Istemaal in Hindi Short Stories by Sushma Munindra books and stories PDF | इस्तेमाल

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सुषमा मुनीन्द्र

रोज की तरह वे सुबह जल्दी जाग गये। पुलिस विभाग की नौकरी ने जल्दी जागने की जो आदत डाल दी है वह सेवा निवृत्ति के बाद भी कायम है। मधु मालती की छतनार बेल पर रात भर सोई समूह भर चिड़िया चहकते हुये मानो प्रभाती गा रही हैं। वे चिड़ियों के चहकने पर तब ध्यान नहीं देते थे। पुलिस विभाग की नौकरी और दौरे की व्यस्तता में न जी भर खा पाते थे, न नींद भर सो पाते थे। चिड़ियों के चहकने जैसे छोटे—छोटे उपक्रमों पर ध्यान देने का अवकाश उन्हें कभी नहीं मिला। इन दिनों उनका चहकना सुना करते हैं। सोचते हैंं किस कार्य प्रयोजन के लिये चिड़िया इतना चहकती हैं ? अपने अस्तित्व के लिये, अधिकार के लिये, आवश्यकता के लिये, आजादी के लिये या यॅूं ही। वे अपने—आप में मुस्कुरा दिये। पक्षी जगत के बारे में इतना क्यों जानना—सोचना चाहते हैं ? जब से उनके कमरे के रोशनदान में चिड़िया के एक जोड़े ने घोसला बनाया है वे चिड़िया के प्रति काफी संवेदनशील हो गये हैं। चिड़िया उन्हें आकर्षित करती है। उन्हें कोई कल्पना नहीं थी ऑंत के बड़े आपरेशन के कारण बिस्तर पर समय बितायेंगे और गौरैया समय बिताने का साधन बनेगी। कार्य काल में सोचा करते थे सेवा निवृत्ति के बाद खूब खाते, खूब सोते हुये इत्मीनाम से रहेंगे। अब जब बिस्तर पर शिथिल पड़े हैं लग रहा है बिना किसी कार्य और व्यस्तता के बिस्तर पर समय बिताना बहुत बड़ी सजा है। अस्पताल से घर आये तब कुछ दिन परिचित—नातेदार देखने आते थे। अब नहीं आते। एक ही ग्रामीण बैंक में कार्यरत पुत्र अमृत और पुत्रवधू वृंदा ने उनकी सेवा के लिये काफी छुट्‌टी ली लेकिन अब नौकरी पर जाना जरूरी था। पोता जोश स्कूल और गृह कार्य में लगा रहता है। पत्नी गृहस्थी के बिखराव को समेटती हैं। अब वे हैं, सेवा निवृत्ति हैं, बीमारी, बिस्तर, परहेजी खाना, दवाइयॉं और खाली समय है। और सहसा उनका ध्यान घोसले की ओर गया। पत्नी उनके कमरे की सफाई करते हुये गुस्सा हो रही थी ‘‘चिड़िया, रोशनदान में घोसला बना रही हैें। कचड़ा फैलाती हैं, जबकी मरीज का कमरा साफ रहना चाहिये।''

उन्होंने निर्मित हो रहे घोसले को देखा। इस बुद्धिमान चिड़िया ने उनकी अनुपस्थिति का अच्छा लाभ लिया। खाली कमरा देखकर कब्जा जमाने लगी है। बोले —

‘‘घोसला बना ही रही है तो, बना लेने दो।''

