल्दी आए ? फिर इतनी उदासीनता क्यों दिखा रहे है आप?
इस समय मुझे आपकी जरूरत है आपके साथ की, प्यार की ,हमदर्दी की..!"
"अच्छा प्यार से मन नहीं भरा तेरा !ऐसा कर ..ये बच्चा पैदा कर ! फिर से प्यार करके तुझे दोबारा मां बना दूंगा!" "नहीं नहीं मेरा वो मतलब नहीं था! सुनिए मुझे आपके साथ और  स्नेह की जरूरत है ! आप मेरे पति हो मैंने आपके साथ सात फेरे लिए और भगवान को साक्षी मानकर  आपको अपना सब कुछ माना हैं!
प्लीज मेरे साथ आप ऐसा व्यवहार ना करें ! मुझसे कोई गलती हो गई हो तो मुझे बता दें!
वो बोला "गलती तो मुझसे हुई ,ना चाहते हुए भी शादी करके..!"
"क्या मैं आपको पसंद नहीं थी ?
आप मना कर देते ,क्योंकि आपने मुझसे शादी  की है! "
वो आहत होकर बोली थी!
तभी उसका चहेरा गुस्से से लाल हो गया.!
"तू क्या दुनिया की कोई भी औरत मुझे पसंद नहीं है ! मुझे औरतों में कोई दिलचस्पी नहीं !
मैं अपने दोस्तों के साथ खुश हूं !
बहुत खुश  समझी तुम !
अब चुपचाप जाकर सो जाओ !
मुझे तंग मत करो !
चहरे पर उदासी खामोशी के साथ दस्तक दे गई! 
वो झुंझलाहट के साथ पास वाले कमरे में सो गई
पर वो नहीं जानती थी की 1 जोड़ी आंखें लगातार उन्हें देख रही थी ! वो आंखें किसकी थी ? वो कुछ देख पाती उससे पहले ससुरजी के कमरे की और तेज कदमो की आहट दौड गई !
उन दोनों की सारी बातें किसने सुनी? ससुर जी के कमरे मे खुसुर-फुसुर होने लगी थी!  फिर पापा जी एक दीर्घ श्वास लेकर पैर पटक कर चल दिये शायद..!
आखिर ऐसी कौन सी बात थी जो उसके सिवा सब जानते थे ?
ऐसा कौन सा राज था जो उसके अरमानों को कुचलने के लिए तैयार था..?
और उसे अश्को  के सैलाब में डूब जाने के लिए..?"
फिर से एक झंझावात उसकी जिंदगी को तहस-महस करने तैयार था..!
    जानने के लिए पढते रहे..! "दास्तान-ए-अश्क "
            ईस कहानी को जरूर पढे..  आपकी राय हमेशां कुछ अच्छा लिखने को प्रेरित करती है..! 

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