अदृश्य हमसफ़र - 4

अदृश्य हमसफ़र

भाग 4

कन्यादान की रस्म आरम्भ हो चुकी थी। ममता अमु के साथ बातों में अन्तस् की पीड़ा को भूल चुकी थी। अमु के साथ घण्टों तोतली भाषा में बतियाना उसका सबसे पसंदीदा शगल था। ममता की बातों का सिलसिला टूटा जब बड़ी भाभी उसे अनु की बिदाई की रस्म के लिए बुलाने आयी।
बड़ी भाभी-"जिज्जी, चलिए न। अनु की विदाई का वक़्त हो चला है। उसकी नजरें आपको खोज रही हैं। "

ममता-"अरे, इतनी जल्दी। " ममता चौंक उठी थी।

बड़ी भाभी-" जिज्जी आप अमु के साथ पिछले दो घण्टे से बतिया रही थी। आप इतनी खुश थी कि हमने सोचा अच्छा है इसी बहाने आपको आराम मिल रहा है तो सारी तैयारी कर आये। "

बड़ी भाभी ने अमु को अपनी गोद में उठा लिया। दोनो ननद भाभी आपस में बातें करते हुए दुल्हन की ओर चल दिये।

ममता-" भाभी वक़्त कैसे बीतता है पता भी नही चलता। अमु से बात करते हुए लगा जैसे अनु से बात कर रही हूं। कल की हमारी छोटी सी गुड़िया आज अपने घर में जाने के लिए तैयार खड़ी है। ईश्वर करे उसे हर सुख नसीब हो और एक कांटा चुभने जितनी पीड़ा भी जीवन में न सहनी पड़े। "

बड़ी भाभी-" हमारी तो बेटी है अनु लेकिन आपने भी तो भूजी होते हुए भी अपनी बेटी जितना प्यार दिया है उसको। "

ममता-" अरे, कैसी बात करती हो भाभी। मेरी बेटी है अनु। उसके रहते मुझे कभी बेटी न होने की पीड़ा का अहसास भी नही हुआ। "

बातें करते करते दोनो अनु तक पहुंच चुके थे। बिदाई की घड़ी करीब थी। दूल्हे मियां पधार चुके थे। दरवाजे पर फूलों से सजी गाड़ी खड़ी हो चुकी थी। पड़ोस की भाभियाँ दूल्हे की खिंचाई में लगी हुई थी। अभी तक माहौल में हंसी ठिठोली जोरों पर थी।

जैसे ही दूल्हे की तरफ के बुजुर्गों ने बिदाई जल्दी करने को कहा तो सभी के चेहरे उतर गए। अनु के साथ साथ सभी की आंखे नम हो उठी। दोनो भाई भी आ चुके थे। दोनो ने अनु के सिर पर एक साथ हाथ रखा और भीगी आवाज में कहा-" हमें तुम पर नाज़ है बिटिया। ममता की कमी को तुमने पूरा किया। यकीन है जैसे मायके को महकाती रही वैसे ही ससुराल भी तुम्हारी खनकती हंसी से गुंजायमान रहेगा। "

दोनो अनु को गले से लगाकर तुरन्त वहाँ से निकल गए। शायद अनु को जाते हुए नही देख सकते थे। ममता को अपनी बिदाई का वक़्त याद आया। ठीक यही बातें बाबा ने उसे कही थी।

दोनो भाभियाँ भी बच्ची को आशीर्वाद समेत कुछ नसीहतें देकर पीछे हट गई।
अनु ने भीगी नजरों से ममता की ओर देखा। ममता को लगा किसी ने उसके कलेजे के दो टुकड़े कर दिए हैं। उसने तुरंत दोनो बाहें खोल दी जिसमें दौड़कर अनु समा गई।

"माँ" और अनु दहाड़ मारकर रोने लगी।

न जाने क्या हुआ अनु को कि भूजी की जगह उसके मुंह से माँ निकला।

ममता के सब्र का भी बांध टूट गया। उसने कसकर अनु को अपनी बाहों में समेट लिया और "मेरी बच्ची" कहकर जोर जोर से रोने लगी।

अनु की विदाई की पीड़ा, सँग में अनुराग दा की बीमारी की खबर सुनकर उपजा दर्द और उनसे भी ऊपर मनोहर जी की अनुपस्थिति। सब कुछ मिलाकर जितनी पीड़ा ममता अपने सीने में समेटे बैठी थी आंसू बनकर बहने लगी। आस पास खड़ी महिलाओं की भी आंखे नम हो आई।

कुछ देर जी भर रोने के बाद ममता ने खुद को सम्भाला और अनु को भी चुप किया।

ममता अनु से कहने लगी-"देख बेटा, तुम बहुत समझदार हो, कुछ समझाने की जरूरत नही है तुम्हें। एक बात का ध्यान रखना मेरी बच्ची कि अपने घर में रहने जा रही हो। मायके में मेहमान बनकर आना। कभी अन्याय न करना और न ही सहना। अपने संस्कार और तुम्हारी समझ दोनो पर ही बहुत भरोसा है हमें।

कहते कहते ममता दूल्हे मियां की तरफ पलटी-" देखो बाबू, मेरी अनु मेरा गुरुर है। आज से तुम्हारे हवाले है लेकिन ध्यान रखना इस बात का कि जितना ये सम्मान दूसरों को देती है उतना ही पाने की हकदार भी है। आत्मविश्वासी है इसे अभिमानी न समझना। इसके सम्मान की रक्षा यदि तुम न कर पाए तो यह खुद करने में समर्थ है लेकिन फिर शिकायत न करना। "

दूल्हे मियां सभी बातें गौर से सुनते जा रहे थे और बस गर्दन हिलाकर हामी भरते जा रहे थे।

ममता फिर अनु की ओर मुखातिब हुई-' अनु, विदाई का दर्द बह चुका मेरी बच्ची। अब मुस्कुरा और अपने घर में मुस्कुराती हुई नई जिंदगी की शुरुआत करना। हमें जाते हुए खारा पानी नही मीठी मुस्कान देकर जा। "

ममता की बातों में जादू का असर था शायद कि सभी ने अपनी आंखें पौंछ ली और मुस्कुराने लगे।
अंततः मुस्कुराते हुए अनु की विदाई हुई।

ममता के साथ सभी की नजरें तब तक अनु की गाड़ी का पीछा करती रही जब तक वह नजरों से ओझल न हो गयी।

वापस आकर ममता भी और सभी जिसको जहाँ जगह मिली वही निढाल से पड़ गए।
सभी के चेहरों पर थकान थी लेकिन नींद का नामोनिशान नही था। ऐसा मंजर था जैसे घर की सोन चिरैया क्या गयी सब सूना कर गयी।

अनु को याद कर के ममता का सुबकना फिर से शुरू हो चुका था। अचानक से उसे अनु दा से कही बात याद हो आई। एक पल में सुबकना भूल गयी और उसकी आंखें अब अनु दा को ढूंढ रही थी।

क्रमशः

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