पत्नी ने चिड़िया को भगाने की तमाम कोशिश की लेकिन जिद्‌दी चिड़िया ने घोसला बना कर ही दम लिया। वे कमरे में आती—जाती नर और मादा गौरैया की गतिविधि पर ध्यान देने लगे। चिड़िया की गतिविधि देखना उन्हें अच्छा लगने लगा। चिड़िया के व्यवहार पर सोचने लगे। यह मामूली सा पक्षी घोसला बनाने के लिये स्थान किस तरह चुनता होगा ? इतना साहस कहॉं से लाता होगा कि पत्नी के दखल देने पर इधर—उधर उड़ कर बार—बार रोशनदान पर आ जाता है और घोसला बनाने लगता हैै। मनुष्य के साथ रहने की आदत किस तरह डाल लेता है कि घर का एक कोना अपना बना लेता है। इच्छा होती है बर्ड वॉंचर होते तो चिड़ियों के संसार को थोड़ा—बहुत समझ पाते। वैसे इतना समझ गये हैं पक्षी बड़ों और बच्चों में फर्क करना जानते हैं। चिड़िया जोश के समीप आकर जिस तरह भात के कण उठा लेती है उनके समीप नहीं आती। इसे जोश की समीपता में वैसा जोखिम नहीं लगता है जिस तरह बड़ों की आहट होने पर लगता है। उन्हें आज कल चि़िड़या की चर्चा करना बहुत अच्छा लगने लगा है। जोश को जब से उन्होंने घोसला दिखाया है वह चिड़िया और घोसले को देखने के लिये कई मर्तबा उनके कमरे में आत है। उनके कमरे में पढ़ता है, नाश्ता करता है, खाना खाता है। अक्सर भात, पोहा या रोटी का टुकड़ा फर्श पर छितरा देता है। पहले चिड़िया झिझकती थी अब जोश के बहुत समीप आकर भात चोंच में उठा ले जाती है और सुरक्षित जगह पर बैठ कर खाती है। जोश कटोरी में पानी भर कर कटोरी को स्टूल पर रख देता है पर चि़िड़या नहीं पीती। जोश हैरान होता है ‘‘दादू, चिड़िया को प्यास नहीं लगती ?''

वे हॅंसते हैं ‘‘जोश, मुझे लगता है चिड़िया की नजर कटोरी पर नहीं पड़ी है। यह भी हो सकता है उसे मालूम न हो पानी उसके लिये रखा है।''

‘‘हो सकता है बगीचे की हौज के पास जिस छोटे गड्‌ढे में पानी भरा रहता है वहॉ पी लेता हो।''

उन्होंने जोश की बात का अनुमोदन दिया ‘‘ठीक कहते हो।''

हौज के नल से बॅूंद—बूॅंद पानी रिस कर एक छोटे गड्‌ढे में भर जाता है। कभी—कभी वे बिस्तर पर बैठ कर खिड़की से बाहर का नजारा करते हैंं गड्‌ढे में भरे पानी में कुछ चिड़िया पंख फड़फड़ा कर अपनी देह को गीला कर पानी में खेलती है। देर तक उनका सामूहिक स्नान चलता है। वे बिल्कुल नहीं पहचान पाते घोसला बनाने वाली दो चिड़िया कौन सी हैं। इतना जरूर जान गये हैं काले गाढ़े चित्तिदार पंख वाली नर चिड़िया होती है, भूरे चित्तिदार पंख वाली मादा चिड़िया। सोचते हैं चिड़िया की तरह मनुष्य भी एक जैसे रंग—रूप, कद—काठी के होते तो सबको भेद भाव मुक्त समान अवसर, स्थिति, महत्व मिलता। समानता के बावजूद लोग अपने परिवार के सदस्यों को पहचान लेते जैसे ये पक्षी अपने जोड़े को पहचान लेते हैं। उन्होंने जोश को दृश्य दिखाया ‘‘जोश, चिड़िया मजे से नहा रही हैं। तुम नहाने में सुस्ती दिखाते हो। रोते हो।''

‘‘दादू, मैं भी चिड़िया की तरह रोज नहाऊॅंगा। रोऊॅंगा नहीं।''

वे अचरज में हैं। चिड़िया से प्रेरित होकर जोश सचमुच रोज नहाता है।

चिड़िया दिन भर कमरे में आती—जाती है। कभी सीलिंग पंखे पर बैठती है, कभी रोशनदान पर, कभी दरवाजे पर, कभी भात खाने के लिये फर्श पर। चिड़िया को क्षति न पहॅुंचे इसलिये वे गर्मी सह लेते हैं लेकिन पंखा नहीं चलाते। पत्नी उनकी तरह चिड़िया को लेकर सतर्क नहीं है। उनके कमरे में आते ही पंखा चला लेती हैं। वे सतर्क हो जाते हैं ‘‘बंद करो। चिड़िया पंखे से कट कर मर जायेंगी।''

‘‘चिड़िया की बड़ी फिक्र है। हमसे गर्मी नहीं सही जाती।''

‘‘दूसरे कमरे में जाकर पंखा चला लो। मुझे लगता है चिड़िया अंडे दे चुकी है। देखो न, कितना चौकस होकर इधर—उधर देखती है। जैसे डरती है कोई घोसले को नुकसान पहॅुंचा सकता है।''

‘‘तुम चिड़िया की फिक्र करो। मैं गर्मी में नहीं बैठूगी।''

पत्नी चली जाती। वे पत्नी के जाने का बुरा नहीं मानते हैं। उन्हें चिड़िया की सुरक्षा अधिक जरूरी लगने लगी है। वे दोपहर का खाना खाकर झपक रहे थे कि चिडिय़ा के तेज स्वर और फड़फड़ाने से झपकी टूट गई। देखते हैं नर और मादा चिड़िया में लड़ाई हो रही है। कभी एक—दूसरे पर दोनों चोंच से आघात करती हैं, कभी पीछा करते हुये इधर—उधर उड़ती हैं। इसी उपक्रम में मादा चिड़िया उनके बिस्तर पर आ गिरी। उन्होंने चिड़िया की प्रत्येक गतिविधि की तरह इस लड़ाई का भी एक कारण ढॅूंढ़ लिया। जिस तरह हर मॉं अपने बच्चे को लेकर बेहद सतर्क रहते हुये पिता पर कम सतर्क होने का आरोप लगाती है शायद उसी तरह मादा चिड़िया का नर चिड़िया से विवाद हुआ होगा और लड़ पड़ी होगी। चिड़िया कुछ क्षण स्तब्ध बैठी रही। जैसे तजबीज रही हो सुरक्षित है या नहीं। उन्होंने सुरक्षित होने का बोध कराने के लिये चिड़िया को पुचकारा। पुचकार का दुष्प्रभाव पड़ा। चिड़िया भयभीत होकर पूरी ताकत लगा कर उड़ी और रोशनदान पर बैठ गई। दृश्य देख रही नर चिड़िया बिजली के तार वाली पट्‌टी के कोने जहॉं रात को सिकुड़ कर सोती है में जाकर बैठ गई। वे बारी—बारी से दोनों को देखने लगे। चिड़िया के इस जोड़े को मालूम न होगा उनकी दिनचर्या में वह किस कदर शुमार हो गया है। बीमारी के उबाऊ दिन कुछ आसान हो गये हैंं। चिड़िया से अनाम संबंध बन गया है। पत्र—पत्रिकाओं में पढ़ते हैं गौरैया की संख्या कम होती जा रही है। पेड़ काटकर, मच्छरों केे रोकथाम के लिये घर के दरवाजों—खिड़कियों—रौशनदानों में मजबूत जाली लगवा कर इनके घर के भीतर आने के रास्ते बंद किये जा रहे हैं। जब वे छोटे थे गॉंव में टिटहरी, पोड़की, महोखा, हुदहुद पता नहीं कितने किस्म की चिड़िया आस—पास रहती थी। जोश लुप्त होती जा रही इन चिड़िया का नाम नहीं जानता या किताब में छपे चित्रों की सहायता से जानता है। जबकि चिड़िया की गतिविधि देखते हुये उन्हें लगने लगा है पशु—पक्षी न रहेंगे तो कुछ भी सुंदर और सुरम्य न रहेगा। चिड़ियों का चहकना कितना आनंद देता है। बिल्कुल संगीत की तरह। वे ऑंखें मॅूंद कर तब तक शांत पड़े रहते हैं जब तक चिड़िया चहकना रोक कर दानों की तलाश में इधर—उधर उड़ नहीं जातीं।

‘‘उठोगे नहीं क्या ? सात बज रहा है।'' पत्नी कमरे में आई तो उन्हें लगा चिड़िया और उनके बीच का कोई सूत्र छूट रहा है। बोले ‘‘जाग रहा हॅूं। चिड़ियों का चहकना सुन रहा था।''

‘‘आजकल तुम चिड़िया के अलावा कुछ नहीं सोचते। चलो ब्रश कर लो।''

‘‘जोश जाग गया ?''

‘‘नहीं। आज इतवार है। अमृत, वृंदा, जोश सब तान कर सो रहे हैं। अरे हॉं ..... अमृत के बॉंस शाम को तुम्हें देखने आ रहे हैं। मैं कमरा ठीक कर दॅूं। जोश का स्कूल बैग, किताबें, खिलौने सब यहीं पड़े रहते हैं। चादर कितनी गंदी हो गई है।''

वे उठ गये ‘‘चादर बदल दो। कमरा साफ रहे तो मन खुश रहता है।''

वे नहीं जानते थे पत्नी कमरा साफ नहीं कर रही है बल्कि उनका दिल तोड़ दे रही है। फ्रै्रश होकर लौटे तो देखते हैं कमरे का परिदृश्य बदला हुआ है। पहली बार जान रहे हैं परिदृश्य बदलने के लिये कुछ क्षण बहुत होते हैं। पत्नी ने बॉंस वाले लम्बे झाड़ू से कमरे के जाले साफ करते हुये घोसले को भी धराशायी कर दिया था। सुड़ौल घोसला करुण तरीके से फर्श पर छितराया पड़ा था। पास ही गुलाबी पारदर्शी त्वचा वाले दो बच्चे निस्पंद पड़े हैं। दो छोटे मॉंस पिंड। दुनिया में पूरी तरह आने से पहले विदाई। दोनों चिड़िया पूरी ताकत से चीख कर सामर्थ्य भर विरोध कर रही हैं। वे जितना चीखना चाहते थे स्तब्धता में नहीं चीख सके ‘‘क्या किया ? छोटे से घोसले से तुम्हें इतनी परेशानी थी ?''

चिड़िया के बच्चों की दशा देख पत्नी को स्वाभाविक रूप से दुःख हो रहा था लेकिन अपनी चेष्टा को वाजिब ठहराते हुये बोली ‘‘परेशानी थी। चिड़िया गंदगी फैलाती थी। कमरे में जहॉं—तहॉं घास—फूस—तिनके पड़े देख अमृत के साहब क्या सोचते ? और फिर मैं नहीं जानती थी घोसले में बच्चे होंगे।''

‘‘चिड़िया ने मेहनत से घोसला बनाया था। बच्चों के लिये दिन भर चिंतित रहती थी। तुमने सब खत्म कर दिया। देख रही हो दोनों चिड़िया कितनी व्याकुल हैं ?''

‘‘कहा तो, नहीं जानती थी घोसले में बच्चे होंगे। तुम आजकल चिड़िया के अलावा कुछ नहीं सोचते हो। वृंदा कहती है तुम्हारे कारण जोश भी पढ़ाई छोड़ कर चिड़िया के पीछे बौराया रहता है।''

वे कहना चाहते थे — चिड़िया थोड़े से तिनके ही तो फैलाती थी। यह इतना बड़ा अपराध नहीं है कि इसकी प्रजाति को खत्म कर दिया जाये। चिड़िया का यह जोड़ा न होता तो लम्बी बीमारी के ये लम्बे दिन बिताना मेरे लिये कठिन होता। नहीं कह सके। कह देंगे तो पत्नी कहेगी अपने दिमाग का इलाज कराओ। चिड़िया तुम्हारे दिमाग में घुस गई हैं। वे शिथिल होकर बिस्तर पर बैठ गये। यहॉं अभी—अभी दो बच्चों की मौत हुई है। वे पूरी तरह विचलित हैं। ठीक चिड़िया की तरह। चिड़िया क्रंदन कर रही हैं। वे सोच रहे हैं — पशु—पक्षी पर्यावरण को संतुलित रखने में योगदान देते हैं। हम मनुष्य समझ कर भी नहीं समझना चाहते। कहीं मॉंसाहार के लिये इन्हें मारा जा रहा है, कहीं अभयारण्य बना कर इनकी सीमा निश्चित की जा रही है, चिड़ियाघरों में इन्हें पिजड़ों में कैद किया जा रहा है। सर्कस और फिल्मों में करतब दिखाने के लिये प्रशिक्षित करते हुये दैहिक—मानसिक प्रताड़ना दी जाती है। जंगल काट कर इनके जीवन यापन में व्यवधान डाला जा रहा है। मनोरंजन के लिये तोते और मैना को पिंजड़े में कैद किया जाता है, मछलियों को एक्वेरियम में कि मछलियॉं देखने से तनाव दूर होता है। लोग अपनी सुख—सुविधा के लिये पशु को सिर्फ और सिर्फ इस्तेमाल करते हैं, हिफाजत नहीं करते। वे ग्लानि से भरे हैं। जाने—अनजाने चिड़िया उनका मनोरंजन करती थी। वे इसके बच्चों की हिफाजत नहीं कर सके। पता नहीं क्यों लेकिन उन्हें लग रहा था अपने खाली, लम्बे, बीमार दिनों की बोरियत और सन्नाटे को कम करने के लिये उन्होंने चिड़िया का इस्तेमाल किया है।

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सुषमा मुनीन्द्र

द्वारा श्री एम. के. मिश्र एडवोकेट

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